भगवद गीता - अध्याय 2
सांख्य योग - श्लोक, भावार्थ व अर्थ सहित
🧡 Introduction (परिचय)
भगवद गीता का दूसरा अध्याय सांख्य योग कहलाता है। यह अध्याय श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए पहले उपदेश के रूप में महत्वपूर्ण है। अर्जुन जो युद्ध के मैदान में मोह और विषाद में डूबे हुए थे, उन्हें श्रीकृष्ण आत्मा, कर्म, और बुद्धि योग का ज्ञान देते हैं।
इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बताते हैं कि आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है। इस ज्ञान के साथ वे अर्जुन को कर्म करते रहने की प्रेरणा देते हैं। यह अध्याय आध्यात्मिक शिक्षा, जीवन दर्शन और कर्तव्य का महत्व बताने वाला है।
यदि आपने अभी तक अध्याय 1 नहीं पढ़ा है, तो पहले वहाँ से शुरुआत करें।
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श्लोक और हिंदी भावार्थ
👇 नीचे सभी श्लोकों को उनके संस्कृत मूल, लिप्यंतरण, और हिंदी अर्थ के साथ जोड़ें:
अध्याय 2 "सांख्य योग" भी इसी शैली में शुरू होता है।, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञान, भक्ति और कर्म का दिव्य मार्ग दिखाते हैं। यह श्रीकृष्ण अर्जुन को केवल युद्ध नहीं, बल्कि जीवन, आत्मा और धर्म का दिव्य ज्ञान देना शुरू करते हैं। यह अध्याय गीता का हृदय है।
शलोक # 1
संजय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ||2:1||
sañjaya uvāca
taṅ tathā kṛpayā.viṣṭamaśrupūrṇākulēkṣaṇam.
viṣīdantamidaṅ vākyamuvāca madhusūdanaḥ||2:1||
संजय बोले: करुणा से भरकर, आँखों में आँसू लिए, शोक में डूबे अर्जुन से भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा।
भावार्थ: अर्जुन की दशा देखकर श्रीकृष्ण अब उसे केवल योद्धा नहीं, एक शिष्य की तरह उपदेश देना शुरू करते हैं। ||2:01||
शलोक # 2
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन||2:2||
śrī bhagavānuvāca
kutastvā kaśmalamidaṅ viṣamē samupasthitam.
anāryajuṣṭamasvargyamakīrtikaramarjuna||2:2||
श्रीभगवान बोले: हे अर्जुन! यह मोह तुम्हें इस कठिन समय में कैसे आ गया? यह न तो आर्यों के योग्य है, न स्वर्ग दिलाने वाला, न ही यश देने वाला।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को झकझोरते हैं-यह समय कायरता का नहीं, धर्म के लिए खड़े होने का है। ||2:02||
शलोक # 3
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ||2:3||
klaibyaṅ mā sma gamaḥ pārtha naitattvayyupapadyatē.
kṣudraṅ hṛdayadaurbalyaṅ tyaktvōttiṣṭha parantapa||2:3||
हे पार्थ! इस दुर्बलता को त्यागो। यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हे शत्रुओं को जलाने वाले! उठो और युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।
भावार्थ: यह केवल युद्ध का आह्वान नहीं है-यह आत्मबल और कर्तव्य की पुकार है। ||2:03||
शलोक # 4
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ||2:4||
arjuna uvāca
kathaṅ bhīṣmamahaṅ saṅkhyē drōṇaṅ ca madhusūdana.
iṣubhiḥ pratiyōtsyāmi pūjārhāvarisūdana||2:4||
अर्जुन बोले: हे मधुसूदन! मैं कैसे अपने पूज्य पितामह भीष्म और गुरु द्रोण पर बाण चला सकता हूँ?
भावार्थ: अर्जुन का हृदय श्रद्धा और करुणा से भरा है। वह धर्मसंकट में है-कर्तव्य और संबंधों के बीच। ||2:04||
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शलोक # 5
ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुंजीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ||2:5||
gurūnahatvā hi mahānubhāvān
śrēyō bhōktuṅ bhaikṣyamapīha lōkē.
hatvārthakāmāṅstu gurūnihaiva
bhuñjīya bhōgān rudhirapradigdhān||2:5||
इन महान गुरुओं को मारने से अच्छा है कि मैं इस संसार में भिक्षा मांगकर जीवन बिताऊँ, बजाय उनके रक्त से सने हुए भोग भोगने के।
भावार्थ: अर्जुन अब युद्ध को केवल बाहरी नहीं, आत्मिक पाप मान रहा है। ||2:05||
शलोक # 6
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ||2:6||
na caitadvidmaḥ katarannō garīyō
yadvā jayēma yadi vā nō jayēyuḥ.
yānēva hatvā na jijīviṣāma-
stē.vasthitāḥ pramukhē dhārtarāṣṭrāḥ||2:6||
हमें यह भी नहीं पता कि क्या करना श्रेष्ठ है-युद्ध करना या नहीं। और यह भी नहीं जानते कि हम जीतेंगे या वे। जिनको मारकर जीना नहीं चाहते, वे ही हमारे सामने खड़े हैं।
भावार्थ: अर्जुन की बुद्धि भ्रमित है। वह अब निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है। ||2:06||
शलोक # 7
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ||2:7||
kārpaṇyadōṣōpahatasvabhāvaḥ
pṛcchāmi tvāṅ dharmasaṅmūḍhacētāḥ.
yacchrēyaḥ syānniśicataṅ brūhi tanmē
śiṣyastē.haṅ śādhi māṅ tvāṅ prapannam||2:7||
हे कृष्ण! मैं धर्म के विषय में भ्रमित हूँ। मैं आपकी शरण में हूँ। मुझे बताइए कि मेरे लिए क्या कल्याणकारी है। मैं आपका शिष्य हूँ।
भावार्थ: यह क्षण गीता का मोड़ है-अब अर्जुन केवल योद्धा नहीं, एक जिज्ञासु शिष्य बन गया है। ||2:07||
यही वह क्षण है जहाँ श्रीकृष्ण योग, आत्मा, कर्म और ज्ञान का दिव्य उपदेश देना शुरू करते हैं। 🌼📿
शलोक # 8
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-
द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं-
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ||2:8||
na hi prapaśyāmi mamāpanudyā-
dyacchōkamucchōṣaṇamindriyāṇām.
