भगवद गीता - अध्याय 5
संन्यास योग - श्लोक व हिंदी अर्थ सहित
🧡 Introduction (परिचय)
भगवद गीता का पाँचवां अध्याय संन्यास योग कहलाता है। इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि कर्म योग और संन्यास दोनों ही मोक्ष के मार्ग हैं, लेकिन कर्म योग श्रेष्ठ है क्योंकि वह जीवन में रहते हुए भी आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।
इस अध्याय में श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि संन्यास केवल शरीर त्याग नहीं, बल्कि अहंकार और फल की इच्छा का त्याग है। जब व्यक्ति कर्म करता है लेकिन उसे ईश्वर को समर्पित कर देता है, तभी वह सच्चे संन्यासी के समान हो जाता है।
यदि आपने अध्याय 4 - ज्ञान कर्म संन्यास योग नहीं पढ़ा है, तो पहले उसे जरूर पढ़ें। सभी अध्यायों की सूची यहाँ देखें - श्रीमद भगवद गीता हिंदी में
श्लोक और हिंदी भावार्थ
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अध्याय 5 - संन्यास योग में-जहाँ श्रीकृष्ण कर्मयोग और संन्यास के बीच का गूढ़ अंतर स्पष्ट करते हैं। इस अध्याय में श्रीकृष्ण कर्मयोग और कर्मसंन्यास के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करते हैं। यह अध्याय सिखाता है कि त्याग केवल बाहरी कर्मों का नहीं, बल्कि फल की आसक्ति का होना चाहिए।
शलोक # 1
अर्जुन उवाच
सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ||
arjuna uvāca
saṅnyāsaṅ karmaṇāṅ kṛṣṇa punaryōgaṅ ca śaṅsasi.
yacchrēya ētayōrēkaṅ tanmē brūhi suniśicatam||5:1||
भावार्थ: अर्जुन बोले-हे कृष्ण! आप कभी कर्मसंन्यास की प्रशंसा करते हैं और कभी कर्मयोग की। कृपया निश्चित रूप से बताइए कि इन दोनों में से कौन-सा मार्ग अधिक कल्याणकारी है।
🌿 यह अर्जुन की गहन जिज्ञासा है-वह केवल त्याग नहीं, सच्चा कल्याण चाहता है। ||5:01||
शलोक # 2
सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ||
śrī bhagavānuvāca
saṅnyāsaḥ karmayōgaśca niḥśrēyasakarāvubhau.
tayōstu karmasaṅnyāsātkarmayōgō viśiṣyatē||5:2||
भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले-कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों ही मोक्षदायक हैं, परंतु कर्मयोग कर्मसंन्यास से श्रेष्ठ है।
🌺 यहाँ श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कर्म करते हुए त्याग करना अधिक व्यावहारिक और प्रभावी है। ||5:02||
शलोक # 3
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ||
jñēyaḥ sa nityasaṅnyāsī yō na dvēṣṭi na kāṅkṣati.
nirdvandvō hi mahābāhō sukhaṅ bandhātpramucyatē||5:3||
भावार्थ: जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी वस्तु की कामना करता है, वही सच्चा संन्यासी है। ऐसा व्यक्ति द्वंद्वों से रहित होकर बंधन से मुक्त हो जाता है।
🌼 यह श्लोक सिखाता है कि संन्यास वस्त्रों का नहीं, वृत्ति का होता है। ||5:03||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को यह दिखाने वाले हैं कि कर्मयोग और संन्यास वास्तव में एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं-परंतु कर्मयोग अधिक सहज और प्रभावशाली मार्ग है। अब गीता समदृष्टि और आत्मतृप्ति की ओर प्रवाहित होने वाली है। 📿✨
शलोक # 4
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ||
sāṅkhyayōgau pṛthagbālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ.
ēkamapyāsthitaḥ samyagubhayōrvindatē phalam||5:4৷
भावार्थ : उपर्युक्त संन्यास और कर्मयोग को मूर्ख लोग पृथक्-पृथक् फल देने वाले कहते हैं न कि पण्डितजन, क्योंकि दोनों में से एक में भी सम्यक् प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है||5:4||
भावार्थ: केवल अज्ञानी ही संन्यास (सांख्य) और कर्मयोग को भिन्न मानते हैं। जो ज्ञानी हैं, वे जानते हैं कि इन दोनों में से किसी एक में भी सम्यक रूप से स्थित होकर वही फल प्राप्त किया जा सकता है।
🌿 यह श्लोक बताता है कि मार्ग अलग हो सकते हैं, परंतु लक्ष्य एक ही है-ब्रह्म की प्राप्ति। ||5:04||
शलोक # 5
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ||
yatsāṅkhyaiḥ prāpyatē sthānaṅ tadyōgairapi gamyatē.
ēkaṅ sāṅkhyaṅ ca yōgaṅ ca yaḥ paśyati sa paśyati||5:5||
भावार्थ: जो स्थिति ज्ञानयोगी (संन्यासी) प्राप्त करते हैं, वही स्थिति कर्मयोगी भी प्राप्त करते हैं। इसलिए जो इन दोनों को एक ही समझता है, वही वास्तव में यथार्थ को देखता है।
🌺 यह श्लोक समदृष्टि का संदेश है-जहाँ साधना का स्वरूप भले भिन्न हो, परंतु साध्य एक ही है। ||5:05||
शलोक # 6
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ||
saṅnyāsastu mahābāhō duḥkhamāptumayōgataḥ.
yōgayuktō munirbrahma nacirēṇādhigacchati||5:6||
भावार्थ: हे महाबाहो! केवल संन्यास से ब्रह्म की प्राप्ति कठिन है, परंतु जो मुनि योगयुक्त होकर कर्म करता है, वह शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
🌼 यह श्लोक कर्मयोग की व्यावहारिकता और प्रभावशीलता को दर्शाता है-जहाँ त्याग कर्म में रहकर होता है, भागकर नहीं। ||5:06||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मतृप्त कर्मयोगी की उस दिव्यता की ओर ले जा रहे हैं जहाँ साधक कर्तापन से मुक्त होकर ब्रह्म में स्थित हो जाता है। अब गीता समदृष्टि और ब्रह्मस्थिति की ओर प्रवाहित होने वाली है। 📿✨
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शलोक # 7
सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ||
yōgayuktō viśuddhātmā vijitātmā jitēndriyaḥ.
sarvabhūtātmabhūtātmā kurvannapi na lipyatē||5:7||
भावार्थ: जो योग में स्थित है, जिसका अंतःकरण शुद्ध है, जिसने मन और इंद्रियों को जीत लिया है, और जो सभी प्राणियों में आत्मा को देखता है-वह कर्म करता हुआ भी कर्म से लिप्त नहीं होता।
🌿 यह श्लोक आत्मतृप्त योगी की पहचान है-जो भीतर से पूर्ण है, बाहर से कर्मशील, परंतु बंधनरहित। ||5:07||
शलोक # 8
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन् ||
naiva kiṅcitkarōmīti yuktō manyēta tattvavit.
paśyan śrṛṇavanspṛśañjighrannaśnangacchansvapan śvasan||5:8||
शलोक # 9
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ||
pralapanvisṛjangṛhṇannunmiṣannimiṣannapi.
indriyāṇīndriyārthēṣu vartanta iti dhārayan||5:9||
भावार्थ: तत्व को जानने वाला योगी यह सोचता है-"मैं कुछ नहीं करता।" वह देखता है, सुनता है, स्पर्श करता है, सूंघता है, खाता है, चलता है, सोता है, श्वास लेता है, बोलता है, त्यागता है, ग्रहण करता है, आँखें खोलता और बंद करता है-फिर भी जानता है कि इंद्रियाँ ही इंद्रिय विषयों में कार्य कर रही हैं, आत्मा नहीं।
🌺 यह श्लोक साक्षीभाव की पराकाष्ठा है-जहाँ साधक कर्म करता हुआ भी भीतर से अकर्ता रहता है। ||5:08 - 509||
शलोक # 10
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ||
brahmaṇyādhāya karmāṇi saṅgaṅ tyaktvā karōti yaḥ.
lipyatē na sa pāpēna padmapatramivāmbhasā||5:10||
भावार्थ: जो व्यक्ति अपने सभी कर्मों को ब्रह्म में अर्पित करके, आसक्ति त्यागकर कार्य करता है-वह पाप से उसी प्रकार अछूता रहता है जैसे कमल का पत्ता जल से।
🌼 यह श्लोक निष्काम कर्मयोग का प्रतीक है-जहाँ कर्म तो होता है, पर बंधन नहीं। ||5:10||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को आसक्ति रहित कर्म, आत्मशुद्धि और समत्व की ओर ले जा रहे हैं-जहाँ साधक कर्तापन से मुक्त होकर ब्रह्म में स्थित हो जाता है। अब गीता पूर्ण समदृष्टि और ब्रह्मानंद की ओर प्रवाहित होने वाली है। 📿✨
शलोक # 11
कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति संग त्यक्त्वात्मशुद्धये ||
kāyēna manasā buddhyā kēvalairindriyairapi.
yōginaḥ karma kurvanti saṅgaṅ tyaktvā||tmaśuddhayē||5:11||
भावार्थ: योगीजन शरीर, मन, बुद्धि और केवल इंद्रियों के द्वारा आसक्ति रहित होकर केवल आत्मशुद्धि के लिए कर्म करते हैं।
🌿 यह श्लोक सिखाता है कि कर्म केवल फल के लिए नहीं-बल्कि आत्मा की शुद्धि के लिए होना चाहिए। ||5:11||
शलोक # 12
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ||
yuktaḥ karmaphalaṅ tyaktvā śāntimāpnōti naiṣṭhikīm.
ayuktaḥ kāmakārēṇa phalē saktō nibadhyatē||5:12||
भावार्थ: योगयुक्त व्यक्ति कर्मफल का त्याग करके परम शांति को प्राप्त करता है, जबकि आसक्त व्यक्ति फल की कामना से बंध जाता है।
🌺 यह श्लोक बताता है कि त्याग से शांति मिलती है, और आसक्ति से बंधन। ||5:12||
शलोक # 13
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ||
sarvakarmāṇi manasā saṅnyasyāstē sukhaṅ vaśī.
navadvārē purē dēhī naiva kurvanna kārayan||5:13||
भावार्थ: जिसने मन से सभी कर्मों का संन्यास कर दिया है, वह आत्मनियंत्रित पुरुष नौ-द्वारों वाले शरीर में सुखपूर्वक रहता है, न कुछ करता है, न करवाता है।
🌼 यह श्लोक दर्शाता है कि सच्चा योगी शरीर में रहते हुए भी आत्मा में स्थित रहता है-कर्तापन से परे। ||5:13||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को ब्रह्मदृष्टि, समत्व और आत्मानंद की उस दिव्यता की ओर ले जा रहे हैं जहाँ साधक सभी में एक ही ब्रह्म को देखता है और पूर्ण शांति को प्राप्त करता है। अब गीता समदर्शिता और ब्रह्मानंद की ओर प्रवाहित होने वाली है। 📿✨
शलोक # 14
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ।
भावार्थ : परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है||5:14|| na kartṛtvaṅ na karmāṇi lōkasya sṛjati prabhuḥ.
na karmaphalasaṅyōgaṅ svabhāvastu pravartatē||5:14||
भावार्थ: परमात्मा न तो किसी के कर्मों का कर्तापन बनाते हैं, न कर्मों को उत्पन्न करते हैं, और न ही कर्मफल का संयोग करते हैं-यह सब प्रकृति के गुणों द्वारा होता है।
🌿 यह श्लोक बताता है कि ईश्वर केवल साक्षी हैं-कर्म और फल प्रकृति के गुणों से संचालित होते हैं। ||5:14||
शलोक # 15
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ||
nādattē kasyacitpāpaṅ na caiva sukṛtaṅ vibhuḥ.
ajñānēnāvṛtaṅ jñānaṅ tēna muhyanti jantavaḥ||5:15||
भावार्थ: सर्वव्यापी परमात्मा न किसी के पाप को ग्रहण करते हैं, न पुण्य को। परंतु अज्ञान से ढका हुआ ज्ञान ही जीवों को मोह में डाल देता है।
🌺 यह श्लोक चेतावनी है-जब तक अज्ञान है, तब तक भ्रम है; जब ज्ञान प्रकट होता है, तब ही मुक्ति संभव है। ||5:15||
शलोक # 16
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ||
jñānēna tu tadajñānaṅ yēṣāṅ nāśitamātmanaḥ.
tēṣāmādityavajjñānaṅ prakāśayati tatparam||5:16||
भावार्थ: जिनका अज्ञान आत्मज्ञान से नष्ट हो गया है, उनके लिए वह ज्ञान सूर्य के समान परम तत्व को प्रकाशित करता है।
🌼 यह श्लोक ज्ञान की महिमा है-जो आत्मा को प्रकाशित करता है, जैसे सूर्य अंधकार को मिटा देता है। ||5:16||
शलोक # 17
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ||
tadbuddhayastadātmānastanniṣṭhāstatparāyaṇāḥ.
gacchantyapunarāvṛttiṅ jñānanirdhūtakalmaṣāḥ||5:17||
भावार्थ: जिनकी बुद्धि, आत्मा, निष्ठा और लक्ष्य-all ब्रह्म में स्थित हैं, वे ज्ञान से पापरहित होकर उस अवस्था को प्राप्त होते हैं जहाँ से फिर लौटना नहीं होता।
🌸 यह श्लोक मोक्ष का वचन है-जहाँ साधक ब्रह्म में लीन होकर जन्म-मरण से मुक्त हो जाता है। ||5:17||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को समदृष्टि और ब्रह्मानंद की उस दिव्यता की ओर ले जा रहे हैं जहाँ सभी में एक ही आत्मा को देखने वाला साधक साक्षात ब्रह्म में स्थित हो जाता है। अब गीता पूर्ण समत्व और परम शांति की ओर प्रवाहित होने वाली है। 📿✨
शलोक # 18
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ||
vidyāvinayasaṅpannē brāhmaṇē gavi hastini.
śuni caiva śvapākē ca paṇḍitāḥ samadarśinaḥ||5:18||
भावार्थ: जो ज्ञानी हैं, वे विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल (अछूत) को भी समदृष्टि से देखते हैं।
🌿 यह श्लोक समत्व की पराकाष्ठा है-जहाँ साधक बाह्य रूप नहीं, भीतर की आत्मा को देखता है। ||5:18||
शलोक # 19
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः ||
ihaiva tairjitaḥ sargō yēṣāṅ sāmyē sthitaṅ manaḥ.
nirdōṣaṅ hi samaṅ brahma tasmādbrahmaṇi tē sthitāḥ||5:19||
भावार्थ: जिनका मन समत्व में स्थित है, उन्होंने इस जीवन में ही संसार को जीत लिया है, क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है-इसलिए वे ब्रह्म में स्थित हैं।
🌺 यह श्लोक बताता है कि समदृष्टि ही ब्रह्मस्थिति की पहचान है। ||5:19||
शलोक # 20
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ||
na prahṛṣyētpriyaṅ prāpya nōdvijētprāpya cāpriyam.
sthirabuddhirasammūḍhō brahmavidbrahmaṇi sthitaḥ||5:20||
भावार्थ: जो प्रिय वस्तु मिलने पर हर्षित नहीं होता और अप्रिय मिलने पर उद्विग्न नहीं होता, वह स्थिरबुद्धि, संशयरहित ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म में स्थित होता है।
🌼 यह श्लोक सिखाता है कि सच्चा योगी सुख-दुख से परे, आत्मा में स्थित रहता है। ||5:20||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मिक आनंद, इंद्रिय संयम और ईश्वर की भक्ति के उस दिव्य संगम की ओर ले जा रहे हैं जहाँ साधक परम शांति को प्राप्त करता है। अब गीता ब्रह्मानंद और ईश्वरार्पण की पूर्णता को प्रकट करने वाली है। 📿✨
शलोक # 21
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ||
bāhyasparśēṣvasaktātmā vindatyātmani yatsukham.
sa brahmayōgayuktātmā sukhamakṣayamaśnutē||5:21||
भावार्थ: जो व्यक्ति बाह्य विषयों में आसक्त नहीं होता और आत्मा में स्थित होकर जो सुख प्राप्त करता है-वह ब्रह्मयोग से युक्त होकर अक्षय सुख को प्राप्त करता है।
🌿 यह श्लोक आत्मिक आनंद की महिमा है-जो इंद्रिय सुखों से परे, शाश्वत और अमर होता है। ||5:21||
शलोक # 22
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ||
yē hi saṅsparśajā bhōgā duḥkhayōnaya ēva tē.
ādyantavantaḥ kauntēya na tēṣu ramatē budhaḥ||5:22||
भावार्थ: हे कौन्तेय! जो सुख इंद्रियों के विषयों से उत्पन्न होते हैं, वे वास्तव में दुःख का कारण हैं, क्योंकि उनका आदि और अंत होता है। इसलिए ज्ञानी व्यक्ति उनमें आसक्त नहीं होता।
🌺 यह श्लोक चेतावनी है-इंद्रिय सुख क्षणिक हैं, पर उनका मोह अनंत दुःख देता है। ||5:22||
शलोक # 23
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ||
śaknōtīhaiva yaḥ sōḍhuṅ prākśarīravimōkṣaṇāt.
kāmakrōdhōdbhavaṅ vēgaṅ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ||5:23||
भावार्थ: जो व्यक्ति शरीर त्याग से पहले काम और क्रोध के वेग को सहन कर सकता है, वही सच्चा योगी और सुखी पुरुष है।
🌼 यह श्लोक आत्मसंयम की विजय है-जहाँ भीतर की आग बुझाकर साधक शांति में स्थित होता है। ||5:23||
शलोक # 24
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ||
yō.ntaḥsukhō.ntarārāmastathāntarjyōtirēva yaḥ.
sa yōgī brahmanirvāṇaṅ brahmabhūtō.dhigacchati||5:24||
भावार्थ: जो व्यक्ति भीतर से सुखी, भीतर में रमण करने वाला और भीतर ही प्रकाशमान है-वह योगी ब्रह्म में लीन होकर ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त करता है।
🌸 यह श्लोक आत्मप्रकाश की पराकाष्ठा है-जहाँ साधक बाहर नहीं, भीतर में ब्रह्म को अनुभव करता है। ||5:24||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को सर्वभूतहित और ईश्वरभक्ति के उस दिव्य संगम की ओर ले जा रहे हैं-जहाँ साधक सभी प्राणियों के कल्याण में ही ईश्वर की अनुभूति करता है। अब गीता परम शांति और ईश्वरार्पण की पूर्णता को प्रकट करने वाली है। 📿✨
शलोक # 25
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ||
labhantē brahmanirvāṇamṛṣayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥ.
chinnadvaidhā yatātmānaḥ sarvabhūtahitē ratāḥ||5:25||
भावार्थ: जिन ऋषियों के पाप नष्ट हो गए हैं, जिनका संदेह समाप्त हो गया है, जो आत्मसंयमी हैं और सभी प्राणियों के कल्याण में रत रहते हैं-वे ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त करते हैं।
🌿 यह श्लोक दर्शाता है कि सच्चा योगी केवल आत्मकल्याण नहीं, सर्वकल्याण में रत होता है। ||5:25||
शलोक # 26
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ||
kāmakrōdhaviyuktānāṅ yatīnāṅ yatacētasām.
abhitō brahmanirvāṇaṅ vartatē viditātmanām||5:26||
भावार्थ: जो यती (संयमी) काम और क्रोध से रहित हैं, जिनका चित्त नियंत्रित है और जिन्होंने आत्मा को जान लिया है-उनके लिए ब्रह्मनिर्वाण चारों ओर विद्यमान है।
🌺 यह श्लोक आत्मविजयी साधक की महिमा है-जो भीतर की अग्नियों को शांत कर परम में स्थित होता है। ||5:26||
शलोक # 27
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ||
sparśānkṛtvā bahirbāhyāṅścakṣuścaivāntarē bhruvōḥ.
prāṇāpānau samau kṛtvā nāsābhyantaracāriṇau||5:27||
शलोक # 28
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ||
yatēndriyamanōbuddhirmunirmōkṣaparāyaṇaḥ.
vigatēcchābhayakrōdhō yaḥ sadā mukta ēva saḥ||5:28||
भावार्थ: जो मुनि बाह्य विषयों से इंद्रियों को हटाकर, दृष्टि को भ्रूमध्य में स्थिर करता है, प्राण और अपान को सम करता है, और जिसकी इंद्रियाँ, मन और बुद्धि संयमित हैं-जो इच्छा, भय और क्रोध से रहित है-वह सदा के लिए मुक्त होता है।
🌼 यह श्लोक ध्यानयोग की पराकाष्ठा है-जहाँ साधक भीतर की शांति में लीन हो जाता है। ||5:27 - 5:28||
शलोक # 29
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ||
bhōktāraṅ yajñatapasāṅ sarvalōkamahēśvaram.
suhṛdaṅ sarvabhūtānāṅ jñātvā māṅ śāntimṛcchati||5:29||
भावार्थ: जो मुझे सभी यज्ञों और तपस्याओं का भोक्ता, सभी लोकों का स्वामी और सभी प्राणियों का सच्चा मित्र जानता है-वह परम शांति को प्राप्त करता है।
🌸 यह श्लोक गीता का हृदय है-ईश्वर केवल नियंता नहीं, सुहृद हैं-हमारे अंतरंग मित्र। ||5:29||
🌟 इस प्रकार अध्याय 5 - "संन्यास योग" पूर्ण होता है। यह केवल त्याग का उपदेश नहीं, बल्कि कर्तव्य, समदृष्टि और ईश्वरभक्ति का दिव्य संगम है।
🧘 Conclusion (निष्कर्ष)
अध्याय 5 यह दर्शाता है कि सच्चा योगी वही है जो कर्म करता है लेकिन उसका फल नहीं चाहता। वह न तो त्याग में अहंकार रखता है और न ही भोग में आसक्ति। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति ही जीवन और मृत्यु के बंधन से मुक्त होता है और ईश्वर से एकाकार हो जाता है।
यह अध्याय आज के जीवन में भी बेहद प्रासंगिक है, जहाँ आध्यात्मिक शांति पाने के लिए कर्म के साथ समर्पण भी जरूरी है।
अन्य उपयोगी लिंक
- अध्याय 1 - अर्जुन विषाद योग
- अध्याय 2 - सांख्य योग
- अध्याय 3 - कर्म योग
- अध्याय 4 - ज्ञान कर्म संन्यास योग
❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
अध्याय 5 का नाम क्या है?
इस अध्याय को संन्यास योग कहा जाता है, जिसमें श्रीकृष्ण ने कर्म त्याग और आत्मज्ञान पर बल दिया है।
क्या संन्यास योग में कर्म करना आवश्यक है?
हाँ, श्रीकृष्ण के अनुसार केवल संन्यास नहीं, बल्कि कर्म करते हुए उसका फल त्यागना श्रेष्ठ मार्ग है।
कर्म योग और संन्यास में क्या अंतर है?
कर्म योग में व्यक्ति कर्म करता है लेकिन फल की इच्छा नहीं रखता। संन्यास में वह संसारिक बंधनों का त्याग करता है।
क्या यह अध्याय मोक्ष का मार्ग दिखाता है?
हाँ, इस अध्याय में निर्मल बुद्धि, समत्व भाव और समर्पण द्वारा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताया गया है।
मैं सभी अध्याय कहाँ से पढ़ सकता हूँ?
आप श्रीमद भगवद गीता हिंदी पेज पर जाकर सभी अध्याय एक साथ पढ़ सकते हैं।
