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दाहिनी ओर रथ पर सवार होकर अर्जुन को सलाह देते हुए भगवान कृष्ण का चित्रण और बायीं ओर 'भगवद गीता | अध्याय 9 | राजविद्या राजगुह्य योग श्लोक अर्थ सहित' लिखा हुआ है।

भगवद गीता - अध्याय 9
राजविद्या राजगुह्य योग - श्लोक और अर्थ सहित

🧡 Introduction (परिचय)

भगवद गीता के नवम अध्याय का नाम है राजविद्या राजगुह्य योग, जिसका अर्थ है - ज्ञानों में श्रेष्ठ और रहस्यों में सबसे गोपनीय ज्ञान। भगवान श्रीकृष्ण इस अध्याय में अर्जुन को वह ज्ञान प्रदान करते हैं जो भक्ति, सच्चे आत्मसमर्पण और परम सत्य को उजागर करता है।

यह अध्याय हमें बताता है कि भगवान सर्वव्यापी हैं, फिर भी वे अपने भक्तों के लिए सुलभ और प्रिय हैं। यह अध्याय भक्ति के महत्व को सर्वोपरि रूप में प्रस्तुत करता है।

यदि आपने अध्याय 8 - अक्षर ब्रह्म योग नहीं पढ़ा है, तो पहले उसे ज़रूर पढ़ें। अन्य अध्यायों की सूची के लिए श्रीमद भगवद गीता हिंदी पर जाएं।


श्लोक और हिंदी अर्थ

👇 इस सेक्शन में आप अध्याय 9 के सभी श्लोक और उनके हिंदी में भावार्थ जोड़ सकते हैं:

अध्याय 9 - राजविद्या राजगुह्य योग में - यह श्रीकृष्ण भक्ति की सर्वोच्चता, ईश्वर की व्यापकता, और गूढ़तम ज्ञान को प्रकट करते हैं। यह ज्ञान राजाओं का भी राजा है - सीधा, पवित्र, और आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाला।


अध्याय # 9
शलोक # 1
परम गोपनीय ज्ञानोपदेश, उपासनात्मक ज्ञान, ईश्वर का विस्तार

श्रीभगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्||9:1||

śrī bhagavānuvāca
idaṅ tu tē guhyatamaṅ pravakṣyāmyanasūyavē.
jñānaṅ vijñānasahitaṅ yajjñātvā mōkṣyasē.śubhāt||9:1||

भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले-हे अर्जुन! मैं तुझ निष्कपट भक्त को यह परम गोपनीय ज्ञान और विज्ञान सहित तत्व बताने जा रहा हूँ, जिसे जानकर तू इस दुखरूप संसार से मुक्त हो जाएगा।

🌿 यह श्लोक बताता है कि सच्चे श्रद्धावान को ही ईश्वर अपना हृदय खोलते हैं। ||9:01||

अध्याय # 9
शलोक # 2
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ||9:2||

rājavidyā rājaguhyaṅ pavitramidamuttamam.
pratyakṣāvagamaṅ dharmyaṅ susukhaṅ kartumavyayam||9:2||

भावार्थ: यह ज्ञान विद्याओं का राजा, गूढ़तम रहस्य, अत्यंत पवित्र, प्रत्यक्ष अनुभव योग्य, धर्मयुक्त, सुगम और अविनाशी है।

🌺 यह श्लोक दर्शाता है कि भक्ति केवल भाव नहीं-वह अनुभव है, और सहज है। ||9:02||
अध्याय # 9
शलोक # 3
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ||9:3||

aśraddadhānāḥ puruṣā dharmasyāsya parantapa.
aprāpya māṅ nivartantē mṛtyusaṅsāravartmani||9:3||

भावार्थ: हे परंतप! जो इस धर्म में श्रद्धा नहीं रखते, वे मुझे प्राप्त नहीं कर पाते और मृत्यु के संसार में भटकते रहते हैं।

🌼 यह श्लोक चेतावनी है-श्रद्धा के बिना ज्ञान भी अधूरा है। ||9:03||
अध्याय # 9
शलोक # 4
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेषवस्थितः ||9:4||

mayā tatamidaṅ sarvaṅ jagadavyaktamūrtinā.
matsthāni sarvabhūtāni na cāhaṅ tēṣvavasthitaḥ||9:4||

भावार्थ: यह सम्पूर्ण जगत मेरे अव्यक्त रूप से व्याप्त है। सभी प्राणी मुझमें स्थित हैं, पर मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।

🌸 यह श्लोक अद्वैत का रहस्य है-ईश्वर सबमें है, पर सब ईश्वर नहीं हैं। ||9:04||
अध्याय # 9
शलोक # 5
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ||9:5||

na ca matsthāni bhūtāni paśya mē yōgamaiśvaram.
bhūtabhṛnna ca bhūtasthō mamātmā bhūtabhāvanaḥ||9:5||

भावार्थ: वास्तव में प्राणी मुझमें स्थित नहीं हैं-यह मेरी ईश्वरीय योगशक्ति का चमत्कार है। मैं सबका धारणकर्ता और उत्पन्नकर्ता हूँ, फिर भी उनमें स्थित नहीं हूँ।

🌿 यह श्लोक ईश्वर की अलौकिकता को दर्शाता है-वह सब कुछ करते हैं, फिर भी अकर्ता हैं। ||9:05||

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अध्याय # 9
शलोक # 6
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ||9:6||

yathā||kāśasthitō nityaṅ vāyuḥ sarvatragō mahān.
tathā sarvāṇi bhūtāni matsthānītyupadhāraya||9:6||

भावार्थ: जैसे वायु आकाश में स्थित होकर सर्वत्र विचरती है, वैसे ही सभी प्राणी मुझमें स्थित हैं-ऐसा जान।

🌺 यह श्लोक ईश्वर की व्यापकता की सुंदर उपमा है। ||9:06||
अध्याय # 9
शलोक # 7
जगत की उत्पत्ति का विषय
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ||9:7||

sarvabhūtāni kauntēya prakṛtiṅ yānti māmikām.
kalpakṣayē punastāni kalpādau visṛjāmyaham||9:7||

भावार्थ: हे अर्जुन! कल्प के अंत में सभी प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं, और कल्प के प्रारंभ में मैं उन्हें पुनः उत्पन्न करता हूँ।

🌼 यह श्लोक सृष्टि और प्रलय के चक्र को दर्शाता है-जो ईश्वर की इच्छा से चलता है। ||9:07||
अध्याय # 9
शलोक # 8
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ||9:8||

prakṛtiṅ svāmavaṣṭabhya visṛjāmi punaḥ punaḥ.
bhūtagrāmamimaṅ kṛtsnamavaśaṅ prakṛtērvaśāt||9:8||

भावार्थ: मैं अपनी प्रकृति को अधीन करके बार-बार समस्त प्राणियों की सृष्टि करता हूँ, जो प्रकृति के वश में होते हैं।

🌸 यह श्लोक दर्शाता है कि जीव प्रकृति के अधीन है, पर ईश्वर प्रकृति के अधिपति हैं। ||9:08||
अध्याय # 9
शलोक # 9
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ||9:9||

na ca māṅ tāni karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya.
udāsīnavadāsīnamasaktaṅ tēṣu karmasu||9:9||

भावार्थ: हे धनंजय! ये कर्म मुझे बांधते नहीं, क्योंकि मैं उदासीन भाव से, आसक्ति रहित होकर उनमें स्थित रहता हूँ।

🌿 यह श्लोक निष्कामता की पराकाष्ठा है-जहाँ ईश्वर भी अकर्ता होकर सब करता है। ||9:09||
अध्याय # 9
शलोक # 10
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरं ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ||9:10||

mayā.dhyakṣēṇa prakṛtiḥ sūyatē sacarācaram.
hētunā.nēna kauntēya jagadviparivartatē||9:10||

भावार्थ: हे कौन्तेय! मेरे अधिष्ठान से ही प्रकृति चराचर जगत की सृष्टि करती है, और इसी कारण संसार का चक्र चलता रहता है।

🌺 यह श्लोक बताता है कि ईश्वर ही सृष्टि के पीछे की चेतना हैं-अदृश्य, परंतु सर्वव्यापी। ||9:10||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को माया से मोहित जीवों, महात्माओं की भक्ति, और ईश्वर की सर्वव्यापकता की ओर ले जा रहे हैं। अब गीता भक्ति की महिमा और ईश्वर की करुणा को प्रकट करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 9
शलोक # 11
अध्याय 9 - राजविद्या राजगुह्य योग के श्लोक 11 से 22 - जहाँ श्रीकृष्ण माया से मोहित जीवों, महात्माओं की भक्ति, और ईश्वर की सर्वव्यापकता का रहस्य प्रकट करते हैं।