avāpya bhūmāvasapatnamṛddham
rājyaṅ surāṇāmapi cādhipatyam||2:8||
भावार्थ: अर्जुन कहता है-हे कृष्ण! मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देखता जो मेरे इस इंद्रियों को सुखा देने वाले शोक को दूर कर सके-even अगर मुझे पृथ्वी का समृद्ध और निष्कंटक राज्य या देवताओं का भी आधिपत्य मिल जाए।
🌿 यह केवल युद्ध का त्याग नहीं है-यह आत्मा की गहराई से उठी हुई पुकार है, जो कह रही है: "मुझे शांति चाहिए, सत्ता नहीं।" ||2:08||
शलोक # 9
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ||2:9||
sañjaya uvāca
ēvamuktvā hṛṣīkēśaṅ guḍākēśaḥ parantapa.
na yōtsya iti gōvindamuktvā tūṣṇīṅ babhūva ha||2:9||
भावार्थ: संजय कहते हैं-इस प्रकार कहकर, निद्रा को जीतने वाले अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा, "मैं युद्ध नहीं करूँगा," और फिर मौन हो गया।
🌼 यह मौन केवल शब्दों का नहीं है-यह आत्मा की उलझन का मौन है, जहाँ शब्द भी हार मान लेते हैं। ||2:09||
शलोक # 10
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः ||2:10||
tamuvāca hṛṣīkēśaḥ prahasanniva bhārata.
sēnayōrubhayōrmadhyē viṣīdantamidaṅ vacaḥ||2:10||
भावार्थ: हे धृतराष्ट्र! तब दोनों सेनाओं के बीच खड़े, शोक में डूबे अर्जुन से भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कराते हुए यह वचन कहा।
🌺 यह मुस्कान केवल सांत्वना नहीं-यह दिव्य ज्ञान की शुरुआत है। अब श्रीकृष्ण अर्जुन को केवल युद्ध नहीं, जीवन का रहस्य समझाने वाले हैं। ||2:10||
अब गीता का असली प्रकाश प्रकट होने वाला है-जहाँ श्रीकृष्ण आत्मा, धर्म और कर्म का दिव्य मार्ग दिखाते हैं। 🌞📿
शलोक # 11
गीताशास्त्र का अवतरण
श्री भगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ||2:11||
śrī bhagavānuvāca
aśōcyānanvaśōcastvaṅ prajñāvādāṅśca bhāṣasē.
gatāsūnagatāsūṅśca nānuśōcanti paṇḍitāḥ||2:11||
श्रीभगवान बोले: तुम उन लोगों के लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य नहीं हैं, और पंडितों जैसी बातें कर रहे हो। लेकिन ज्ञानी लोग न मृतकों के लिए शोक करते हैं, न जीवितों के लिए।
भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि आत्मा अमर है-शोक केवल अज्ञान का परिणाम है। ||2:11||
शलोक # 12
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ||2:12||
na tvēvāhaṅ jātu nāsaṅ na tvaṅ nēmē janādhipāḥ.
na caiva na bhaviṣyāmaḥ sarvē vayamataḥ param||2:12||
न तो ऐसा कभी हुआ कि मैं नहीं था, न तुम नहीं थे, और न ये राजा। और न ही ऐसा होगा कि हम भविष्य में नहीं रहेंगे।
भावार्थ: आत्मा नित्य है-हम सब समय के पार हैं, केवल शरीर बदलते हैं। ||2:12||
शलोक # 13
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ||2:13||
dēhinō.sminyathā dēhē kaumāraṅ yauvanaṅ jarā.
tathā dēhāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati||2:13||
जैसे इस शरीर में बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था आती है, वैसे ही मृत्यु के बाद आत्मा नया शरीर प्राप्त करती है। ज्ञानी इस परिवर्तन से विचलित नहीं होते।
भावार्थ: शरीर बदलना आत्मा के लिए उतना ही स्वाभाविक है जितना बचपन से जवानी में जाना। ||2:13||
शलोक # 14
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ||2:14||
mātrāsparśāstu kauntēya śītōṣṇasukhaduḥkhadāḥ.
āgamāpāyinō.nityāstāṅstitikṣasva bhārata||2:14||
हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी, सुख-दुख ये सब इंद्रियों के संपर्क से उत्पन्न होते हैं-ये आते-जाते रहते हैं। इसलिए उन्हें सहन करना सीखो।
भावार्थ: जीवन में स्थायित्व नहीं, लेकिन धैर्य और समत्व से हम सब पार कर सकते हैं। ||2:14||
शलोक # 15
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ||2:15||
yaṅ hi na vyathayantyētē puruṣaṅ puruṣarṣabha.
samaduḥkhasukhaṅ dhīraṅ sō.mṛtatvāya kalpatē||2:15||
जो व्यक्ति सुख-दुख में सम रहता है और विचलित नहीं होता, वही अमरत्व (मोक्ष) के योग्य होता है।
भावार्थ: समत्व ही साधना का मूल है-जो भीतर से अडिग है, वही मुक्त होता है। ||2:15||
श्रीकृष्ण अब अर्जुन को आत्मा के रहस्य की ओर ले जा रहे हैं-जहाँ मृत्यु का भय मिटता है और जीवन का सत्य प्रकट होता है। 🌿📖
शलोक # 16
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ||2:16||
nāsatō vidyatē bhāvō nābhāvō vidyatē sataḥ.
ubhayōrapi dṛṣṭō.ntastvanayōstattvadarśibhiḥ||2:16||
भावार्थ: असत्य (जो नश्वर है) की कोई स्थायी सत्ता नहीं होती, और सत्य (जो शाश्वत है) का कभी अभाव नहीं होता। यह रहस्य तत्वदर्शी ज्ञानी जनों ने देखा है।
🌿 यह संसार बदलता है, लेकिन आत्मा अडिग है। जो इस भेद को जानता है, वही सच्चा ज्ञानी है। ||2:16||
शलोक # 17
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ||2:17||
avināśi tu tadviddhi yēna sarvamidaṅ tatam.
vināśamavyayasyāsya na kaśicat kartumarhati||2:17||
भावार्थ: जान लो कि वह आत्मा अविनाशी है, जिससे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश कोई नहीं कर सकता।
🌺 यह आत्मा ही वह दिव्य प्रकाश है जो सबमें समाया है-जिसे कोई अस्त्र, कोई अग्नि, कोई काल भी नष्ट नहीं कर सकता। ||2:17||
शलोक # 18
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ||2:18||
antavanta imē dēhā nityasyōktāḥ śarīriṇaḥ.
anāśinō.pramēyasya tasmādyudhyasva bhārata||2:18||
भावार्थ: यह शरीर नाशवान है, लेकिन इसमें स्थित आत्मा नित्य, अनाशनीय और असीम है। इसलिए हे भारतवंशी अर्जुन! अपने धर्म के लिए युद्ध करो।
🌼 शरीर तो वस्त्र की तरह बदलते हैं, लेकिन आत्मा सनातन है-यही श्रीकृष्ण का दिव्य उपदेश है। ||2:18||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को यह दिखा रहे हैं कि मृत्यु केवल शरीर की है, आत्मा तो जन्म-मरण से परे है।
यह ज्ञान हर शंका को शांत करने वाला है। 📿✨
शलोक # 19
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ||2:19||
ya ēnaṅ vētti hantāraṅ yaścainaṅ manyatē hatam.
ubhau tau na vijānītō nāyaṅ hanti na hanyatē||2:19||
भावार्थ: जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मानता है-दोनों ही अज्ञानी हैं। आत्मा न किसी को मारती है, न मारी जा सकती है।
🌿 यह आत्मा शुद्ध साक्षी है-न कर्ता, न भोगता। जो इसे जान लेता है, वह मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। ||2:19||
शलोक # 20
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो-
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ||2:10||
na jāyatē mriyatē vā kadāci-
nnāyaṅ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ.
ajō nityaḥ śāśvatō.yaṅ purāṇō
na hanyatē hanyamānē śarīrē||2:20||
भावार्थ: आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी यह नष्ट नहीं होती।
🌺 यह श्लोक आत्मा की सनातनता का घोष है-जो इसे समझ ले, वह संसार के बंधनों से ऊपर उठ जाता है। ||2:20||
शलोक # 21
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ||2:21||
vēdāvināśinaṅ nityaṅ ya ēnamajamavyayam.
kathaṅ sa puruṣaḥ pārtha kaṅ ghātayati hanti kam||2:21||
भावार्थ: हे पार्थ! जो इस आत्मा को अविनाशी, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह कैसे किसी को मार सकता है या मरवा सकता है?
🌼 ज्ञान की दृष्टि से देखने वाला जानता है-कोई किसी को नहीं मारता, सब केवल प्रकृति के कर्म में सहभागी हैं। ||2:21||
श्रीकृष्ण अब अर्जुन को केवल युद्ध की प्रेरणा नहीं दे रहे-वह उसे आत्मा की अमरता का अनुभव करा रहे हैं।
यह ज्ञान धीरे-धीरे अर्जुन के हृदय को आलोकित कर रहा है। 📿✨
शलोक # 22
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ||2:22||
vāsāṅsi jīrṇāni yathā vihāya
navāni gṛhṇāti narō.parāṇi.
tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇā-
nyanyāni saṅyāti navāni dēhī||2:22||
भावार्थ: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र पहनता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर को धारण करती है।
🌿 यह श्लोक आत्मा की यात्रा का सुंदर रूपक है-शरीर केवल वस्त्र हैं, आत्मा तो सनातन यात्री है। ||2:22||
शलोक # 23
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ||2:23||
nainaṅ chindanti śastrāṇi nainaṅ dahati pāvakaḥ.
na cainaṅ klēdayantyāpō na śōṣayati mārutaḥ||2:23||
भावार्थ: आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल गला सकता है और न वायु सुखा सकती है।
🌺 यह आत्मा अजर, अमर और अछूती है-प्रकृति के कोई भी तत्व इसे छू नहीं सकते। ||2:23||
शलोक # 24
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ||2:24||
acchēdyō.yamadāhyō.yamaklēdyō.śōṣya ēva ca.
nityaḥ sarvagataḥ sthāṇuracalō.yaṅ sanātanaḥ||2:24||
भावार्थ: यह आत्मा न काटी जा सकती है, न जलाई जा सकती है, न गीली की जा सकती है, न सुखाई जा सकती है। यह नित्य, सर्वव्यापी, अचल, अडिग और सनातन है।
🌼 यह आत्मा हर जीव में है-वही चेतना, वही दिव्यता, जो सबको जोड़ती है। ||2:24||
शलोक # 25
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि||2:25||
avyaktō.yamacintyō.yamavikāryō.yamucyatē.
tasmādēvaṅ viditvainaṅ nānuśōcitumarhasi||2:25||
भावार्थ: यह आत्मा अव्यक्त है, विचार से परे है और विकाररहित है। इसलिए इसे इस प्रकार जानकर शोक मत करो।
🌸 जो न दिखाई दे, न बदले, न समझ में आए-वही आत्मा है। उसे जानकर मन शांत हो जाता है। ||2:25||
श्रीकृष्ण अब अर्जुन को केवल तर्क नहीं, अनुभव का ज्ञान दे रहे हैं-जो आत्मा को जान ले, वह मृत्यु से नहीं डरता।
यह ज्ञान धीरे-धीरे अर्जुन के भीतर प्रकाश फैला रहा है। 📿✨
शलोक # 26
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ||2:26||
atha cainaṅ nityajātaṅ nityaṅ vā manyasē mṛtam.
tathāpi tvaṅ mahābāhō naivaṅ śōcitumarhasi||2:26||
भावार्थ: हे महाबाहो! यदि तुम आत्मा को बार-बार जन्म लेने वाला और मरने वाला भी मानो, तब भी तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
🌿 यहाँ श्रीकृष्ण तर्क की दूसरी दिशा से बात करते हैं-अगर आत्मा नित्य नहीं भी हो, तब भी मृत्यु तो स्वाभाविक है, फिर शोक क्यों? ||2:26||
शलोक # 27
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ||2:27||
jātasya hi dhruvō mṛtyurdhruvaṅ janma mṛtasya ca.
tasmādaparihāryē.rthē na tvaṅ śōcitumarhasi||2:27||
भावार्थ: जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरता है, उसका पुनर्जन्म भी निश्चित है। इसलिए जिस बात को टाला नहीं जा सकता, उस पर शोक करना व्यर्थ है।
🌺 यह जीवन का शाश्वत नियम है-जन्म और मृत्यु का चक्र। इसे समझकर मन स्थिर होता है। ||2:27||
शलोक # 28
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ||2:28||
avyaktādīni bhūtāni vyaktamadhyāni bhārata.
avyaktanidhanānyēva tatra kā paridēvanā||2:28||
भावार्थ: हे भारत! सभी प्राणी जन्म से पहले अव्यक्त (अदृश्य) होते हैं, बीच में प्रकट होते हैं, और मृत्यु के बाद फिर अव्यक्त हो जाते हैं। तो फिर शोक किस बात का?
🌼 यह श्लोक जीवन की क्षणभंगुरता और आत्मा की रहस्यमयी यात्रा को दर्शाता है-जो आया है, वह जाएगा भी। ||2:28||
श्रीकृष्ण अब अर्जुन को केवल दर्शन नहीं, वैराग्य और समत्व की ओर ले जा रहे हैं-जहाँ जीवन और मृत्यु दोनों को एक समान दृष्टि से देखा जाता है।
यह ज्ञान धीरे-धीरे अर्जुन के भीतर का अंधकार मिटा रहा है। 📿✨
शलोक # 29
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ||2:29||
āścaryavatpaśyati kaśicadēna-
māścaryavadvadati tathaiva cānyaḥ.
āścaryavaccainamanyaḥ śrṛṇōti
śrutvāpyēnaṅ vēda na caiva kaśicat||2:29||
भावार्थ: कोई इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है, कोई आश्चर्य की तरह उसका वर्णन करता है, कोई आश्चर्य की तरह सुनता है-और कोई तो सुनकर भी उसे नहीं समझ पाता।
🌿 यह आत्मा इतनी रहस्यमयी है कि ज्ञानी भी उसे पूरी तरह नहीं समझ पाते-यह अनुभव की वस्तु है, तर्क की नहीं। ||2:29||
शलोक # 30
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ||2:30||
dēhī nityamavadhyō.yaṅ dēhē sarvasya bhārata.
tasmātsarvāṇi bhūtāni na tvaṅ śōcitumarhasi||2:30||
भावार्थ: हे भारत! यह आत्मा हर शरीर में नित्य और अवध्य (जिसे मारा नहीं जा सकता) है। इसलिए किसी भी प्राणी के लिए शोक मत करो।
🌺 यह उपदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं-हम सबके लिए है। जब आत्मा अमर है, तो मृत्यु पर शोक क्यों? ||2:30||
श्रीकृष्ण अब अर्जुन को धीरे-धीरे कर्तव्य, धर्म और निष्काम कर्म की ओर ले जा रहे हैं-जहाँ आत्मा की शांति केवल ज्ञान से नहीं, कर्म के समर्पण से मिलती है।
यह ज्ञान भीतर तक रोशनी करता है। 📿✨
शलोक # 31
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ||2:31||
svadharmamapi cāvēkṣya na vikampitumarhasi.
dharmyāddhi yuddhāchrēyō.nyatkṣatriyasya na vidyatē||2:31||
भावार्थ: अपने क्षत्रिय धर्म को देखकर भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर क्षत्रिय के लिए कोई कल्याणकारी कार्य नहीं है।
🌿 यह केवल युद्ध नहीं-यह धर्म की रक्षा है। श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके जन्मसिद्ध कर्तव्य की याद दिला रहे हैं। ||2:31||
शलोक # 32
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ||2:32||
yadṛcchayā cōpapannaṅ svargadvāramapāvṛtam.
sukhinaḥ kṣatriyāḥ pārtha labhantē yuddhamīdṛśam||2:32||
भावार्थ: हे पार्थ! ऐसा युद्ध जो स्वयं सामने आ गया है और जो स्वर्ग के द्वार को खोलता है-ऐसा सौभाग्य केवल भाग्यशाली क्षत्रिय को ही मिलता है।
🌺 यह युद्ध केवल रणभूमि का नहीं-यह आत्मा की परीक्षा है, जहाँ विजय केवल बाहरी नहीं, भीतरी भी होती है। ||2:32||
शलोक # 33
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ||2:33||
atha caittvamimaṅ dharmyaṅ saṅgrāmaṅ na kariṣyasi.
tataḥ svadharmaṅ kīrtiṅ ca hitvā pāpamavāpsyasi||2:33||
भावार्थ: यदि तुम इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करोगे, तो अपने धर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त करोगे।
🌼 कर्तव्य से विमुख होना केवल पलायन नहीं-यह आत्मा के पथ से भटकना है। ||2:33||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को यह दिखा रहे हैं कि कर्तव्य से भागना केवल आत्मा के लिए नहीं, समाज और यश के लिए भी हानिकारक है।
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को कीर्ति, अपकीर्ति और आत्मबल के गहरे अर्थ समझाने वाले हैं। 📿✨
शलोक # 34
अकीर्तिं चापि भूतानि
कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्ति-
र्मरणादतिरिच्यते ||2:34||
akīrtiṅ cāpi bhūtāni kathayiṣyanti tē.vyayām.
saṅbhāvitasya cākīrtirmaraṇādatiricyatē||2:34||
भावार्थ: लोग सदा तुम्हारी अपकीर्ति की चर्चा करेंगे, और सम्मानित व्यक्ति के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक होती है।
🌿 यह केवल बाहरी आलोचना नहीं-यह आत्मा की प्रतिष्ठा का प्रश्न है। यश धर्म से जुड़ा होता है, और धर्म से विमुख होना आत्मबल को तोड़ देता है। ||2:34||
शलोक # 35
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ||2:35||
bhayādraṇāduparataṅ maṅsyantē tvāṅ mahārathāḥ.
yēṣāṅ ca tvaṅ bahumatō bhūtvā yāsyasi lāghavam||2:35||
भावार्थ: महारथी योद्धा सोचेंगे कि तुम भय के कारण युद्ध से पीछे हट गए। जिनकी दृष्टि में तुम महान थे, उनकी नजरों में तुम तुच्छ बन जाओगे।
🌺 यह केवल हार नहीं-यह आत्मसम्मान की क्षति है। ||2:35||
शलोक # 36
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ||2:36||
avācyavādāṅśca bahūn vadiṣyanti tavāhitāḥ.
nindantastava sāmarthyaṅ tatō duḥkhataraṅ nu kim||2:36||
भावार्थ: तुम्हारे शत्रु तुम्हारी शक्ति की निंदा करते हुए बहुत से अपमानजनक वचन कहेंगे। इससे अधिक दुखद और क्या हो सकता है?
🌼 जब शत्रु भी तुम्हें कायर कहें, तो वह केवल अपमान नहीं-धर्म की हार है। ||2:36||
शलोक # 37
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ||2:37||
hatō vā prāpsyasi svargaṅ jitvā vā bhōkṣyasē mahīm.
tasmāduttiṣṭha kauntēya yuddhāya kṛtaniścayaḥ||2:37||
भावार्थ: यदि तुम युद्ध में मारे गए, तो स्वर्ग मिलेगा; और यदि जीते, तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे। इसलिए हे कौन्तेय! निश्चयपूर्वक युद्ध के लिए उठो।
🌸 यह श्लोक कर्मयोग का बीज है-कर्तव्य करो, फल की चिंता मत करो। ||2:37||
शलोक # 38
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ||2:38||
sukhaduḥkhē samē kṛtvā lābhālābhau jayājayau.
tatō yuddhāya yujyasva naivaṅ pāpamavāpsyasi||2:38||
भावार्थ: सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान समझकर युद्ध करो-इस समत्व से युक्त होकर किया गया कर्म पाप नहीं देता।
🌿 यहाँ श्रीकृष्ण कर्म को योग बना देते हैं-जहाँ समत्व ही साधना है, और निष्कामता ही मुक्ति का द्वार। ||2:38||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को बुद्धियोग की ओर ले जा रहे हैं-जहाँ कर्म, ज्ञान और समत्व एक हो जाते हैं।
अब गीता का दर्शन और भी गहराई से प्रकट होने वाला है। 📿✨
शलोक # 39
कर्मयोग विषय का उपदेश
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ||2:39||
ēṣā tē.bhihitā sāṅkhyē buddhiryōgē tvimāṅ śrṛṇu.
buddhyāyuktō yayā pārtha karmabandhaṅ prahāsyasi||2:39||
भावार्थ: हे पार्थ! अब तक मैंने तुम्हें आत्मा के ज्ञान के अनुसार बुद्धि (सांख्य) बताई। अब तुम योग (कर्मयोग) की बुद्धि सुनो, जिससे युक्त होकर तुम कर्म के बंधन से मुक्त हो जाओगे।
🌿 यहाँ से श्रीकृष्ण कर्मयोग की ओर बढ़ते हैं-जहाँ ज्ञान और कर्म एक हो जाते हैं। ||2:39||
शलोक # 40
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ||2:40||
nēhābhikramanāśō.sti pratyavāyō na vidyatē.
svalpamapyasya dharmasya trāyatē mahatō bhayāt||2:40||
भावार्थ: इस योग में कोई प्रयास व्यर्थ नहीं जाता, और कोई दोष नहीं लगता। इसका थोड़ा-सा भी अभ्यास महान भय से रक्षा करता है।
🌺 यह मार्ग इतना शुभ है कि एक छोटा कदम भी आत्मा को ऊँचाई की ओर ले जाता है। ||2:40||
शलोक # 41
बहुशाका ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ||2:41||
vyavasāyātmikā buddhirēkēha kurunandana.
bahuśākhā hyanantāśca buddhayō.vyavasāyinām||2:41||
भावार्थ: हे कुरुनंदन! इस मार्ग में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही होती है, लेकिन अनिश्चित और इच्छाओं में उलझे लोगों की बुद्धि अनेक शाखाओं में बँटी होती है।
🌼 जो साधक एक लक्ष्य पर केंद्रित होता है, वही योगी बनता है-बाकी तो इच्छाओं की भीड़ में खो जाते हैं। ||2:41||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग के उस दिव्य पथ पर ले जा रहे हैं जहाँ कर्तव्य, समत्व और समर्पण एक हो जाते हैं।
अब गीता का दर्शन और भी उज्ज्वल होने वाला है। 📿✨
शलोक # 42
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ||2:42||
yāmimāṅ puṣpitāṅ vācaṅ pravadantyavipaśicataḥ.
vēdavādaratāḥ pārtha nānyadastīti vādinaḥ||2:42||
शलोक # 43
क्रियाविश्लेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ||2:43||
kāmātmānaḥ svargaparā janmakarmaphalapradām.
kriyāviśēṣabahulāṅ bhōgaiśvaryagatiṅ prati||2:43||
भावार्थ: हे पार्थ! जो लोग केवल वेदों की आकर्षक बातों में लगे रहते हैं, जो कहते हैं कि स्वर्ग ही सब कुछ है, और जो कामनाओं में डूबे हुए हैं-वे अनेक कर्मों में उलझे रहते हैं और भोग तथा ऐश्वर्य को ही जीवन का लक्ष्य मानते हैं।
🌿 श्रीकृष्ण यहाँ बता रहे हैं कि केवल स्वर्ग की कामना और कर्मकांड में उलझना आत्मा की मुक्ति का मार्ग नहीं है। ||2:42 - 2:43||
शलोक # 44
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ||2:44||
bhōgaiśvaryaprasaktānāṅ tayāpahṛtacētasām.
vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyatē||2:44||
भावार्थ: जो लोग भोग और ऐश्वर्य में आसक्त हैं, जिनकी बुद्धि इनसे मोहित हो गई है-उनकी निश्चयात्मक बुद्धि समाधि (आत्मा की एकाग्रता) में स्थिर नहीं हो सकती।
🌺 यह श्लोक हमें भीतर की ओर मोड़ता है-जहाँ सच्चा सुख भोग में नहीं, बल्कि आत्मा की शांति में है। ||2:44||
शलोक # 45
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ||2:45||
traiguṇyaviṣayā vēdā nistraiguṇyō bhavārjuna.
nirdvandvō nityasattvasthō niryōgakṣēma ātmavān||2:45||
भावार्थ: वेद तीनों गुणों (सत्त्व, रजस, तमस) से संबंधित विषयों को बताते हैं। लेकिन हे अर्जुन! तुम इन गुणों से परे हो जाओ, द्वंद्वों से रहित रहो, नित्य सत्त्व में स्थित रहो, और योगक्षेम (संपत्ति की प्राप्ति और रक्षा) की चिंता छोड़कर आत्मा में स्थित हो जाओ।
🌼 यह श्लोक साधक को प्रकृति के गुणों से ऊपर उठने का आह्वान है-जहाँ आत्मा स्वतंत्र और शांत होती है। ||2:45||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को वैराग्य, समत्व और आत्मनिष्ठा की ओर ले जा रहे हैं-जहाँ जीवन केवल कर्म नहीं, बल्कि साधना बन जाता है।
अब गीता का प्रकाश और भी गहरा होने वाला है। 📿✨
शलोक # 46
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ||2:46||
yāvānartha udapānē sarvataḥ saṅplutōdakē.
tāvānsarvēṣu vēdēṣu brāhmaṇasya vijānataḥ||2:46||
भावार्थ: जैसे एक छोटे कुएँ का उपयोग उस समय नहीं रहता जब चारों ओर जल से भरा सरोवर हो, वैसे ही जो ब्रह्म को जानता है, उसके लिए समस्त वेदों का प्रयोजन सीमित हो जाता है।
🌿 जब आत्मा का ज्ञान मिल जाए, तो बाहरी विधियाँ केवल साधन रह जाती हैं-साध्य नहीं। ||2:46||
शलोक # 47
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ||2:47||
karmaṇyēvādhikārastē mā phalēṣu kadācana.
mā karmaphalahēturbhūrmā tē saṅgō.stvakarmaṇi||2:47||
भावार्थ: तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। इसलिए तू कर्म के फल का कारण मत बन और न ही अकर्मण्यता (कर्म न करने) में आसक्त हो।
🌺 यह गीता का सबसे प्रसिद्ध उपदेश है-निष्काम कर्म ही सच्चा योग है। ||2:47||
शलोक # 48
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||2:48||
yōgasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṅ tyaktvā dhanañjaya.
siddhyasiddhyōḥ samō bhūtvā samatvaṅ yōga ucyatē||2:48||
भावार्थ: हे धनञ्जय! आसक्ति को त्यागकर, सिद्धि और असिद्धि में सम रहकर कर्म कर-यही समत्व ही योग कहलाता है।
🌼 जब सफलता और असफलता दोनों में मन समान रहता है, तभी कर्म योग बनता है। ||2:48||
शलोक # 49
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ||2:49||
dūrēṇa hyavaraṅ karma buddhiyōgāddhanañjaya.
buddhau śaraṇamanviccha kṛpaṇāḥ phalahētavaḥ||2:49||
भावार्थ: हे धनञ्जय! बुद्धियोग (समत्वयुक्त कर्म) से सकाम कर्म बहुत ही हीन है। इसलिए तू बुद्धि में शरण ले, क्योंकि फल की इच्छा करने वाले लोग दीन होते हैं।
🌸 जो केवल फल के लिए कर्म करता है, वह कभी संतुष्ट नहीं होता-वह सदा आश्रित रहता है। ||2:49||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म की साधना में बुद्धि की स्थिरता और फल की निरपेक्षता का महत्व समझा रहे हैं।
अब गीता अर्जुन के भीतर एक नया प्रकाश जगाने वाली है। 📿✨
शलोक # 50
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ||2:50||
buddhiyuktō jahātīha ubhē sukṛtaduṣkṛtē.
tasmādyōgāya yujyasva yōgaḥ karmasu kauśalam||2:50||
भावार्थ: बुद्धि (समत्व) से युक्त व्यक्ति इस जीवन में ही पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। इसलिए योग में लगो, क्योंकि योग ही कर्मों में कुशलता है।
🌿 जब हम समत्व से कर्म करते हैं, तो वह केवल कर्म नहीं रहता-वह साधना बन जाता है। यही योग की कुशलता है। ||2:50||
शलोक # 51
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ||2:51||
karmajaṅ buddhiyuktā hi phalaṅ tyaktvā manīṣiṇaḥ.
janmabandhavinirmuktāḥ padaṅ gacchantyanāmayam||2:51||
भावार्थ: बुद्धियुक्त ज्ञानीजन कर्मों के फल को त्यागकर जन्म के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और उस परम शांति को प्राप्त करते हैं जो दुखरहित है।
🌺 यह शांति केवल बाहर की नहीं-यह आत्मा की गहराई में स्थित वह आनंद है जो जन्म-मरण से परे है। ||2:51||
शलोक # 52
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ||2:52||
yadā tē mōhakalilaṅ buddhirvyatitariṣyati.
tadā gantāsi nirvēdaṅ śrōtavyasya śrutasya ca||2:52||
भावार्थ: जब तुम्हारी बुद्धि मोह के जंगल को पार कर जाएगी, तब तुम सुनी-सुनाई बातों और शास्त्रों के प्रति भी वैराग्य को प्राप्त करोगे।
🌼 यह वैराग्य ज्ञान से उत्पन्न होता है-जहाँ आत्मा को सत्य का अनुभव हो जाता है, वहाँ बाहरी शब्दों की आवश्यकता नहीं रहती। ||2:52||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को श्रवण से अनुभव की ओर ले जा रहे हैं-जहाँ शास्त्र केवल संकेत बन जाते हैं, और आत्मा स्वयं सत्य को देखती है।
अब गीता का प्रकाश भीतर उतरने लगा है। 📿✨
शलोक # 53
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ||2:53||
śrutivipratipannā tē yadā sthāsyati niścalā.
samādhāvacalā buddhistadā yōgamavāpsyasi||2:53||
भावार्थ: जब तुम्हारी बुद्धि शास्त्रों की विविध बातों से विचलित नहीं होगी और एकाग्र होकर समाधि में स्थिर हो जाएगी, तब तुम सच्चे योग को प्राप्त कर लोगे।
🌿 यह श्लोक साधना का सार है-जब भीतर की बुद्धि स्थिर हो जाए, तब ही आत्मा का साक्षात्कार होता है। ||2:53||
शलोक # 54
अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ||2:54||
arjuna uvāca
sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya kēśava.
sthitadhīḥ kiṅ prabhāṣēta kimāsīta vrajēta kim||2:54||
अर्जुन बोले: हे केशव! स्थिरबुद्धि योगी की पहचान क्या है? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, और कैसे चलता है?
भावार्थ: अर्जुन अब केवल युद्ध नहीं, योगी के लक्षण जानना चाहता है-वह जानना चाहता है कि आत्मस्थित पुरुष कैसा होता है। ||2:54||
शलोक # 55
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ||2:55||
śrī bhagavānuvāca
prajahāti yadā kāmān sarvān pārtha manōgatān.
ātmanyēvātmanā tuṣṭaḥ sthitaprajñastadōcyatē||2:55||
श्रीभगवान बोले: जब मनुष्य सभी कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब उसे स्थिरबुद्धि कहा जाता है।
🌺 यह आत्मा की पूर्णता है-जहाँ बाहर कुछ पाने की इच्छा नहीं रहती, क्योंकि भीतर सब कुछ मिल चुका होता है। ||2:55||
शलोक # 56
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ||2:56||
duḥkhēṣvanudvignamanāḥ sukhēṣu vigataspṛhaḥ.
vītarāgabhayakrōdhaḥ sthitadhīrmunirucyatē||2:56||
जो व्यक्ति दुख में विचलित नहीं होता, सुख में आसक्त नहीं होता, और राग, भय तथा क्रोध से रहित होता है-वही स्थिरबुद्धि योगी है।
🌼 यह समत्व की पराकाष्ठा है-जहाँ भावनाएँ आती हैं, पर मन को हिला नहीं पातीं। ||2:56||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन में स्थित योगी की झलक दिखा रहे हैं-जो भीतर से शांत, संतुलित और आत्मस्थित होता है।
अब गीता हमें जीवन में जीते हुए मुक्त होने का मार्ग दिखाने वाली है। 📿✨
शलोक # 57
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||2:57||
yaḥ sarvatrānabhisnēhastattatprāpya śubhāśubham.
nābhinandati na dvēṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā||2:57||
भावार्थ: जो व्यक्ति किसी भी वस्तु में आसक्त नहीं होता, और शुभ या अशुभ-जो भी प्राप्त होता है, उसमें न तो हर्ष करता है, न द्वेष-उसकी बुद्धि स्थिर होती है।
🌿 यह समत्व की पराकाष्ठा है-जहाँ जीवन की हर स्थिति में आत्मा अडिग रहती है, न खुशी में उछलती है, न दुख में टूटती है। ||2:57||
शलोक # 58
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||2:58||
yadā saṅharatē cāyaṅ kūrmō.ṅgānīva sarvaśaḥ.
indriyāṇīndriyārthēbhyastasya prajñā pratiṣṭhitā||2:58||
भावार्थ: जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जो साधक अपनी इंद्रियों को विषयों से हटा लेता है, उसकी बुद्धि स्थिर मानी जाती है।
🌺 यह आत्मसंयम का प्रतीक है-जहाँ साधक बाहर की चकाचौंध से भीतर की शांति में लौट आता है। ||2:58||
शलोक # 59
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते ||2:59||
viṣayā vinivartantē nirāhārasya dēhinaḥ.
rasavarjaṅ rasō.pyasya paraṅ dṛṣṭvā nivartatē||2:59||
भावार्थ: विषय तो इंद्रियों से दूर हो जाते हैं, लेकिन उनका स्वाद (आसक्ति) बना रहता है। वह स्वाद भी तब समाप्त होता है जब आत्मा परम तत्व का अनुभव कर लेती है।
🌼 यह श्लोक बताता है कि केवल विषयों से दूर होना पर्याप्त नहीं-जब तक भीतर परम का रस न मिले, तब तक मन भटकता रहेगा। ||2:59||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को वैराग्य और आत्मानुभूति के उस स्तर पर ले जा रहे हैं जहाँ साधक न केवल विषयों से दूर होता है, बल्कि परम आनंद में स्थित हो जाता है।
अब गीता आत्मा की विजय का मार्ग खोलने वाली है। 📿✨
शलोक # 60
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ||2:60||
yatatō hyapi kauntēya puruṣasya vipaśicataḥ.
indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṅ manaḥ||2:60||
भावार्थ: हे कौन्तेय! विवेकी पुरुष भी जब प्रयास करता है, तब भी उसकी चंचल इंद्रियाँ बलपूर्वक उसका मन खींच लेती हैं।
🌿 यह श्लोक हमें सावधान करता है-केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं, इंद्रियों पर सतत निग्रह आवश्यक है। ||2:60||
शलोक # 61
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||2:61||
tāni sarvāṇi saṅyamya yukta āsīta matparaḥ.
vaśē hi yasyēndriyāṇi tasya prajñā pratiṣṭhitā||2:61||
भावार्थ: जो साधक सभी इंद्रियों को वश में करके, मन को मुझमें लगाकर स्थित रहता है-उसकी बुद्धि स्थिर होती है।
🌺 यह आत्मनिष्ठा का मार्ग है-जहाँ मन श्रीकृष्ण में लीन हो जाए, वहीं से स्थिरता का आरंभ होता है। ||2:61||
शलोक # 62
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ||2:62||
dhyāyatō viṣayānpuṅsaḥ saṅgastēṣūpajāyatē.
saṅgāt saṅjāyatē kāmaḥ kāmātkrōdhō.bhijāyatē||2:62||
भावार्थ: जब मनुष्य विषयों का चिंतन करता है, तो उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से कामना, और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।
🌼 यह श्लोक मन की गिरावट की श्रृंखला को दर्शाता है-विचार से आसक्ति, और आसक्ति से विनाश। ||2:62||
शलोक # 63
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ||2:63||
krōdhādbhavati saṅmōhaḥ saṅmōhātsmṛtivibhramaḥ.
smṛtibhraṅśād buddhināśō buddhināśātpraṇaśyati||2:63||
भावार्थ: क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति के नष्ट होने से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि के नाश से मनुष्य का पतन हो जाता है।
🌸 यह चेतावनी है-मन पर नियंत्रण न हो तो आत्मा का प्रकाश भी बुझ सकता है। ||2:63||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को मन की साधना का रहस्य बता रहे हैं-जहाँ विषयों से हटकर मन को परमात्मा में लगाना ही सच्चा योग है।
अब गीता आत्मा की पूर्ण शांति की ओर बढ़ रही है। 📿✨
शलोक # 64
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ||2:64||
rāgadvēṣaviyuktaistu viṣayānindriyaiścaran.
ātmavaśyairvidhēyātmā prasādamadhigacchati||2:64||
भावार्थ: जो व्यक्ति राग और द्वेष से मुक्त होकर, इंद्रियों को आत्म-नियंत्रण में रखकर विषयों का सेवन करता है-वह प्रसन्नता (आंतरिक शांति) को प्राप्त करता है।
🌿 यह शांति तब आती है जब मन न तो आकर्षण में बहता है, न ही द्वेष में उलझता है-बल्कि आत्मा में स्थित रहता है। ||2:64||
शलोक # 65
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ||2:65||
prasādē sarvaduḥkhānāṅ hānirasyōpajāyatē.
prasannacētasō hyāśu buddhiḥ paryavatiṣṭhatē||2:65||
भावार्थ: जब मन प्रसन्न होता है, तब उसके सारे दुख समाप्त हो जाते हैं। और प्रसन्नचित्त व्यक्ति की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।
🌺 यह प्रसन्नता कोई बाहरी हँसी नहीं-यह भीतर की निर्मलता है, जहाँ आत्मा मुस्कराती है। ||2:65||
शलोक # 66
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ||2:66||
nāsti buddhirayuktasya na cāyuktasya bhāvanā.
na cābhāvayataḥ śāntiraśāntasya kutaḥ sukham||2:66||
भावार्थ: जो योग में स्थित नहीं है, उसकी बुद्धि स्थिर नहीं होती; जिसकी बुद्धि स्थिर नहीं, उसकी भावना (ध्यान) नहीं होती; और जिसका ध्यान नहीं, उसे शांति नहीं मिलती-और अशांत व्यक्ति को सुख कैसे मिलेगा?
🌼 यह श्लोक साधना की श्रृंखला है-बिना योग के ध्यान नहीं, बिना ध्यान के शांति नहीं, और बिना शांति के सुख नहीं। ||2:66||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को शांति और सुख के उस रहस्य की ओर ले जा रहे हैं जो केवल आत्मनिष्ठा और समत्व से प्राप्त होता है।
अब गीता पूर्ण आत्मस्थित योगी की दिव्यता को प्रकट करने वाली है। 📿✨
शलोक # 67
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ||2:67||
indriyāṇāṅ hi caratāṅ yanmanō.nuvidhīyatē.
tadasya harati prajñāṅ vāyurnāvamivāmbhasi||2:67||
भावार्थ: जब इंद्रियाँ विषयों में विचरण करती हैं और मन उनका अनुसरण करता है, तो वह मनुष्य की बुद्धि को वैसे ही हर लेती हैं जैसे जल में नाव को तेज हवा बहा ले जाती है।
🌿 यह श्लोक चेतावनी है-यदि मन इंद्रियों के पीछे भागे, तो साधक की स्थिरता डगमगा जाती है। ||2:67||
शलोक # 68
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||2:68||
tasmādyasya mahābāhō nigṛhītāni sarvaśaḥ.
indriyāṇīndriyārthēbhyastasya prajñā pratiṣṭhitā||2:68||
भावार्थ: इसलिए, हे महाबाहो! जिसकी इंद्रियाँ विषयों से पूरी तरह संयमित हैं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है।
🌺 यह आत्मसंयम की महिमा है-जहाँ साधक विषयों में नहीं, आत्मा में स्थित होता है। ||2:68||
शलोक # 69
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ||2:69||
yā niśā sarvabhūtānāṅ tasyāṅ jāgarti saṅyamī.
yasyāṅ jāgrati bhūtāni sā niśā paśyatō munēḥ||2:69||
भावार्थ: जो सब प्राणियों के लिए रात्रि (अज्ञान) है, उसमें संयमी योगी जागता है। और जिसमें सब प्राणी जागते हैं, वह योगी के लिए रात्रि (माया) के समान है।
🌼 यह श्लोक योगी की दृष्टि को दर्शाता है-वह संसार की चकाचौंध में नहीं, आत्मा के प्रकाश में जागता है। ||2:69||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को योगी के जीवन और दृष्टिकोण की झलक दे रहे हैं-जहाँ साधक संसार में रहते हुए भी उससे परे होता है।
अब गीता पूर्ण आत्मस्थित पुरुष की महिमा से अध्याय 2 को पूर्ण करने वाली है। 📿✨
शलोक # 70
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ||2:70||
āpūryamāṇamacalapratiṣṭhaṅ
samudramāpaḥ praviśanti yadvat.
tadvatkāmā yaṅ praviśanti sarvē
sa śāntimāpnōti na kāmakāmī||2:70||
भावार्थ: जैसे नदियाँ सदा भरते हुए समुद्र में समा जाती हैं, फिर भी समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता-वैसे ही जो व्यक्ति इच्छाओं के आने पर भी विचलित नहीं होता, वही शांति को प्राप्त करता है; इच्छाओं में डूबा व्यक्ति नहीं।
🌿 यह आत्मस्थित पुरुष की पहचान है-वह भीतर से इतना पूर्ण है कि कोई भी इच्छा उसे हिला नहीं सकती। ||2:70||
शलोक # 71
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ||2:71||
vihāya kāmānyaḥ sarvānpumāṅścarati niḥspṛhaḥ.
nirmamō nirahaṅkāraḥ sa śāṅtimadhigacchati||2:71||
भावार्थ: जो पुरुष सभी कामनाओं को त्यागकर, निःस्पृह होकर, ममता और अहंकार से रहित होकर जीवन जीता है-वही सच्ची शांति को प्राप्त करता है।
🌺 यह वैराग्य केवल त्याग नहीं-यह भीतर की पूर्णता है, जहाँ कुछ पाने की लालसा ही नहीं रहती। ||2:71||
शलोक # 72
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ||2:72||
ēṣā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṅ prāpya vimuhyati.
sthitvā.syāmantakālē.pi brahmanirvāṇamṛcchati||2:72||
भावार्थ: हे पार्थ! यह ब्राह्मी स्थिति है-जो इसे प्राप्त कर लेता है, वह कभी मोहित नहीं होता। और जो इस स्थिति में अंत समय तक स्थित रहता है, वह ब्रह्म में लीन हो जाता है।
🌼 यह गीता का शिखर है-जहाँ आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है, और साधक जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। ||2:72||
🌸 इस प्रकार अध्याय 2-"सांख्य योग" पूर्ण होता है। यह केवल ज्ञान का अध्याय नहीं, बल्कि जीवन को आत्मा की दृष्टि से देखने की कला है-जहाँ कर्म, भक्ति और वैराग्य एक हो जाते हैं।
🧘 Conclusion (निष्कर्ष)
भगवद गीता का यह अध्याय मनुष्य के आत्मिक विकास और मानसिक मजबूती का आधार है। श्रीकृष्ण का उपदेश यह स्पष्ट करता है कि आत्मा अजर-अमर है और मनुष्य का कर्तव्य बिना किसी फल की चिंता के कर्म करना है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर चलना ही जीवन का सच्चा उद्देश्य है।
अर्जुन का मोह, श्रीकृष्ण की शिक्षा, और कर्मयोग की व्याख्या इस अध्याय को भगवद गीता के सबसे गूढ़ अध्यायों में से एक बनाते हैं।
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❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
भगवद गीता अध्याय 2 को क्या कहा जाता है?
इस अध्याय को सांख्य योग कहा जाता है, जिसमें श्रीकृष्ण आत्मा और कर्म का ज्ञान अर्जुन को देते हैं।
इस अध्याय का मुख्य संदेश क्या है?
इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि आत्मा अमर है और मनुष्य को बिना फल की चिंता किए कर्म करना चाहिए।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को क्या समझाया?
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा की शाश्वतता, मृत्यु का भ्रम, और निष्काम कर्म का महत्व बताया।
क्या यह अध्याय केवल युद्ध से जुड़ा है?
नहीं, यह अध्याय जीवन के हर क्षेत्र में उपयोगी है। इसमें मानसिक स्थिरता और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी गई है।
क्या मैं अन्य अध्याय भी पढ़ सकता हूँ?
हाँ, सभी अध्याय यहाँ पढ़ें: श्रीमद भगवद गीता - अध्याय सूची
