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दाहिनी ओर रथ पर सवार होकर अर्जुन को सलाह देते हुए भगवान कृष्ण का चित्रण और बायीं ओर 'भगवद गीता | अध्याय 8 | अक्षर ब्रह्म योग श्लोक और अर्थ सहित' लिखा हुआ है।

भगवद गीता - अध्याय 8
अक्षर ब्रह्म योग - श्लोक और अर्थ सहित

🧡 Introduction (परिचय)

अक्षर ब्रह्म योग, श्रीमद भगवद गीता का अष्टम अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के उन गूढ़ प्रश्नों का उत्तर देते हैं जो मृत्यु के समय ईश्वर स्मरण, ब्रह्म, आत्मा, कर्म और मोक्ष से संबंधित हैं।

इस अध्याय का केंद्र है - कैसे कोई साधक मृत्यु के समय भगवान को स्मरण कर मोक्ष प्राप्त कर सकता है। श्रीकृष्ण यह भी समझाते हैं कि जीवन के अंत में स्मृति किस प्रकार हमारी आगामी गति को तय करती है।

यदि आपने अध्याय 7 - ज्ञान विज्ञान योग नहीं पढ़ा है, तो पहले उसे अवश्य पढ़ें। सभी अध्यायों की सूची श्रीमद भगवद गीता हिंदी में पृष्ठ पर उपलब्ध है।


श्लोक और हिंदी भावार्थ

👇 इस अनुभाग में आप अध्याय 8 के सभी श्लोक संस्कृत, लिप्यंतरण और अर्थ सहित जोड़ सकते हैं:

अध्याय 8 - अक्षर ब्रह्म योग में - जहाँ श्रीकृष्ण मृत्यु के समय ईश्वर-स्मरण, ब्रह्म की प्राप्ति, और परम गति का रहस्य प्रकट करते हैं। 📿✨ यहाँ जहाँ श्रीकृष्ण ब्रह्म, अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ जैसे गूढ़ विषयों को स्पष्ट करते हैं, और मृत्यु के समय ईश्वर-स्मरण की महिमा बताते हैं।


अध्याय # 8
शलोक # 1
ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर

अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते||8:1||

arjuna uvāca
kiṅ tadbrahma kimadhyātmaṅ kiṅ karma puruṣōttama.
adhibhūtaṅ ca kiṅ prōktamadhidaivaṅ kimucyatē||8:1||
अध्याय # 8
शलोक # 2
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ||8:2||

adhiyajñaḥ kathaṅ kō.tra dēhē.sminmadhusūdana.
prayāṇakālē ca kathaṅ jñēyō.si niyatātmabhiḥ||8:2||

भावार्थ: अर्जुन पूछते हैं-हे पुरुषोत्तम! ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत और अधिदैव क्या हैं? और हे मधुसूदन! अधियज्ञ कौन है और वह इस शरीर में कैसे स्थित है? मृत्यु के समय साधक आपको कैसे जानता है?

🌿 यह श्लोक अर्जुन की गहन जिज्ञासा है-वह तत्वज्ञान को जानना चाहता है, न केवल युद्ध की नीति। ||8:01 - 8:02||
अध्याय # 8
शलोक # 3
श्रीभगवानुवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ||8:3||

śrī bhagavānuvāca
akṣaraṅ brahma paramaṅ svabhāvō.dhyātmamucyatē.
bhūtabhāvōdbhavakarō visargaḥ karmasaṅjñitaḥ||8:3||

भावार्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं-परम अक्षर ब्रह्म है, जीवात्मा को अध्यात्म कहते हैं, और जो त्याग भूतों की उत्पत्ति का कारण बनता है, वह कर्म कहलाता है।

🌺 यह श्लोक ब्रह्म और आत्मा के भेद को स्पष्ट करता है। ||8:03||
अध्याय # 8
शलोक # 4
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ||8:4||

adhibhūtaṅ kṣarō bhāvaḥ puruṣaścādhidaivatam.
adhiyajñō.hamēvātra dēhē dēhabhṛtāṅ vara||8:4||

भावार्थ: नाशवान पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यगर्भ पुरुष अधिदैव है, और हे अर्जुन! इस शरीर में मैं ही अधियज्ञ हूँ।

🌼 यह श्लोक दर्शाता है कि श्रीकृष्ण स्वयं यज्ञों के केंद्र हैं-अंतर्यामी रूप में। ||8:04||
अध्याय # 8
शलोक # 5
अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ||8:5||

antakālē ca māmēva smaranmuktvā kalēvaram.
yaḥ prayāti sa madbhāvaṅ yāti nāstyatra saṅśayaḥ||8:5||

भावार्थ: जो व्यक्ति मृत्यु के समय भी मुझे स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है, वह निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होता है।

🌸 यह श्लोक मृत्यु के समय ईश्वर-स्मरण की महिमा को प्रकट करता है। ||8:05||

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अध्याय # 8
शलोक # 6
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ||8:6||

yaṅ yaṅ vāpi smaranbhāvaṅ tyajatyantē kalēvaram.
taṅ tamēvaiti kauntēya sadā tadbhāvabhāvitaḥ||8:6||

भावार्थ: हे अर्जुन! जो भाव अंत समय में स्मरण किया जाता है, वही भाव साधक को प्राप्त होता है-क्योंकि वह जीवनभर उसी में रमा रहा।

🌿 यह श्लोक चेतावनी है-जैसा चिंतन, वैसा अंतिम गंतव्य। ||8:06||
अध्याय # 8
शलोक # 7
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ||8:7||

tasmātsarvēṣu kālēṣu māmanusmara yudhya ca.
mayyarpitamanōbuddhirmāmēvaiṣyasyasaṅśayam||8:7||

भावार्थ: इसलिए तू सदा मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मन और बुद्धि मुझमें अर्पित कर दे-तब तू निःसंदेह मुझे ही प्राप्त करेगा।

🌺 यह श्लोक कर्म और भक्ति के अद्वितीय संगम का संदेश है। ||8:07||
अध्याय # 8
शलोक # 8
भगवान का परम धाम और भक्ति के सोलह प्रकार
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ||8:8||

abhyāsayōgayuktēna cētasā nānyagāminā.
paramaṅ puruṣaṅ divyaṅ yāti pārthānucintayan||8:8||

भावार्थ: हे पार्थ! जो साधक अभ्यासयोग से युक्त होकर, मन को अन्यत्र न जाने देकर, निरंतर परम पुरुष का चिंतन करता है-वह उसे प्राप्त करता है।

🌼 यह श्लोक ध्यान और भक्ति की एकाग्रता को दर्शाता है। ||8:08||
अध्याय # 8
शलोक # 9
कविं पुराणमनुशासितार-मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ||8:9||

kaviṅ purāṇamanuśāsitāra-
maṇōraṇīyāṅsamanusmarēdyaḥ.
sarvasya dhātāramacintyarūpa-
mādityavarṇaṅ tamasaḥ parastāt||8:9||

भावार्थ: जो पुरुष सर्वज्ञ, सनातन, सबका नियंता, अति सूक्ष्म, सबका धारणकर्ता, अचिन्त्य रूप, सूर्य के समान तेजस्वी और अंधकार से परे उस परमेश्वर का स्मरण करता है...

🌸 यह श्लोक ईश्वर के दिव्य स्वरूप का ध्यान है-जो ध्यान में प्रकट होता है। ||8:09||
अध्याय # 8
शलोक # 10
प्रयाण काले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्- स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ||8:10||

prayāṇakālē manasā.calēna
bhaktyā yuktō yōgabalēna caiva.
bhruvōrmadhyē prāṇamāvēśya samyak
sa taṅ paraṅ puruṣamupaiti divyam||8:10||

भावार्थ: जो भक्त मृत्यु के समय योगबल से प्राण को भ्रूमध्य में स्थिर कर, अचल मन से परम पुरुष का स्मरण करता है-वह उसे ही प्राप्त करता है।

🌟 यह श्लोक मृत्यु के समय ध्यान की विधि और फल को प्रकट करता है। ||8:10||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को ओंकार ब्रह्म, मृत्यु के समय ध्यान की विधि, और परम गति की ओर ले जा रहे हैं। अब गीता अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति और योगबल की ओर प्रवाहित होने वाली है। 📿✨
अध्याय # 8
शलोक # 11
अब हम अध्याय 8 - अक्षर ब्रह्म योग के श्लोक 11 से 20 - जहाँ श्रीकृष्ण अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति, ओंकार का स्मरण, और सृष्टि के चक्र से परे परम धाम का रहस्य प्रकट करते हैं।

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ||8:11||

yadakṣaraṅ vēdavidō vadanti
viśanti yadyatayō vītarāgāḥ.
yadicchantō brahmacaryaṅ caranti
tattē padaṅ saṅgrahēṇa pravakṣyē||8:11||

भावार्थ: जिसे वेदज्ञानी अक्षर ब्रह्म कहते हैं, जिसमें वैराग्ययुक्त तपस्वी प्रवेश करते हैं, और जिसकी प्राप्ति के लिए ब्रह्मचारी जीवन जीते हैं-उस परम पद को मैं संक्षेप में बताऊँगा।

🌿 यह श्लोक उस परम लक्ष्य की भूमिका है, जिसे जानने के लिए साधक जीवन भर तप करता है। ||8:11||
अध्याय # 8
शलोक # 12
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ||8:12||

sarvadvārāṇi saṅyamya manō hṛdi nirudhya ca.
mūrdhnyādhāyātmanaḥ prāṇamāsthitō yōgadhāraṇām||8:12||

भावार्थ: सभी इंद्रियों के द्वारों को रोककर, मन को हृदय में स्थिर करके, प्राण को मस्तक में स्थापित कर, योगधारणा में स्थित होकर...

🌺 यह श्लोक मृत्यु के समय ध्यान की विधि को दर्शाता है-जहाँ साधक भीतर की यात्रा करता है। ||8:12||
अध्याय # 8
शलोक # 13
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ||8:13||

ōmityēkākṣaraṅ brahma vyāharanmāmanusmaran.
yaḥ prayāti tyajandēhaṅ sa yāti paramāṅ gatim||8:13||

भावार्थ: जो साधक 'ॐ' इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ, मेरा स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है-वह परम गति को प्राप्त होता है।

🌼 यह श्लोक ओंकार की महिमा है-जो साधक को ब्रह्म से जोड़ता है। ||8:13||
अध्याय # 8
शलोक # 14
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनीः ||8:14||

ananyacētāḥ satataṅ yō māṅ smarati nityaśaḥ.
tasyāhaṅ sulabhaḥ pārtha nityayuktasya yōginaḥ||8:14||

भावार्थ: हे पार्थ! जो योगी अनन्य चित्त होकर सदा मेरा स्मरण करता है, उसके लिए मैं सुलभ हूँ-वह मुझे सहज ही प्राप्त करता है।

🌸 यह श्लोक भक्ति की सरलता और सच्चाई को दर्शाता है। ||8:14||
अध्याय # 8
शलोक # 15
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ||8:15||

māmupētya punarjanma duḥkhālayamaśāśvatam.
nāpnuvanti mahātmānaḥ saṅsiddhiṅ paramāṅ gatāḥ||8:15||

भावार्थ: जो महात्मा मुझे प्राप्त कर लेते हैं, वे इस दुःखमय और नश्वर संसार में फिर जन्म नहीं लेते-क्योंकि उन्होंने परम सिद्धि प्राप्त कर ली होती है।

🌟 यह श्लोक मोक्ष का वचन है-जहाँ जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। ||8:15||
अध्याय # 8
शलोक # 16
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ||8:16||

ābrahmabhuvanāllōkāḥ punarāvartinō.rjuna.
māmupētya tu kauntēya punarjanma na vidyatē||8:16||

भावार्थ: हे अर्जुन! ब्रह्मलोक तक सभी लोक पुनर्जन्म के अधीन हैं, परंतु जो मुझे प्राप्त करता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता।

🌿 यह श्लोक बताता है कि केवल ईश्वर की प्राप्ति ही जन्म-मरण से मुक्ति देती है। ||8:16||
अध्याय # 8
शलोक # 17
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ||8:17||

sahasrayugaparyantamaharyadbrahmaṇō viduḥ.
rātriṅ yugasahasrāntāṅ tē.hōrātravidō janāḥ||8:17||

भावार्थ: जो ज्ञानी जानते हैं कि ब्रह्मा का एक दिन हजार युगों के बराबर होता है और रात्रि भी उतनी ही लंबी होती है-वे काल के रहस्य को समझते हैं।

🌺 यह श्लोक ब्रह्मा के कालचक्र की विशालता को दर्शाता है। ||8:17||
अध्याय # 8
शलोक # 18
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ||8:18||

avyaktādvyaktayaḥ sarvāḥ prabhavantyaharāgamē.
rātryāgamē pralīyantē tatraivāvyaktasaṅjñakē||8:18||

भावार्थ: ब्रह्मा के दिन के प्रारंभ में सभी प्राणी अव्यक्त से उत्पन्न होते हैं, और रात्रि के प्रारंभ में उसी अव्यक्त में लीन हो जाते हैं।

🌼 यह श्लोक सृष्टि और प्रलय के चक्र को दर्शाता है। ||8:18||
अध्याय # 8
शलोक # 19
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ||8:19||

bhūtagrāmaḥ sa ēvāyaṅ bhūtvā bhūtvā pralīyatē.
rātryāgamē.vaśaḥ pārtha prabhavatyaharāgamē||8:19||

भावार्थ: हे पार्थ! वही प्राणियों का समूह बार-बार जन्म लेता है और रात्रि में लीन हो जाता है-यह सब प्रकृति के वश में होता है।

🌸 यह श्लोक बताता है कि जीव प्रकृति के चक्र में बंधा हुआ है-जब तक वह ईश्वर को न प्राप्त करे। ||8:19||
अध्याय # 8
शलोक # 20
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ||8:20||

parastasmāttu bhāvō.nyō.vyaktō.vyaktātsanātanaḥ.
yaḥ sa sarvēṣu bhūtēṣu naśyatsu na vinaśyati||8:20||

भावार्थ: परंतु उस अव्यक्त से भी परे एक सनातन अव्यक्त भाव है-जो सभी प्राणियों के नष्ट हो जाने पर भी नष्ट नहीं होता।

🌟 यह श्लोक ईश्वर के परम धाम की झलक है-जो सृष्टि के पार, शाश्वत और अविनाशी है। ||8:20||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को उस परम धाम की ओर ले जा रहे हैं-जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता, और जो केवल अनन्य भक्ति से प्राप्त होता है। अब गीता परम धाम और प्रकाश-पथ की ओर प्रवाहित होने वाली है। 📿✨
अध्याय # 8
शलोक # 21
अब हम अध्याय 8 - अक्षर ब्रह्म योग के अंतिम श्लोकों की ओर बढ़ते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण परम धाम, प्रकाश और अंधकार के दो मार्ग, और योगी की परम सिद्धि का रहस्य प्रकट करते हैं। यह वह मार्ग है जहाँ साधक मृत्यु के पार जाकर शाश्वत ब्रह्म में लीन हो जाता है।

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ||8:21||

avyaktō.kṣara ityuktastamāhuḥ paramāṅ gatim.
yaṅ prāpya na nivartantē taddhāma paramaṅ mama ||8:21||

भावार्थ: जो अव्यक्त अक्षर कहा गया है, वही परम गति है। उसे प्राप्त करके साधक फिर लौटकर नहीं आता-वह मेरा परम धाम है।

🌿 यह श्लोक मोक्ष की घोषणा है-जहाँ आत्मा ईश्वर में लीन होकर जन्म-मरण से मुक्त हो जाती है। ||8:22||
अध्याय # 8
शलोक # 22
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ||8:22||

puruṣaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyastvananyayā.
yasyāntaḥsthāni bhūtāni yēna sarvamidaṅ tatam||8:22||

भावार्थ: हे पार्थ! वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होता है, जिसमें सभी प्राणी स्थित हैं और जिससे पूरा जगत व्याप्त है।

🌺 यह श्लोक बताता है कि केवल अनन्य भक्ति ही परमेश्वर की प्राप्ति का मार्ग है। ||8:22||
अध्याय # 8
शलोक # 23
शुक्ल और कृष्ण मार्ग का वर्णन
यत्र काले त्वनावत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ||8:23||

yatra kālē tvanāvṛttimāvṛttiṅ caiva yōginaḥ.
prayātā yānti taṅ kālaṅ vakṣyāmi bharatarṣabha||8:23||

भावार्थ: हे भरतश्रेष्ठ! अब मैं तुझे वह काल बताऊँगा, जिसमें शरीर त्यागने पर योगी पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है, और वह भी जिसमें वह लौटकर आता है।

🌼 यह श्लोक दो मार्गों की भूमिका है-प्रकाश का मार्ग और अंधकार का मार्ग। ||8:23||
अध्याय # 8
शलोक # 24
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ||8:24||

agnirjyōtirahaḥ śuklaḥ ṣaṇmāsā uttarāyaṇam.
tatra prayātā gacchanti brahma brahmavidō janāḥ||8:24||

भावार्थ: अग्नि, प्रकाश, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण-इन कालों में शरीर त्यागने वाले ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

🌸 यह श्लोक प्रकाश के मार्ग की व्याख्या है-जो मोक्ष की ओर ले जाता है। ||8:24||
अध्याय # 8
शलोक # 25
धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ||8:25||

dhūmō rātristathā kṛṣṇaḥ ṣaṇmāsā dakṣiṇāyanam.
tatra cāndramasaṅ jyōtiryōgī prāpya nivartatē||8:25||

भावार्थ: धुआँ, रात्रि, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन-इन कालों में शरीर त्यागने वाला योगी चंद्रलोक को प्राप्त करता है, परंतु फिर लौटकर आता है।

🌿 यह श्लोक अंधकार के मार्ग की व्याख्या है-जो पुनर्जन्म की ओर ले जाता है। ||8:25||
अध्याय # 8
शलोक # 26
शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः ||8:26||

śuklakṛṣṇē gatī hyētē jagataḥ śāśvatē matē.
ēkayā yātyanāvṛttimanyayā||vartatē punaḥ ||8:26||

भावार्थ: ये शुक्ल और कृष्ण दो मार्ग सदैव से जगत में माने गए हैं-एक से मोक्ष प्राप्त होता है, और दूसरे से पुनर्जन्म।

🌺 यह श्लोक दर्शाता है कि साधक की गति उसके अंतःभाव और समय पर निर्भर करती है। ||8:26||
अध्याय # 8
शलोक # 27
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ||8:27||

naitē sṛtī pārtha jānanyōgī muhyati kaścana.
tasmātsarvēṣu kālēṣu yōgayuktō bhavārjuna|| 8.27||

भावार्थ: हे पार्थ! जो योगी इन दोनों मार्गों को जानता है, वह कभी मोह में नहीं पड़ता-इसलिए तू सभी समयों में योगयुक्त हो जा।

🌼 यह श्लोक विवेक और साधना की प्रेरणा है-ज्ञान ही भ्रम को मिटाता है। ||8:27||
अध्याय # 8
शलोक # 28
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येत तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ||8:28||

vēdēṣu yajñēṣu tapaḥsu caiva
dānēṣu yatpuṇyaphalaṅ pradiṣṭam.
atyēti tatsarvamidaṅ viditvā
yōgī paraṅ sthānamupaiti cādyam||8:28||

भावार्थ: जो पुण्यफल वेद, यज्ञ, तप और दान से मिलता है, उसे जानकर योगी उससे भी ऊपर उठ जाता है और परम धाम को प्राप्त करता है।

🌟 यह श्लोक योग की सर्वोच्चता की घोषणा है-जहाँ सभी कर्मों का फल ईश्वर में लीन हो जाता है। ||8:28||

🌺 इस प्रकार अध्याय 8 - "अक्षर ब्रह्म योग" पूर्ण होता है। यह केवल मृत्यु का रहस्य नहीं, बल्कि जीवन की दिशा, भक्ति की शक्ति और ब्रह्म की प्राप्ति का दिव्य मार्ग है।


🧘 Conclusion (निष्कर्ष)

भगवद गीता का अध्याय 8 हमें यह सिखाता है कि मृत्यु का क्षण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। जिस वस्तु का स्मरण अंत समय में होता है, वही अगले जन्म या मुक्ति का कारण बनती है।

यह अध्याय परमात्मा के अक्षर (अविनाशी) स्वरूप, मृत्यु के रहस्य और उस मार्ग का खुलासा करता है जिससे साधक मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। यह आध्यात्मिक साधकों के लिए अत्यंत उपयोगी है।


अन्य उपयोगी लिंक

❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

अध्याय 8 को अक्षर ब्रह्म योग क्यों कहा गया है?

क्योंकि इस अध्याय में श्रीकृष्ण परम अक्षर ब्रह्म (अविनाशी परमात्मा) के स्वरूप और उसके ध्यान से मुक्ति की बात करते हैं।

मृत्यु के समय भगवान का स्मरण क्यों जरूरी है?

क्योंकि भगवान कहते हैं कि जो अंत समय में जिस वस्तु का स्मरण करता है, वही उसकी गति बन जाती है। इसलिए मृत्यु के समय भगवान का स्मरण मोक्ष का द्वार खोलता है।

मोक्ष का सही मार्ग क्या है?

मोक्ष का मार्ग भगवान के भजन, निष्काम कर्म, और पूर्ण समर्पण से होकर जाता है - जैसा कि अध्याय 8 में बताया गया है।

क्या इस अध्याय में मृत्यु के बाद की यात्रा का वर्णन है?

हां, भगवान दो मार्गों - देवयान मार्ग (प्रकाश मार्ग) और पितृयान मार्ग (अंधकार मार्ग) - का वर्णन करते हैं, जो आत्मा की मृत्यु के बाद गति को निर्धारित करते हैं।

क्या केवल मृत्यु के समय स्मरण ही पर्याप्त है?

नहीं, भगवान कहते हैं कि निरंतर अभ्यास और भक्ति से ही साधक मृत्यु के समय भगवान का स्मरण कर पाते हैं।


लेखक: शाइनकैप टीम | प्रकाशित: | संशोधित: