भगवद गीता - अध्याय 13
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग - श्लोक और अर्थ सहित
🧡 Introduction (परिचय)
भगवद गीता का तेरहवां अध्याय "क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ" के बीच के भेद को स्पष्ट करता है। अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि क्षेत्र (शरीर) क्या है और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) कौन है? यह अध्याय आत्मा, शरीर, प्रकृति और परमात्मा के ज्ञान को अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है।
इस अध्याय में यह भी बताया गया है कि सच्चा ज्ञान क्या होता है, कौन-कौन से गुण आत्मज्ञान प्राप्त करने में सहायक होते हैं और कैसे आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। यह अध्याय हर साधक के लिए आवश्यक है जो आत्मबोध पाना चाहता है।
यदि आपने अभी तक अध्याय 12 - भक्ति योग नहीं पढ़ा है, तो पहले वह अवश्य पढ़ें, ताकि इस अध्याय की पृष्ठभूमि अच्छे से समझ में आए।
श्लोक और हिंदी अर्थ
👇 नीचे अध्याय 13 के सभी श्लोक अर्थ सहित जोड़े जाएंगे:
अध्याय 13 - "क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विवेक योग", जिसमें श्रीकृष्ण आत्मा और शरीर, चेतना और पदार्थ का भेद स्पष्ट करते हैं। यह श्रीकृष्ण आत्मा और शरीर, चेतना और प्रकृति के बीच का भेद स्पष्ट करते हैं। यह अध्याय ज्ञान और विवेक की भूमि है, जो आत्मा को उसका असली स्वरूप पहचानने की ओर ले जाता है।
शलोक # 1
अर्जुन उवाच
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ||13:1||
arjuna uvāca
prakṛtiṅ puruṣaṅ caiva kṣētraṅ kṣētrajñamēva ca.
ētadvēditumicchāmi jñānaṅ jñēyaṅ ca kēśava||13:1||
भावार्थ : अर्जुन पूछते हैं-हे केशव! मैं जानना चाहता हूँ प्रकृति क्या है, पुरुष कौन है, क्षेत्र क्या है और क्षेत्रज्ञ कौन है, तथा ज्ञान और ज्ञेय क्या हैं?
🪔 यह प्रश्न आत्म-जिज्ञासा का शुद्ध स्वरूप है-"मैं कौन हूँ?" यही विवेक की शुरुआत है। ||13:01||
🌺 इस प्रकार श्लोक 13.1 से 13.10 तक आत्मविवेक का प्रथम द्वार खुलता है। यहाँ 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रज्ञ' की पहचान, शरीर और आत्मा का भेद, और सच्चे ज्ञान के लक्षण सामने आते हैं-जहाँ सजगता, विनय और वैराग्य ही सबसे बड़ी तपस्या बन जाते हैं।
शलोक # 2
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः||
śrī bhagavānuvāca
idaṅ śarīraṅ kauntēya kṣētramityabhidhīyatē.
ētadyō vētti taṅ prāhuḥ kṣētrajña iti tadvidaḥ||13:2||
भावार्थ : हे अर्जुन! यह शरीर 'क्षेत्र' कहलाता है, और जो इसे जानता है-वह 'क्षेत्रज्ञ' है।
🌿 शरीर वह भूमि है जहाँ जीवन घटता है, और आत्मा उसका जानकार-द्रष्टा मात्र। ||13:02||
शलोक # 3
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम||
kṣētrajñaṅ cāpi māṅ viddhi sarvakṣētrēṣu bhārata.
kṣētrakṣētrajñayōrjñānaṅ yattajjñānaṅ mataṅ mama||13:3||
भावार्थ : हे भारत! सभी शरीरों में मैं ही क्षेत्रज्ञ हूँ। और शरीर और आत्मा के इस विवेक को ही मैं सच्चा ज्ञान मानता हूँ।
🌼 यहाँ श्रीकृष्ण आत्मा की सर्वव्यापकता को प्रकट करते हैं-"मैं ही सबका द्रष्टा हूँ।" ||13:03||
शलोक # 4
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु||
tatkṣētraṅ yacca yādṛk ca yadvikāri yataśca yat.
sa ca yō yatprabhāvaśca tatsamāsēna mē śrṛṇu||13:4||
शलोक # 5
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ||
ṛṣibhirbahudhā gītaṅ chandōbhirvividhaiḥ pṛthak.
brahmasūtrapadaiścaiva hētumadbhirviniśicataiḥ||13:5||
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शलोक # 6
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ||
mahābhūtānyahaṅkārō buddhiravyaktamēva ca.
indriyāṇi daśaikaṅ ca pañca cēndriyagōcarāḥ||13:6||
भावार्थ : क्षेत्र (शरीर) क्या है, उसका स्वरूप क्या है, उसकी प्रकृति और विकार क्या हैं-इन सबको जानना ज्ञान है। यह शरीर पंचमहाभूतों से बना है, इंद्रियों, मन, अहंकार और बुद्धि का संग है।
🌀 यहाँ आत्मा को जानने का द्वार खुलता है-शरीर को जानकर हम उससे परे जा सकते हैं। ||13:04 - 13:06||
शलोक # 7
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ||
icchā dvēṣaḥ sukhaṅ duḥkhaṅ saṅghātaścētanādhṛtiḥ.
ētatkṣētraṅ samāsēna savikāramudāhṛtam||13:7||
शलोक # 8
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ||
amānitvamadambhitvamahiṅsā kṣāntirārjavam.
ācāryōpāsanaṅ śaucaṅ sthairyamātmavinigrahaḥ||13:8||
शलोक # 9
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ||
indriyārthēṣu vairāgyamanahaṅkāra ēva ca.
janmamṛtyujarāvyādhiduḥkhadōṣānudarśanam||13:9||
शलोक # 10
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ||
asakitaranabhiṣvaṅgaḥ putradāragṛhādiṣu.
nityaṅ ca samacittatvamiṣṭāniṣṭōpapattiṣu||13:10||
भावार्थ : विनम्रता, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुसेवा, आत्मज्ञान की इच्छा, विषयभोग से वैराग्य, जन्म-मरण के दुख का चिंतन, एकांत में रहना, आत्मचिंतन में लगे रहना-ये सब ज्ञान हैं। बाकी सब अज्ञान है।
🌸 यह ज्ञान का चारित्रिक स्वरूप है-यहाँ ज्ञान पुस्तकों से नहीं, आचरण से आता है। ||13:07 - 13:11||
शलोक # 11
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ||
mayi cānanyayōgēna bhakitaravyabhicāriṇī.
viviktadēśasēvitvamaratirjanasaṅsadi||13:11||
(इस श्लोक को हमने पूर्व ज्ञान के लक्षणों के अंतर्गत शामिल किया था-जहाँ श्रद्धा, वैराग्य, और आत्मनिष्ठा को 'ज्ञान' कहा गया था।)
शलोक # 12
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ||
adhyātmajñānanityatvaṅ tattvajñānārthadarśanam.
ētajjñānamiti prōktamajñānaṅ yadatōnyathā||13:12||
भावार्थ : अब मैं उस 'ज्ञेय' को बताता हूँ जिसे जानकर अमरता प्राप्त होती है-वह ब्रह्म अनादि है, परम है। वह न सत है, न असत; वह इन दोनों से परे है।
🌌 यह है परम सत्य की ओर पहला संकेत-जहाँ शब्द निष्क्रिय हो जाते हैं, केवल अनुभव शेष रहता है। ||13:12||
शलोक # 13
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ||
jñēyaṅ yattatpravakṣyāmi yajjñātvā.mṛtamaśnutē.
anādimatparaṅ brahma na sattannāsaducyatē||13:13||
भावार्थ : वह ब्रह्म सबके हाथ-पाँव है, सबकी आँखें, सिर और मुख है। वह सब ओर कानों से सुनता है और सम्पूर्ण जगत को व्याप्त करके स्थित है।
🌿 यहाँ ब्रह्म कोई सीमित सत्ता नहीं-वह स्वयं संसार में विस्तारित चेतना है। ||13:13||
शलोक # 14
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ||
sarvataḥ pāṇipādaṅ tatsarvatō.kṣiśirōmukham.
sarvataḥ śrutimallōkē sarvamāvṛtya tiṣṭhati||13:14||
भावार्थ : वह सभी इंद्रियों में प्रकट होता है, फिर भी इंद्रियों से रहित है; वह गुणों से परे है, फिर भी उनके भोग का आधार है।
🌀 यह अद्भुत विरोधाभास ब्रह्म की महिमा है-जो सब कुछ में है, पर किसी से बंधा नहीं। ||13:14||
शलोक # 15
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ||
sarvēndriyaguṇābhāsaṅ sarvēndriyavivarjitam.
asaktaṅ sarvabhṛccaiva nirguṇaṅ guṇabhōktṛ ca||13:15||
भावार्थ : वह ब्रह्म सब भूतों के बाहर और भीतर है, वह जड़ भी है, चेतन भी। वह इतना सूक्ष्म है कि जाना नहीं जा सकता-वह दूर भी है और निकट भी।
✨ यह ब्रह्म की रहस्यमय उपस्थिति को उजागर करता है-"वह वहीं है जहाँ आप हैं, फिर भी पकड़ में नहीं आता।" ||13:15||
शलोक # 16
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ||
bahirantaśca bhūtānāmacaraṅ caramēva ca.
sūkṣmatvāttadavijñēyaṅ dūrasthaṅ cāntikē ca tat||13:16||
भावार्थ : वह अद्वितीय सत्ता अविभाज्य होकर भी सभी प्राणियों में विभक्त प्रतीत होती है-वही सबका पालनकर्ता, संहारक और सृष्टिकर्ता है।
🌸 यह ब्रह्म को संसार की गति और प्राणों का स्त्रोत बताता है। ||13:16||
शलोक # 17
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ||
avibhaktaṅ ca bhūtēṣu vibhaktamiva ca sthitam.
bhūtabhartṛ ca tajjñēyaṅ grasiṣṇu prabhaviṣṇu ca||13:17||
भावार्थ : वह सभी ज्योतियों का प्रकाश है, अज्ञान रूपी अंधकार से परे है। वही जानने योग्य है, वही ज्ञान है, और वही ज्ञान से प्राप्त होता है-वह सबके हृदय में स्थित है।
🕯 यहाँ ब्रह्म स्वयं प्रकाश है-जो बाहर नहीं, भीतर की सबसे गूढ़ गहराइयों में चुपचाप प्रज्वलित है। ||13:17||
शलोक # 18
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ||
jyōtiṣāmapi tajjyōtistamasaḥ paramucyatē.
jñānaṅ jñēyaṅ jñānagamyaṅ hṛdi sarvasya viṣṭhitam||13:18||
भावार्थ : इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय का वर्णन हुआ। जो मेरा भक्त इसे समझता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
🌺 अंत में भक्ति का रहस्य फिर सामने आता है-ज्ञान से जो प्रेम जन्मे, वही मोक्ष तक ले जाता है। ||13:18||
शलोक # 19
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ||
iti kṣētraṅ tathā jñānaṅ jñēyaṅ cōktaṅ samāsataḥ.
madbhakta ētadvijñāya madbhāvāyōpapadyatē||13:19||
भावार्थ : प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि हैं। और प्रकृति से ही सारे विकार और गुण उत्पन्न होते हैं।
🌾 यह अध्याय यहीं से प्रकृति और पुरुष के संबंध की गहराई में प्रवेश करता है-जहाँ चेतना और सृष्टि का रहस्य सुलझता है। ||13:19||
🌸 इस प्रकार श्लोक 13.11 से 13.19 तक ब्रह्म, आत्मा और चेतना की एक दिव्य झलक मिलती है। यहाँ ज्ञान अब सूचनाओं तक सीमित नहीं, बल्कि एक आलोकिक अनुभव बन जाता है-जहाँ जानने वाला स्वयं जानने योग्य में विलीन हो जाता है।
शलोक # 20
ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुष का विषय
श्रीभगवानुवाच
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ||
prakṛtiṅ puruṣaṅ caiva viddhyanādī ubhāvapi.
vikārāṅśca guṇāṅścaiva viddhi prakṛtisaṅbhavān||13:20||
भावार्थ : प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं। प्रकृति से ही सारे विकार और त्रिगुण उत्पन्न होते हैं।
🌱 यहाँ श्रीकृष्ण बताते हैं-बाह्य परिवर्तन प्रकृति से आते हैं, चेतना का मूल पुरुष है। ||13:20||
अध्याय 13 - "क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विवेक योग" के शेष श्लोकों (13.20 से 13.35 तक) की ओर बढ़ते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण प्रकृति और पुरुष, जन्म के कारण, आत्मा की अजरता, और परमात्मा की सर्वव्याप्त स्थिति पर प्रकाश डालते हैं। यह ज्ञान आत्म-विमर्श को गहराता है, जहाँ दृष्टा और दृश्य का रहस्य पूरी तरह खुलता है।
शलोक # 21
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ||
kāryakāraṇakartṛtvē hētuḥ prakṛtirucyatē.
puruṣaḥ sukhaduḥkhānāṅ bhōktṛtvē hēturucyatē||13:21||
भावार्थ : सृष्टि के कारण और परिणाम का कारण प्रकृति है, जबकि सुख-दुःख का भोक्ता पुरुष (आत्मा) है।
🔍 यह दृश्य और द्रष्टा के भेद का बिंदु है-प्रकृति क्रिया है, आत्मा साक्षी है। ||13:21||
शलोक # 22
कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ||
puruṣaḥ prakṛtisthō hi bhuṅktē prakṛtijānguṇān.
kāraṇaṅ guṇasaṅgō.sya sadasadyōnijanmasu||13:22||
भावार्थ : पुरुष प्रकृति के सम्पर्क में आकर गुणों का अनुभव करता है, और गुणों से आसक्ति के कारण ही वह विभिन्न योनियों में जन्म लेता है।
🌀 यह बंधन का रहस्य खोलता है-आसक्ति ही पुनर्जन्म की जड़ है। ||13:22||
शलोक # 23
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ||
upadraṣṭā.numantā ca bhartā bhōktā mahēśvaraḥ.
paramātmēti cāpyuktō dēhē.sminpuruṣaḥ paraḥ||13:23||
भावार्थ : यह पुरुष परमात्मा है-साक्षी है, अनुमति देने वाला है, पालनकर्ता है, भोक्ता है, और परम ईश्वर भी वही है। वही इस शरीर में स्थित परमपुरुष है।
🌟 यहाँ आत्मा से ऊपर परमात्मा का रूप प्रकट होता है-वह जो सदा साक्षी, फिर भी सर्वसंचालक है। ||13:23||
शलोक # 24
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ||
ya ēvaṅ vētti puruṣaṅ prakṛtiṅ ca guṇaiḥsaha.
sarvathā vartamānō.pi na sa bhūyō.bhijāyatē||13:24||
भावार्थ : जो इस प्रकार पुरुष और प्रकृति को गुणों सहित जानता है, वह चाहे जैसा जीवन जीए-जन्म-मरण के चक्र में फिर नहीं पड़ता।
🕊 सच्चा ज्ञान ही मुक्ति की कुंजी है। ||13:24||
शलोक # 25
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ||
dhyānēnātmani paśyanti kēcidātmānamātmanā.
anyē sāṅkhyēna yōgēna karmayōgēna cāparē||13:25||
भावार्थ : कुछ लोग ध्यान से आत्मा को आत्मा में देखते हैं, कुछ सांख्य योग से, और कुछ कर्म योग के मार्ग से।
🌈 यहाँ विविध योगों को मोक्ष का साधन कहा गया-रास्ते अलग, लक्ष्य एक। ||13:25||
शलोक # 26
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ||
anyē tvēvamajānantaḥ śrutvā.nyēbhya upāsatē.
tē.pi cātitarantyēva mṛtyuṅ śrutiparāyaṇāḥ||13:26||
भावार्थ : जो स्वयं नहीं जानते, वे दूसरों से सुनकर भक्ति करते हैं। और वे भी मृत्यु को पार कर जाते हैं, क्योंकि वे श्रद्धा से युक्त हैं।
🌸 श्रवण भी उतना ही शक्तिशाली है यदि वह श्रद्धा से भरा हो। ||13:26||
शलोक # 27
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ||
yāvatsañjāyatē kiñcitsattvaṅ sthāvarajaṅgamam.
kṣētrakṣētrajñasaṅyōgāttadviddhi bharatarṣabha||13:27||
भावार्थ : संसार में जो कुछ भी स्थावर या जंगम उत्पन्न होता है, वह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से होता है।
🌍 संसार स्वयं एक प्रयोगशाला है-जहाँ आत्मा और प्रकृति का अद्भुत मिलन चलता है। ||13:27||
शलोक # 28
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ||
samaṅ sarvēṣu bhūtēṣu tiṣṭhantaṅ paramēśvaram.
vinaśyatsvavinaśyantaṅ yaḥ paśyati sa paśyati||13:28||
भावार्थ : जो सभी प्राणियों में परमेश्वर को समान रूप से स्थित देखता है-नाशवान शरीर में भी अनश्वर आत्मा को पहचानता है-वही सच्चा दृष्टा है।
🪔 यह समदृष्टि की घोषणा है-"सब में एक, एक में सब।" ||13:28||
शलोक # 29
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ||
samaṅ paśyanhi sarvatra samavasthitamīśvaram.
na hinastyātmanā||tmānaṅ tatō yāti parāṅ gatim||13:29||
भावार्थ : जो ईश्वर को सबमें समान देखता है, वह किसी को हानि नहीं पहुँचाता, और इस कारण परम गति को प्राप्त होता है।
💖 समता ही परमात्मा का मार्ग है। ||13:29||
शलोक # 30
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ||
prakṛtyaiva ca karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśaḥ.
yaḥ paśyati tathā||tmānamakartāraṅ sa paśyati||13:30||
भावार्थ : जो देखता है कि सभी कर्म प्रकृति द्वारा ही हो रहे हैं, और आत्मा अकर्ता है-वही सच्चा ज्ञानी है।
🌀 यह बंधन काटने का सूत्र है-"मैं नहीं करता, प्रकृति करती है।" ||13:30||
शलोक # 31
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ||
yadā bhūtapṛthagbhāvamēkasthamanupaśyati.
tata ēva ca vistāraṅ brahma sampadyatē tadā||13:31||
भावार्थ : जब कोई समस्त भूतों की अनेकता को एक में स्थित देखता है, तब वह ब्रह्म में प्रवेश कर जाता है।
🌈 अनेकता में एकता देखना ही ब्रह्मदृष्टि है। ||13:31||
शलोक # 32
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ||
anāditvānnirguṇatvātparamātmāyamavyayaḥ.
śarīrasthō.pi kauntēya na karōti na lipyatē||13:32||
भावार्थ : यह परमात्मा अनादि और निर्गुण है-इसलिए शरीर में स्थित होकर भी न कुछ करता है, न किसी से लिप्त होता है।
🌿 जैसे कमल जल में रहकर भी भीगता नहीं, वैसे ही परमात्मा संसार में रहकर भी अलिप्त है। ||13:32||
शलोक # 33
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ||
yathā sarvagataṅ saukṣmyādākāśaṅ nōpalipyatē.
sarvatrāvasthitō dēhē tathā||tmā nōpalipyatē||13:33||
भावार्थ : जैसे आकाश सर्वव्यापी होकर भी किसी से लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा शरीर में स्थित होकर भी निष्कलंक रहती है।
☁️ आकाश की तरह आत्मा भी बस 'होती' है-बिना किसी आसक्ति के। ||13:33||
शलोक # 34
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ||
yathā prakāśayatyēkaḥ kṛtsnaṅ lōkamimaṅ raviḥ.
kṣētraṅ kṣētrī tathā kṛtsnaṅ prakāśayati bhārata||13:34||
भावार्थ : जैसे एक सूर्य सारे संसार को प्रकाशित करता है, वैसे ही क्षेत्रज्ञ समस्त शरीर को चेतना प्रदान करता है।
☀️ आत्मा स्वयं प्रकाश है-वह जिससे जीवन रोशन है। ||13:34||
शलोक # 35
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ||
kṣētrakṣētrajñayōrēvamantaraṅ jñānacakṣuṣā.
bhūtaprakṛtimōkṣaṅ ca yē viduryānti tē param||13:35||
भावार्थ : जो ज्ञान की दृष्टि से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को जानते हैं, वे प्रकृति से मुक्त हो जाते हैं और परम पद को प्राप्त करते हैं।
🌺 यह मुक्तिद्वार का उद्घोष है-"जानो और मुक्त हो जाओ।" ||13:35||
✨ इस प्रकार अध्याय 13 - "क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विवेक योग" पूर्ण होता है। यह अध्याय आत्मा और ब्रह्म के बीच के रहस्य को उजागर करता है। जब 'द्रष्टा' और 'दृश्य' का भेद स्पष्ट हो जाए, तब जीवन बंधन नहीं, साधना बन जाता है।
🧘 Conclusion (निष्कर्ष)
भगवद गीता का यह अध्याय बताता है कि शरीर नश्वर है पर आत्मा अमरसच्चा ज्ञान केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं बल्कि आत्मा की पहचानपरमात्मा हर जगह विद्यमान
यदि आप अध्याय 12 - भक्ति योग पढ़ चुके हैं, तो आप समझ पाएंगे कि यह अध्याय भक्ति से आगे बढ़कर दर्शन और तत्वज्ञान
अन्य उपयोगी लिंक
- अध्याय 1 - अर्जुन विषाद योग
- अध्याय 2 - सांख्य योग
- अध्याय 3 - कर्म योग
- अध्याय 4 - ज्ञान कर्म संन्यास योग
- अध्याय 5 - संन्यास योग
- अध्याय 6 - ध्यान योग
- अध्याय 7 - ज्ञान विज्ञान योग
- अध्याय 8 - अक्षर ब्रह्म योग
- अध्याय 9 - राजविद्या राजगुह्य योग
- अध्याय 10 - विभूति योग
- अध्याय 11 - विश्वरूप दर्शन योग
- अध्याय 12 - भक्ति योग
❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का क्या अर्थ है?
शरीर को क्षेत्र कहा जाता है और जो इस शरीर को जानता है यानी आत्मा, वह क्षेत्रज्ञ कहलाती है।
भगवान श्रीकृष्ण ने क्षेत्रज्ञ को कौन बताया है?
श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह स्वयं सभी शरीरों के भीतर स्थित क्षेत्रज्ञ हैं। यानी परमात्मा सभी आत्माओं में विद्यमान है।
क्या यह अध्याय आत्मा के ज्ञान पर केंद्रित है?
हां, यह अध्याय आत्मा, शरीर और परमात्मा के संबंध की गहराई को दर्शाता है।
क्या इस ज्ञान से मोक्ष प्राप्त हो सकता है?
भगवद गीता के अनुसार, जो इस ज्ञान को समझ लेता है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो सकता है।
क्या यह अध्याय वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है?
जी हां, इसमें तत्व, गुण, चेतना, और अस्तित्व जैसे विषयों पर गहराई से चर्चा की गई है, जो भारतीय दर्शन की वैज्ञानिकता को सिद्ध करता है।