भगवान का तिरस्कार करने वाले आसुरी प्रकृति वालों की निंदा और देवी प्रकृति वालों के भगवद् भजन का प्रकार
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ||9:11||

avajānanti māṅ mūḍhā mānuṣīṅ tanumāśritam.
paraṅ bhāvamajānantō mama bhūtamahēśvaram||9:11||

भावार्थ: मूढ़ लोग मुझे मनुष्य शरीर में स्थित देखकर तुच्छ समझते हैं, क्योंकि वे मेरे परम दिव्य स्वरूप और सभी प्राणियों के अधिपति रूप को नहीं जानते।

🌿 यह श्लोक बताता है कि ईश्वर जब मानव रूप में आते हैं, तो अज्ञानी उन्हें साधारण मान लेते हैं। ||9:11||
अध्याय # 9
शलोक # 12
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ||9:12||

mōghāśā mōghakarmāṇō mōghajñānā vicētasaḥ.
rākṣasīmāsurīṅ caiva prakṛtiṅ mōhinīṅ śritāḥ||9:12||

भावार्थ: जिनकी आशाएँ व्यर्थ, कर्म व्यर्थ, और ज्ञान मिथ्या होता है-वे राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को अपनाते हैं।

🌺 यह श्लोक चेतावनी है-माया में फँसा मनुष्य भ्रमित होकर अधर्म की ओर चला जाता है। ||9:12||
अध्याय # 9
शलोक # 13
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्यम् ||9:13||

mahātmānastu māṅ pārtha daivīṅ prakṛtimāśritāḥ.
bhajantyananyamanasō jñātvā bhūtādimavyayam||9:13||

भावार्थ: परंतु हे पार्थ! दैवी प्रकृति वाले महात्मा मुझे सभी प्राणियों का सनातन कारण और अविनाशी जानकर अनन्य मन से मेरी भक्ति करते हैं।

🌼 यह श्लोक सच्चे भक्त की पहचान है-जो ईश्वर को तत्त्व से जानकर प्रेम करता है। ||9:13||
अध्याय # 9
शलोक # 14
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ||9:14||

satataṅ kīrtayantō māṅ yatantaśca dṛḍhavratāḥ.
namasyantaśca māṅ bhaktyā nityayuktā upāsatē||9:14||

भावार्थ: वे महात्मा निरंतर मेरा नाम-गुणगान करते हैं, दृढ़ संकल्प से प्रयास करते हैं, भक्ति से नमस्कार करते हैं और सदा मुझमें लीन रहते हैं।

🌸 यह श्लोक भक्ति की जीवंत छवि है-जहाँ साधक हर क्षण ईश्वर में रमण करता है। ||9:14||
अध्याय # 9
शलोक # 15
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ते यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्||9:15||

jñānayajñēna cāpyanyē yajantō māmupāsatē.
ēkatvēna pṛthaktvēna bahudhā viśvatōmukham||9:15||

भावार्थ: कुछ ज्ञानी ज्ञानयज्ञ द्वारा मुझे एकत्व में पूजते हैं, कुछ विराट रूप में अनेक रूपों में मेरी उपासना करते हैं।

🌟 यह श्लोक दर्शाता है कि भक्ति के मार्ग अनेक हैं-परंतु लक्ष्य एक ही है: ईश्वर। ||9:15||
अध्याय # 9
शलोक # 16
सर्वात्म रूप से प्रभाव सहित भगवान के स्वरूप का वर्णन
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ||9:16||

ahaṅ kraturahaṅ yajñaḥ svadhā.hamahamauṣadham.
maṅtrō.hamahamēvājyamahamagnirahaṅ hutam||9:16||

भावार्थ: मैं ही वेदिक यज्ञ, स्वधा, औषधि, मंत्र, घृत, अग्नि और हवन की आहुति हूँ।

🌿 यह श्लोक बताता है कि यज्ञ की हर क्रिया में भी ईश्वर ही प्रकट हैं। ||9:16||
अध्याय # 9
शलोक # 17
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ||9:17||

pitā.hamasya jagatō mātā dhātā pitāmahaḥ.
vēdyaṅ pavitramōṅkāra ṛk sāma yajurēva ca||9:17||

भावार्थ: मैं इस जगत का पिता, माता, धारणकर्ता और पितामह हूँ। मैं ही जानने योग्य, पवित्र ओंकार, और ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद भी हूँ।

🌺 यह श्लोक ईश्वर की सर्वरूपता को प्रकट करता है-वह आदि, मध्य और अंत हैं। ||9:17||
अध्याय # 9
शलोक # 18
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्||9:18||

gatirbhartā prabhuḥ sākṣī nivāsaḥ śaraṇaṅ suhṛt.
prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṅ nidhānaṅ bījamavyayam||9:18||

भावार्थ: मैं ही गति (लक्ष्य), भरण-पोषण करने वाला, स्वामी, साक्षी, निवास, शरण, सखा, सृष्टि का कारण, प्रलय का हेतु, आधार, निधान और अविनाशी बीज हूँ।

🌼 यह श्लोक ईश्वर को जीवन के हर पहलू में उपस्थित बताता है। ||9:18||
अध्याय # 9
शलोक # 19
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ||9:19||

tapāmyahamahaṅ varṣaṅ nigṛhṇāmyutsṛjāmi ca.
amṛtaṅ caiva mṛtyuśca sadasaccāhamarjuna||9:19||

भावार्थ: हे अर्जुन! मैं ही सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ, अमृत और मृत्यु भी मैं ही हूँ, और सत्-असत् भी मैं ही हूँ।

🌸 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर ही जीवन और मृत्यु दोनों के पार हैं। ||9:19||
अध्याय # 9
शलोक # 20
सकाम और निष्काम उपासना का फल
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ||9:20||

traividyā māṅ sōmapāḥ pūtapāpā
yajñairiṣṭvā svargatiṅ prārthayantē.
tē puṇyamāsādya surēndralōka-
maśnanti divyāndivi dēvabhōgān||9:20||
अध्याय # 9
शलोक # 21
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालंक्षीणे पुण्य मर्त्यलोकं विशन्ति।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ||9:21||

tē taṅ bhuktvā svargalōkaṅ viśālaṅ
kṣīṇē puṇyē martyalōkaṅ viśanti.
ēva trayīdharmamanuprapannā
gatāgataṅ kāmakāmā labhantē||9:21||

भावार्थ: वेदों के ज्ञाता, सोमपान करने वाले, यज्ञों द्वारा मेरी पूजा कर स्वर्ग की कामना करते हैं। वे स्वर्ग में दिव्य भोग भोगते हैं, परंतु पुण्य क्षीण होने पर फिर मृत्युलोक में लौट आते हैं। इस प्रकार कामनाओं से प्रेरित होकर वे आवागमन के चक्र में फँसे रहते हैं।

🌿 यह श्लोक बताता है कि सकाम भक्ति सीमित फल देती है-मोक्ष नहीं। ||9:20 - 9:21||
अध्याय # 9
शलोक # 22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ||9:22||

ananyāśicantayantō māṅ yē janāḥ paryupāsatē.
tēṣāṅ nityābhiyuktānāṅ yōgakṣēmaṅ vahāmyaham||9:22||

भावार्थ: जो अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हैं और निरंतर मेरी भक्ति करते हैं-उनका योगक्षेम (जो नहीं है उसे देना और जो है उसकी रक्षा करना) मैं स्वयं वहन करता हूँ।

🌟 यह श्लोक भक्ति का वचन है-जहाँ ईश्वर स्वयं अपने भक्त का भार उठाते हैं। ||9:22||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को अन्य देवताओं की पूजा, उसके सीमित फल, और ईश्वर की सर्वोच्चता की ओर ले जा रहे हैं। अब गीता सच्ची भक्ति और ईश्वर की करुणा को प्रकट करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 9
शलोक # 23
अध्याय 9 - राजविद्या राजगुह्य योग के अंतिम श्लोकों की ओर बढ़ते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण अन्य देवताओं की पूजा, सच्ची भक्ति की महिमा, और ईश्वर की करुणा को प्रकट करते हैं। यह वह मार्ग है जहाँ साधक सभी कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर परम शांति को प्राप्त करता है।

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ||9:23||

yē.pyanyadēvatā bhaktā yajantē śraddhayā.nvitāḥ.
tē.pi māmēva kauntēya yajantyavidhipūrvakam||9:23||

भावार्थ: हे कौन्तेय! जो श्रद्धा से अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, वे भी वास्तव में मेरी ही पूजा करते हैं, परंतु विधिवत नहीं।

🌿 यह श्लोक बताता है कि सभी पूजा अंततः ईश्वर तक पहुँचती है, परंतु सीधा मार्ग श्रेष्ठ है। ||9:23||
अध्याय # 9
शलोक # 24
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ||9:24||

ahaṅ hi sarvayajñānāṅ bhōktā ca prabhurēva ca.
na tu māmabhijānanti tattvēnātaścyavanti tē||9:24||

भावार्थ: मैं ही सभी यज्ञों का भोक्ता और स्वामी हूँ, परंतु जो मुझे तत्त्व से नहीं जानते, वे विचलित हो जाते हैं।

🌺 यह श्लोक चेतावनी है-ज्ञानहीन भक्ति भ्रम में डाल सकती है। ||9:24||
अध्याय # 9
शलोक # 25
यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ||9:25||

yānti dēvavratā dēvān pitṛnyānti pitṛvratāḥ.
bhūtāni yānti bhūtējyā yānti madyājinō.pi mām||9:25||

भावार्थ: देवताओं की पूजा करने वाले देवताओं को, पितरों की पूजा करने वाले पितरों को, भूतों की पूजा करने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं-परंतु मेरी भक्ति करने वाले मुझे प्राप्त होते हैं।

🌼 यह श्लोक स्पष्ट करता है-भक्ति का लक्ष्य जैसा होगा, फल भी वैसा ही होगा। ||9:25||
अध्याय # 9
शलोक # 26
निष्काम भगवद् भक्ति की महिमा
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ||9:26||

patraṅ puṣpaṅ phalaṅ tōyaṅ yō mē bhaktyā prayacchati.
tadahaṅ bhaktyupahṛtamaśnāmi prayatātmanaḥ||9:26||

भावार्थ: जो भक्त पत्र, पुष्प, फल या जल भी भक्ति से अर्पित करता है, मैं उसे प्रेमपूर्वक स्वीकार करता हूँ।

🌸 यह श्लोक भक्ति की सरलता और ईश्वर की करुणा का प्रतीक है। ||9:26||
अध्याय # 9
शलोक # 27
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ||9:27||

yatkarōṣi yadaśnāsi yajjuhōṣi dadāsi yat.
yattapasyasi kauntēya tatkuruṣva madarpaṇam||9:27||

भावार्थ: हे कौन्तेय! जो कुछ तू करता है, खाता है, यज्ञ करता है, दान देता है, तप करता है-वह सब मुझे अर्पित कर।

🌿 यह श्लोक कर्मयोग और भक्ति का संगम है-जहाँ हर कर्म समर्पण बन जाता है। ||9:27||
अध्याय # 9
शलोक # 28
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्य से कर्मबंधनैः ।
सन्न्यासयोगमुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ||9:28||

śubhāśubhaphalairēvaṅ mōkṣyasē karmabandhanaiḥ.
saṅnyāsayōgayuktātmā vimuktō māmupaiṣyasi||9:28||

भावार्थ: इस प्रकार शुभ और अशुभ कर्मों के बंधनों से मुक्त होकर, तू त्यागयुक्त योगी बनकर मुझे प्राप्त करेगा।

🌺 यह श्लोक मोक्ष का वचन है-जहाँ समर्पण ही मुक्ति का द्वार है। ||9:28||
अध्याय # 9
शलोक # 29
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ||9:29||

samō.haṅ sarvabhūtēṣu na mē dvēṣyō.sti na priyaḥ.
yē bhajanti tu māṅ bhaktyā mayi tē tēṣu cāpyaham||9:29||

भावार्थ: मैं सभी प्राणियों में समभाव रखता हूँ-न कोई मुझे प्रिय है, न अप्रिय। परंतु जो भक्ति से मुझे भजते हैं, मैं उनमें और वे मुझमें स्थित हो जाते हैं।

🌼 यह श्लोक दर्शाता है कि भक्ति ईश्वर को भी भक्त के अधीन कर देती है। ||9:29||
अध्याय # 9
शलोक # 30
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ||9:30||

api cētsudurācārō bhajatē māmananyabhāk.
sādhurēva sa mantavyaḥ samyagvyavasitō hi saḥ||9:30||

भावार्थ: यदि कोई अत्यंत पापी भी अनन्य भक्ति से मेरी पूजा करता है, तो वह साधु ही माना जाता है-क्योंकि उसका संकल्प शुद्ध है।

🌸 यह श्लोक ईश्वर की असीम करुणा का प्रतीक है-भक्ति से सब पाप धुल जाते हैं। ||9:30||
अध्याय # 9
शलोक # 31
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ||9:31||

kṣipraṅ bhavati dharmātmā śaśvacchāntiṅ nigacchati.
kauntēya pratijānīhi na mē bhaktaḥ praṇaśyati||9:31||

भावार्थ: वह शीघ्र ही धार्मिक बन जाता है और शाश्वत शांति को प्राप्त करता है। हे कौन्तेय! घोषणा कर दो-मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।

🌟 यह श्लोक गीता का हृदय है-ईश्वर अपने भक्त की रक्षा का वचन देते हैं। ||9:31||
अध्याय # 9
शलोक # 32
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ||9:32||

māṅ hi pārtha vyapāśritya yē.pi syuḥ pāpayōnayaḥ.
striyō vaiśyāstathā śūdrāstē.pi yānti parāṅ gatim||9:32||

भावार्थ: हे पार्थ! जो स्त्री, वैश्य, शूद्र या पापयोनि भी मेरी शरण लेते हैं, वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं।

🌿 यह श्लोक बताता है कि भक्ति में कोई भेद नहीं-ईश्वर सबके हैं। ||9:32||
अध्याय # 9
शलोक # 33
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ||9:33||

kiṅ punarbrāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣayastathā.
anityamasukhaṅ lōkamimaṅ prāpya bhajasva mām||9:33||

भावार्थ: फिर पुण्यात्मा ब्राह्मण और राजर्षि भक्तों की क्या बात! इसलिए इस अनित्य और दुखमय संसार को पाकर मेरी भक्ति कर।

🌺 यह श्लोक प्रेरणा है-संसार दुखमय है, पर भक्ति से परम सुख संभव है। ||9:33||
अध्याय # 9
शलोक # 34
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण: ||9:34||

manmanā bhava madbhaktō madyājī māṅ namaskuru.
māmēvaiṣyasi yuktvaivamātmānaṅ matparāyaṇaḥ||9:34||

भावार्थ: मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे नमस्कार करो-इस प्रकार मुझे ही परम लक्ष्य मानकर तुम मुझे ही प्राप्त करोगे।

🌸 यह श्लोक गीता का सार है-जहाँ प्रेम, समर्पण और भक्ति से ईश्वर सुलभ हो जाते हैं। ||9:34||

🌟 इस प्रकार अध्याय 9 - "राजविद्या राजगुह्य योग" पूर्ण होता है। यह केवल ज्ञान नहीं, प्रेम और विश्वास से ईश्वर को पाने की सरलतम राह है।


🧘 Conclusion (निष्कर्ष)

अध्याय 9 हमें यह सिखाता है कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए न तो जटिल यज्ञों की आवश्यकता है, न ही कठोर तप की। केवल सच्ची भक्ति, प्रेम, श्रद्धा और समर्पण ही हमें ईश्वर तक पहुँचा सकते हैं।

भगवान यह भी कहते हैं कि जो भक्त अनन्य भाव से उनका स्मरण करते हैं, वे उन्हें अत्यंत प्रिय होते हैं और वे स्वयं उनकी रक्षा करते हैं।


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❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

राजविद्या राजगुह्य योग का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - राजाओं के समान श्रेष्ठ ज्ञान और सबसे गोपनीय रहस्य। यह अध्याय भक्ति और ईश्वर के स्वरूप का ज्ञान देता है।

क्या भगवान केवल ज्ञानी योगियों के लिए ही सुलभ हैं?

नहीं, भगवान कहते हैं कि वे अपने सच्चे भक्तों के लिए सुलभ हैं, चाहे वे किसी भी वर्ग, जाति या अवस्था के हों।

भक्ति कैसे करें, इसका उल्लेख कहाँ है?

भगवान कहते हैं - "पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति..." अर्थात प्रेमपूर्वक अर्पित की गई कोई भी चीज़ उन्हें प्रिय है।

क्या भक्ति से सभी पाप समाप्त हो जाते हैं?

हाँ, भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि "भक्ति में लगे हुए लोग शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाते हैं और शांति तथा मोक्ष प्राप्त करते हैं।"

इस अध्याय से क्या मुख्य संदेश मिलता है?

यह अध्याय हमें सिखाता है कि सच्चा ज्ञान, भक्ति और आत्मसमर्पण से हम ईश्वर को पा सकते हैं, और यही राजविद्या है।


लेखक: शाइनकैप टीम | प्रकाशित: | संशोधित: