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दाहिनी ओर रथ पर सवार होकर अर्जुन को सलाह देते हुए भगवान कृष्ण का चित्रण और बायीं ओर 'भगवद गीता | अध्याय 10 | विभूति योग श्लोक अर्थ सहित' लिखा हुआ है।

भगवद गीता - अध्याय 10
विभूति योग - श्लोक और अर्थ सहित

🧡 Introduction (परिचय)

भगवद गीता के दसवें अध्याय का नाम है विभूति योग, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों, शक्तियों और उपस्थिति का विस्तार से वर्णन करते हैं।

इस अध्याय में भगवान अर्जुन को बताते हैं कि वे किस रूप में सृष्टि के प्रत्येक महानतम रूपों में विद्यमान हैं - जैसे इन्द्रियों में मन, वेदों में सामवेद, ऋषियों में नारद आदि।

यदि आपने अध्याय 9 - राजविद्या राजगुह्य योग नहीं पढ़ा है, तो पहले उसे जरूर पढ़ें। अन्य अध्यायों के लिए श्रीमद भगवद गीता हिंदी अनुभाग पर जाएं।


श्लोक और हिंदी अर्थ

👇 नीचे सभी श्लोकों को अर्थ सहित जोड़ा जा सकता है:

अध्याय 10 - विभूतियोग में - जहाँ श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों को प्रकट करते हैं और बताते हैं कि सभी अद्भुतताएँ उन्हीं से उत्पन्न होती हैं। यह श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों और योगशक्ति का रहस्य प्रकट करते हैं।


अध्याय # 10
शलोक # 1
भगवान की विभूति और योगशक्ति का कथन तथा उनके जानने का फल

श्रीभगवानुवाच
भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ||10:1||

śrī bhagavānuvāca
bhūya ēva mahābāhō śrṛṇu mē paramaṅ vacaḥ.
yattē.haṅ prīyamāṇāya vakṣyāmi hitakāmyayā||10:1||

भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले-हे महाबाहो अर्जुन! अब फिर से मेरा परम वचन सुन, जिसे मैं तुझसे प्रेमवश तेरे कल्याण के लिए कहता हूँ।

🌿 यह श्लोक दर्शाता है कि गीता केवल उपदेश नहीं-ईश्वर का प्रेमपूर्ण संवाद है। ||10:01||

अध्याय # 10
शलोक # 2
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ||10:2||

na mē viduḥ suragaṇāḥ prabhavaṅ na maharṣayaḥ.
ahamādirhi dēvānāṅ maharṣīṇāṅ ca sarvaśaḥ||10:2||

भावार्थ: देवता और महर्षि भी मेरी उत्पत्ति को नहीं जानते, क्योंकि मैं ही उन सभी का आदि कारण हूँ।

🌺 यह श्लोक बताता है कि ईश्वर स्वयं ही आदि हैं-अजन्मा और अनादि। ||10:02||
अध्याय # 10
शलोक # 3
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ||10:3||

yō māmajamanādiṅ ca vētti lōkamahēśvaram.
asammūḍhaḥ sa martyēṣu sarvapāpaiḥ pramucyatē||10:3||

भावार्थ: जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकों का स्वामी जानता है, वह मोह से रहित होकर सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

🌼 यह श्लोक ज्ञान और भक्ति से मिलने वाली मुक्ति का वचन है। ||10:03||
अध्याय # 10
शलोक # 4
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ||10:4||

buddhirjñānamasaṅmōhaḥ kṣamā satyaṅ damaḥ śamaḥ.
sukhaṅ duḥkhaṅ bhavō.bhāvō bhayaṅ cābhayamēva ca||10:4||
अध्याय # 10
शलोक # 5
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ||10:5||

ahiṅsā samatā tuṣṭistapō dānaṅ yaśō.yaśaḥ.
bhavanti bhāvā bhūtānāṅ matta ēva pṛthagvidhāḥ||10:5||

भावार्थ: बुद्धि, ज्ञान, क्षमा, सत्य, इंद्रिय-निग्रह, सुख-दुख, जन्म-मृत्यु, भय-अभय, अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, यश और अपयश-ये सभी विविध भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।

🌸 यह श्लोक दर्शाता है कि सभी गुणों का मूल स्रोत ईश्वर ही हैं। ||10:04 - 10:05||
अध्याय # 10
शलोक # 6
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ||10:6||

maharṣayaḥ sapta pūrvē catvārō manavastathā.
madbhāvā mānasā jātā yēṣāṅ lōka imāḥ prajāḥ||10:6||

भावार्थ: सप्त ऋषि, चार सनकादि, और चौदह मनु-ये सभी मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, और इन्हीं से संपूर्ण प्रजा उत्पन्न हुई है।

🌿 यह श्लोक सृष्टि की दिव्य उत्पत्ति को प्रकट करता है। ||10:06||

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अध्याय # 10
शलोक # 7
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ||10:7||

ētāṅ vibhūtiṅ yōgaṅ ca mama yō vētti tattvataḥ.
sō.vikampēna yōgēna yujyatē nātra saṅśayaḥ||10:7||

भावार्थ: जो मेरी विभूतियों और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है, वह अविचल भक्ति से मुझमें लीन हो जाता है-इसमें कोई संदेह नहीं।

🌺 यह श्लोक ज्ञान और भक्ति के एकत्व को दर्शाता है। ||10:07||
अध्याय # 10
शलोक # 8
फल और प्रभाव सहित भक्तियोग का वर्णन
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ||10:8||

ahaṅ sarvasya prabhavō mattaḥ sarvaṅ pravartatē.
iti matvā bhajantē māṅ budhā bhāvasamanvitāḥ||10:8||

भावार्थ: मैं ही सभी का उद्गम हूँ, मुझसे ही सब कुछ प्रवाहित होता है। यह जानकर बुद्धिमान भक्त मुझे भावपूर्ण भक्ति से पूजते हैं।

🌼 यह श्लोक ईश्वर को सृष्टि के मूल कारण के रूप में स्थापित करता है। ||10:08||
अध्याय # 10
शलोक # 9
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ||10:9||

maccittā madgataprāṇā bōdhayantaḥ parasparam.
kathayantaśca māṅ nityaṅ tuṣyanti ca ramanti ca||10:9||

भावार्थ: जो मुझमें मन और प्राण अर्पित करते हैं, वे आपस में मेरी चर्चा करते हुए सदा संतुष्ट और आनंदित रहते हैं।

🌸 यह श्लोक भक्तों के आपसी प्रेम और सत्संग की महिमा है। ||10:09||
अध्याय # 10
शलोक # 10
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ||10:10||

tēṣāṅ satatayuktānāṅ bhajatāṅ prītipūrvakam.
dadāmi buddhiyōgaṅ taṅ yēna māmupayānti tē||10:10||

भावार्थ: जो निरंतर प्रेमपूर्वक मेरी भक्ति करते हैं, उन्हें मैं बुद्धियोग देता हूँ, जिससे वे मुझे प्राप्त कर सकें।

🌟 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर स्वयं भक्त को मार्ग दिखाते हैं। ||10:10||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञानदीप से अज्ञान का अंधकार मिटाने और अपनी दिव्य विभूतियों को प्रकट करने वाले हैं। श्लोक 10.11 से गीता ईश्वर की महिमा और भक्त की तृप्ति को प्रकट करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 10
शलोक # 11
अध्याय 10 - विभूतियोग के श्लोक 10.11 से 10.25 - जहाँ श्रीकृष्ण भक्तों के हृदय में ज्ञानदीप जलाकर अज्ञान का अंधकार मिटाते हैं, और फिर अपनी दिव्य विभूतियों को प्रकट करते हैं। यह वह क्षण है जहाँ ईश्वर स्वयं बताते हैं कि सभी अद्भुतताएँ उन्हीं से उत्पन्न होती हैं।

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ||10:11||

tēṣāmēvānukampārthamahamajñānajaṅ tamaḥ.
nāśayāmyātmabhāvasthō jñānadīpēna bhāsvatā||10:11||

भावार्थ: उन भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए, मैं उनके हृदय में स्थित होकर, ज्ञानरूपी प्रकाश से उनके अज्ञानजनित अंधकार को नष्ट कर देता हूँ।

🌿 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर केवल बाहर नहीं, भीतर भी हैं-और वहीं से वे प्रकाश फैलाते हैं। ||10:11||
अध्याय # 10
शलोक # 12
अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति तथा विभूति और योगशक्ति को कहने के लिए प्रार्थना

अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ||10:12||

arjuna uvāca
paraṅ brahma paraṅ dhāma pavitraṅ paramaṅ bhavān.
puruṣaṅ śāśvataṅ divyamādidēvamajaṅ vibhum||10:12||
अध्याय # 10
शलोक # 13
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ||10:13||

āhustvāmṛṣayaḥ sarvē dēvarṣirnāradastathā.
asitō dēvalō vyāsaḥ svayaṅ caiva bravīṣi mē||10:13||

भावार्थ: अर्जुन बोले-हे प्रभु! आप परम ब्रह्म, परम धाम, परम पवित्र, सनातन पुरुष, दिव्य, अजन्मा और सर्वव्यापी हैं। यही बात नारद, असित, देवल, व्यास आदि ऋषि भी कहते हैं-और आप स्वयं भी मुझे यही बताते हैं।

🌺 यह श्लोक अर्जुन की श्रद्धा और ईश्वर की महिमा का सुंदर स्तवन है। ||10:12 - 10:13||
अध्याय # 10
शलोक # 14
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ||10:14||

sarvamētadṛtaṅ manyē yanmāṅ vadasi kēśava.
na hi tē bhagavan vyakitaṅ vidurdēvā na dānavāḥ||10:14||

भावार्थ: हे केशव! जो कुछ भी आप कहते हैं, मैं उसे पूर्ण सत्य मानता हूँ। देवता और दानव भी आपके दिव्य स्वरूप को नहीं जानते।

🌼 यह श्लोक बताता है कि ईश्वर को केवल भक्ति और कृपा से ही जाना जा सकता है। ||10:14||
अध्याय # 10
शलोक # 15
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ||10:15||

svayamēvātmanā.tmānaṅ vēttha tvaṅ puruṣōttama.
bhūtabhāvana bhūtēśa dēvadēva jagatpatē||10:15||

भावार्थ: हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने को जानते हैं-क्योंकि आप भूतों के स्रष्टा, ईश्वर, देवों के देव और जगत के स्वामी हैं।

🌸 यह श्लोक ईश्वर की आत्मज्ञता और सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करता है। ||10:15||
अध्याय # 10
शलोक # 16
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ||10:16||

vaktumarhasyaśēṣēṇa divyā hyātmavibhūtayaḥ.
yābhirvibhūtibhirlōkānimāṅstvaṅ vyāpya tiṣṭhasi||10:16||
अध्याय # 10
शलोक # 17
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ||10:17||

kathaṅ vidyāmahaṅ yōgiṅstvāṅ sadā paricintayan.
kēṣu kēṣu ca bhāvēṣu cintyō.si bhagavanmayā||10:17||

भावार्थ: हे योगेश्वर! आप ही अपनी दिव्य विभूतियों को संपूर्णता से बता सकते हैं, जिनसे आप सभी लोकों में व्याप्त हैं। कृपया बताइए कि मैं आपको किन-किन रूपों में चिंतन करूँ?

🌿 यह श्लोक अर्जुन की जिज्ञासा है-वह हर रूप में ईश्वर को देखना चाहता है। ||10:16 - 10:17||
अध्याय # 10
शलोक # 18
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ||10:18||

vistarēṇātmanō yōgaṅ vibhūtiṅ ca janārdana.
bhūyaḥ kathaya tṛptirhi śrṛṇvatō nāsti mē.mṛtam||10:18||

भावार्थ: हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति और विभूतियों को विस्तार से बताइए-क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनकर भी मेरी तृप्ति नहीं होती।

🌺 यह श्लोक दर्शाता है कि सच्चा भक्त ईश्वर की महिमा को बार-बार सुनना चाहता है। ||10:18||
अध्याय # 10
शलोक # 19
भगवान द्वारा अपनी विभूतियों और योगशक्ति का वर्णन

श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ||10:19||

śrī bhagavānuvāca
hanta tē kathayiṣyāmi divyā hyātmavibhūtayaḥ.
prādhānyataḥ kuruśrēṣṭha nāstyantō vistarasya mē||10:19||

भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले-हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं अपनी दिव्य विभूतियाँ तुझे मुख्य रूप से बताऊँगा, क्योंकि मेरे विस्तार का कोई अंत नहीं है।

🌼 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर की महिमा अनंत है-पर भक्त के लिए वे उसे सीमित रूप में प्रकट करते हैं। ||10:19||
अध्याय # 10
शलोक # 20
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ||10:20||

ahamātmā guḍākēśa sarvabhūtāśayasthitaḥ.
ahamādiśca madhyaṅ ca bhūtānāmanta ēva ca||10:20||

भावार्थ: हे गुडाकेश (नींद को जीतने वाले अर्जुन)! मैं ही सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ, और भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ।

🌸 यह श्लोक ईश्वर को जीवन की हर अवस्था में उपस्थित बताता है। ||10:20||
अध्याय # 10
शलोक # 21
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ||10:21||

ādityānāmahaṅ viṣṇurjyōtiṣāṅ raviraṅśumān.
marīcirmarutāmasmi nakṣatrāṇāmahaṅ śaśī||10:21||

भावार्थ: मैं आदित्यों में विष्णु, ज्योतियों में सूर्य, मरुतों में मरीचि और नक्षत्रों में चंद्रमा हूँ।

🌟 यह श्लोक बताता है कि ईश्वर हर तेजस्वी तत्व में प्रकट होते हैं। ||10:21||
अध्याय # 10
शलोक # 22
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ||10:22||

vēdānāṅ sāmavēdō.smi dēvānāmasmi vāsavaḥ.
indriyāṇāṅ manaścāsmi bhūtānāmasmi cētanā||10:22||

भावार्थ: मैं वेदों में सामवेद, देवताओं में इंद्र, इंद्रियों में मन और प्राणियों में चेतना हूँ।

🌿 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर ही चेतना और प्रेरणा का मूल स्रोत हैं। ||10:22||
अध्याय # 10
शलोक # 23
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ||10:23||

rudrāṇāṅ śaṅkaraścāsmi vittēśō yakṣarakṣasām.
vasūnāṅ pāvakaścāsmi mēruḥ śikhariṇāmaham||10:23||

भावार्थ: मैं रुद्रों में शंकर, यक्षों में कुबेर, वसुओं में अग्नि और पर्वतों में मेरु हूँ।

🌺 यह श्लोक ईश्वर की विविधता और शक्ति को दर्शाता है-वह हर रूप में श्रेष्ठ हैं। ||10:23||
अध्याय # 10
शलोक # 24
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ||10:24||

purōdhasāṅ ca mukhyaṅ māṅ viddhi pārtha bṛhaspatim.
sēnānīnāmahaṅ skandaḥ sarasāmasmi sāgaraḥ||10:24||

भावार्थ: हे पार्थ! पुरोहितों में बृहस्पति, सेनापतियों में स्कंद (कार्तिकेय) और जलाशयों में समुद्र मैं हूँ।

🌼 यह श्लोक बताता है कि ईश्वर नेतृत्व, ज्ञान और गहराई के प्रतीक हैं। ||10:24||
अध्याय # 10
शलोक # 25
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ||10:25||

maharṣīṇāṅ bhṛgurahaṅ girāmasmyēkamakṣaram.
yajñānāṅ japayajñō.smi sthāvarāṇāṅ himālayaḥ||10:25||

भावार्थ: मैं महर्षियों में भृगु, शब्दों में ओंकार, यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर पर्वतों में हिमालय हूँ।

🌸 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर स्थिरता, पवित्रता और साधना के प्रतीक हैं। ||10:25||
अध्याय # 10
शलोक # 26
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी और भी दिव्य विभूतियाँ दिख रहे है। यहाँ श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों की झलक देते हुए बताते हैं कि सभी अद्भुतताएँ उन्हीं की महिमा का अंश हैं। यह वह क्षण है जहाँ भक्त को हर दिशा में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव होता है।

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ||10:26||

aśvatthaḥ sarvavṛkṣāṇāṅ dēvarṣīṇāṅ ca nāradaḥ.
gandharvāṇāṅ citrarathaḥ siddhānāṅ kapilō muniḥ||10:26||

भावार्थ: मैं वृक्षों में पीपल (अश्वत्थ), देवर्षियों में नारद, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ।

🌿 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर हर श्रेष्ठता में प्रकट होते हैं-चाहे वह वृक्ष हो या ऋषि। ||10:26||
अध्याय # 10
शलोक # 27
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्धवम् ।
एरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ||10:27||

uccaiḥśravasamaśvānāṅ viddhi māmamṛtōdbhavam.
airāvataṅ gajēndrāṇāṅ narāṇāṅ ca narādhipam||10:27||

भावार्थ: घोड़ों में अमृत से उत्पन्न उच्चैःश्रवा, हाथियों में ऐरावत, और मनुष्यों में राजा मैं हूँ।

🌺 यह श्लोक बताता है कि ईश्वर तेज, बल और नेतृत्व के रूप में प्रकट होते हैं। ||10:27||
अध्याय # 10
शलोक # 28
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ||10:28||

āyudhānāmahaṅ vajraṅ dhēnūnāmasmi kāmadhuk.
prajanaścāsmi kandarpaḥ sarpāṇāmasmi vāsukiḥ||10:28||

भावार्थ: शस्त्रों में वज्र, गायों में कामधेनु, सृष्टि प्रेरक कामदेव, और सर्पों में वासुकि मैं हूँ।

🌼 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर इच्छा, शक्ति और समृद्धि के रूप में भी प्रकट होते हैं। ||10:28||
अध्याय # 10
शलोक # 29
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ||10:29||

anantaścāsmi nāgānāṅ varuṇō yādasāmaham.
pitṛṇāmaryamā cāsmi yamaḥ saṅyamatāmaham||10:29||

भावार्थ: नागों में अनन्त, जलचरों में वरुण, पितरों में अर्यमा, और संयम करने वालों में यमराज मैं हूँ।

🌸 यह श्लोक ईश्वर की व्यापकता को दर्शाता है-वह मृत्यु और जीवन दोनों में हैं। ||10:29||
अध्याय # 10
शलोक # 30
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ||10:30||

prahlādaścāsmi daityānāṅ kālaḥ kalayatāmaham.
mṛgāṇāṅ ca mṛgēndrō.haṅ vainatēyaśca pakṣiṇām||10:30||

भावार्थ: दैत्यों में प्रह्लाद, गणना करने वालों में काल, पशुओं में सिंह, और पक्षियों में गरुड़ मैं हूँ।

🌟 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर धर्मात्मा असुरों में भी प्रकट होते हैं। ||10:30||
अध्याय # 10
शलोक # 31
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ||10:31||

pavanaḥ pavatāmasmi rāmaḥ śastrabhṛtāmaham.
jhaṣāṇāṅ makaraścāsmi srōtasāmasmi jāhnavī||10:31||

भावार्थ: शुद्ध करने वालों में वायु, शस्त्रधारियों में राम, जलचरों में मकर, और नदियों में गंगा मैं हूँ।

🌿 यह श्लोक बताता है कि ईश्वर पवित्रता, पराक्रम और प्रवाह के प्रतीक हैं। ||10:31||
अध्याय # 10
शलोक # 32
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ||10:32||

sargāṇāmādirantaśca madhyaṅ caivāhamarjuna.
adhyātmavidyā vidyānāṅ vādaḥ pravadatāmaham||10:32||

भावार्थ: हे अर्जुन! मैं सृष्टि का आदि, मध्य और अंत, विद्याओं में अध्यात्मविद्या, और वाद करने वालों में सत्ययुक्त वाद हूँ।

🌺 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर ही ज्ञान और तर्क का मूल हैं। ||10:32||
अध्याय # 10
शलोक # 33
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ||10:33||

akṣarāṇāmakārō.smi dvandvaḥ sāmāsikasya ca.
ahamēvākṣayaḥ kālō dhātā.haṅ viśvatōmukhaḥ||10:33||

भावार्थ: वर्णों में 'अ', समासों में द्वंद्व समास, अक्षय काल और सर्वमुखी सृष्टिकर्ता मैं हूँ।

🌼 यह श्लोक बताता है कि ईश्वर भाषा, समय और सृष्टि के मूल में हैं। ||10:33||
अध्याय # 10
शलोक # 34
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ||10:34||

mṛtyuḥ sarvaharaścāhamudbhavaśca bhaviṣyatām.
kīrtiḥ śrīrvākca nārīṇāṅ smṛtirmēdhā dhṛtiḥ kṣamā||10:34||

भावार्थ: मैं सर्वहरण करने वाली मृत्यु, भविष्य की उत्पत्ति, और स्त्रियों में कीर्ति, लक्ष्मी, वाणी, स्मृति, मेधा, धैर्य और क्षमा हूँ।

🌸 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर स्त्री-शक्तियों में भी दिव्यता के रूप में प्रकट होते हैं। ||10:34||
अध्याय # 10
शलोक # 35
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः||10:35||

bṛhatsāma tathā sāmnāṅ gāyatrī chandasāmaham.
māsānāṅ mārgaśīrṣō.hamṛtūnāṅ kusumākaraḥ||10:35||

भावार्थ: सामवेद के गीतों में बृहत्साम, छंदों में गायत्री, महीनों में मार्गशीर्ष, और ऋतुओं में वसंत मैं हूँ।

🌿 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर संगीत, समय और ऋतु में भी प्रकट होते हैं। ||10:35||
अध्याय # 10
शलोक # 36
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ||10:36||

dyūtaṅ chalayatāmasmi tējastējasvināmaham.
jayō.smi vyavasāyō.smi sattvaṅ sattvavatāmaham||10:36||

भावार्थ: छल करने वालों में जुआ, तेजस्वियों में तेज, विजयी में जय, और सत्त्वगुणियों में सत्त्व मैं हूँ।

🌺 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर हर गुण और प्रवृत्ति में भी अंतर्निहित हैं। ||10:36||
अध्याय # 10
शलोक # 37
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ||10:37||

vṛṣṇīnāṅ vāsudēvō.smi pāṇḍavānāṅ dhanaṅjayaḥ.
munīnāmapyahaṅ vyāsaḥ kavīnāmuśanā kaviḥ||10:37||

भावार्थ: वृष्णियों में वासुदेव (स्वयं श्रीकृष्ण), पांडवों में अर्जुन, मुनियों में व्यास, और कवियों में शुक्राचार्य मैं हूँ।

🌼 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर श्रेष्ठतम रूपों में स्वयं प्रकट होते हैं। ||10:37||
अध्याय # 10
शलोक # 38
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ||10:38||

daṇḍō damayatāmasmi nītirasmi jigīṣatām.
maunaṅ caivāsmi guhyānāṅ jñānaṅ jñānavatāmaham||10:38||

भावार्थ: दंड देने वालों में दंड, विजयी चाहने वालों में नीति, रहस्यों में मौन, और ज्ञानी जनों में ज्ञान मैं हूँ।

🌸 यह श्लोक बताता है कि ईश्वर अनुशासन, मौन और विवेक में भी प्रकट होते हैं। ||10:38||
अध्याय # 10
शलोक # 39
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ||10:39||

yaccāpi sarvabhūtānāṅ bījaṅ tadahamarjuna.
na tadasti vinā yatsyānmayā bhūtaṅ carācaram||10:39||

भावार्थ: हे अर्जुन! सभी प्राणियों का बीज मैं ही हूँ। ऐसा कोई चर या अचर नहीं है जो मेरे बिना अस्तित्व में हो।

🌟 यह श्लोक ईश्वर को सृष्टि के मूल बीज के रूप में स्थापित करता है। ||10:39||
अध्याय # 10
शलोक # 40
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ||10:40||

nāntō.sti mama divyānāṅ vibhūtīnāṅ paraṅtapa.
ēṣa tūddēśataḥ prōktō vibhūtērvistarō mayā||10:40||

भावार्थ: हे परंतप अर्जुन! मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है। मैंने तो केवल संक्षेप में ही तुझे अपनी विभूतियों का वर्णन किया है।

🌿 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर की महिमा अनंत है-जो कहा गया, वह तो केवल एक झलक है। ||10:40||
अध्याय # 10
शलोक # 41
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ||10:41||

yadyadvibhūtimatsattvaṅ śrīmadūrjitamēva vā.
tattadēvāvagaccha tvaṅ mama tējōṅ.śasaṅbhavam||10:41||

भावार्थ: जो कुछ भी शोभायुक्त, तेजस्वी और प्रभावशाली है, उसे तू मेरे तेज के अंश से उत्पन्न जान।

🌺 यह श्लोक सिखाता है कि संसार की हर सुंदरता और शक्ति ईश्वर की ही झलक है। ||10:41||
अध्याय # 10
शलोक # 42
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ||10:42||

athavā bahunaitēna kiṅ jñātēna tavārjuna.
viṣṭabhyāhamidaṅ kṛtsnamēkāṅśēna sthitō jagat||10:42||

भावार्थ: फिर भी, हे अर्जुन! इन सब जानकारियों से तुझे क्या? मैं इस सम्पूर्ण जगत को अपने एक अंश से ही धारण करके स्थित हूँ।

🌸 यह श्लोक गीता का सार है-ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं, और यह सम्पूर्ण सृष्टि उनकी महिमा का केवल एक अंश है। ||10:42||

🌟 इस प्रकार अध्याय 10 - "विभूतियोग" पूर्ण होता है। यह केवल ईश्वर की महिमा का वर्णन नहीं, बल्कि हर वस्तु में ईश्वर को देखने की दृष्टि प्रदान करता है।


🧘 Conclusion (निष्कर्ष)

विभूति योग हमें यह सिखाता है कि भगवान हर एक श्रेष्ठता, शक्ति, प्रतिभा, ज्ञान और सृजन के रूप में विराजमान हैं। हमें किसी भी अद्भुत चीज़ में भगवान की उपस्थिति देखनी चाहिए।

इस अध्याय से अर्जुन को भगवान की सर्वव्यापकता और दिव्यता का प्रत्यक्ष बोध होता है। इसी बोध के कारण अगला अध्याय "विश्वरूप दर्शन योग" की ओर अग्रसर होता है।


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❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

विभूति योग का क्या अर्थ है?

'विभूति योग' का अर्थ है भगवान की दिव्य महिमा और वे रूप जिनमें वह इस सृष्टि में प्रकट होते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने कौन-कौन सी विभूतियाँ बताई हैं?

उन्होंने कहा वे ज्ञानियों में ज्ञान, योद्धाओं में राम, पर्वतों में मेरु, ऋषियों में नारद हैं। ये उनकी विशेष विभूतियाँ हैं।

क्या यह अध्याय भक्ति को बढ़ाता है?

हाँ, यह अध्याय भगवान की महिमा का अनुभव कराकर भक्ति को गहराता है।

विभूति योग का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इसका उद्देश्य यह है कि सभी अद्वितीय चीज़ों में भगवान की उपस्थिति को पहचानें और उनसे प्रेम करें।

क्या भगवान केवल उन्हीं में प्रकट होते हैं जो महान हैं?

भगवान कहते हैं कि वे हर श्रेष्ठता, प्रतिभा और शक्ति में प्रकट होते हैं, लेकिन उनका स्वरूप सीमित नहीं है।


लेखक: शाइनकैप टीम | प्रकाशित: | संशोधित: