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दाहिनी ओर रथ पर सवार होकर अर्जुन को सलाह देते हुए भगवान कृष्ण का चित्रण और बायीं ओर ' श्रीमद भगवद गीता - भगवद गीता | अध्याय 1 | अर्जुन विसादा योग | श्लोक, भावार्थ व सरल अर्थ सहित' लिखा हुआ है।

भगवद गीता - अध्याय 1
(अर्जुन विषाद योग) | श्लोक, भावार्थ व सरल अर्थ

🧡 Introduction (परिचय)

भगवद गीता के अध्याय 1 को अर्जुन विषाद योग कहा जाता है। इस अध्याय में युद्ध प्रारंभ होने से पहले की स्थिति, सेनाओं की व्यवस्था, प्रमुख योद्धाओं का वर्णन, और अर्जुन की मानसिक स्थिति को दर्शाया गया है। राजा धृतराष्ट्र के एक प्रश्न से अध्याय की शुरुआत होती है और संजय के उत्तर से यह अध्याय आगे बढ़ता है।

अर्जुन युद्धभूमि में अपने सगे-संबंधियों को देखकर मोह और विषाद में पड़ जाते हैं। यह अध्याय हमें मानसिक द्वंद्व, कर्तव्य और धर्म की गहराइयों से परिचित कराता है।

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श्लोक और हिंदी भावार्थ

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अध्याय # 1
शलोक # 1
दोनों सेनाओं के प्रधान शूरवीरों और अन्य महान वीरों का वर्णन

धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ||1:1||

dhṛtarāṣṭra uvāca
dharmakṣētrē kurukṣētrē samavētā yuyutsavaḥ.
māmakāḥ pāṇḍavāścaiva kimakurvata sañjaya||1:1||

धृतराष्ट्र बोले: हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में जब मेरे और पांडवों के पुत्र युद्ध के लिए एकत्र हुए, तब उन्होंने क्या किया?

भावार्थ: अंधे राजा धृतराष्ट्र युद्ध की शुरुआत से चिंतित हैं। वह जानना चाहते हैं कि धर्मभूमि में उनके पुत्रों ने क्या किया-कहीं धर्म का प्रभाव उन्हें विचलित न कर दे। ||1:01||
अध्याय # 1
शलोक # 2
संजय उवाच
दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ||1:2।।

sañjaya uvāca
dṛṣṭvā tu pāṇḍavānīkaṅ vyūḍhaṅ duryōdhanastadā.
ācāryamupasaṅgamya rājā vacanamabravīt||1:2||

संजय बोले: हे राजन्! पांडवों की सेना को युद्ध के लिए तैयार देखकर दुर्योधन ने अपने गुरु द्रोणाचार्य से कहा...

भावार्थ: संजय युद्धभूमि का आँखों देखा हाल सुना रहे हैं। दुर्योधन की चिंता बढ़ रही है। ||1:02||
अध्याय # 1
शलोक # 3
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ||

paśyaitāṅ pāṇḍuputrāṇāmācārya mahatīṅ camūm.

दुर्योधन बोले: हे आचार्य! देखिए, पांडवों की विशाल सेना को, जिसे आपके ही शिष्य धृष्टद्युम्न ने सजाया है।

भावार्थ: दुर्योधन गुरु द्रोण को याद दिला रहा है कि उनके ही शिष्य ने अब उनके विरुद्ध सेना खड़ी की है। इसमें उसकी चिंता और व्यंग्य दोनों झलकते हैं। ||1:03||

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अध्याय # 1
शलोक # 4
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ||

atra śūrā mahēṣvāsā bhīmārjunasamā yudhi.
yuyudhānō virāṭaśca drupadaśca mahārathaḥ||1:4||
अध्याय # 1
शलोक # 5
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः ||

dhṛṣṭakētuścēkitānaḥ kāśirājaśca vīryavān.
purujitkuntibhōjaśca śaibyaśca narapuṅgavaḥ||1:5||
अध्याय # 1
शलोक # 6
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ||

yudhāmanyuśca vikrānta uttamaujāśca vīryavān.
saubhadrō draupadēyāśca sarva ēva mahārathāḥ||1:6||

इस सेना में भीम और अर्जुन जैसे पराक्रमी योद्धा हैं-जैसे सात्यकि, विराट, राजा द्रुपद, धृष्टकेतु, चेकितान, काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज, शैब्य, युधामन्यु, उत्तमौजा, अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र।

भावार्थ: पांडवों की सेना केवल बड़ी नहीं है, बल्कि उसमें हर योद्धा महारथी है। दुर्योधन को यह देखकर भीतर से भय हो रहा है। ||1:04 - 1:06||
अध्याय # 1
शलोक # 7
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ||

asmākaṅ tu viśiṣṭā yē tānnibōdha dvijōttama.
nāyakā mama sainyasya saṅjñārthaṅ tānbravīmi tē||1:7||
अध्याय # 1
शलोक # 8
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ||

bhavānbhīṣmaśca karṇaśca kṛpaśca samitiñjayaḥ.
aśvatthātmā vikarṇaśca saumadattistathaiva ca||1:8||
अध्याय # 1
शलोक # 9
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ||

anyē ca bahavaḥ śūrā madarthē tyaktajīvitāḥ.
nānāśastrapraharaṇāḥ sarvē yuddhaviśāradāḥ||1:9||

अब दुर्योधन अपनी सेना के वीरों का वर्णन करता है-भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण, भूरिश्रवा और अन्य योद्धा जो उसके लिए प्राण देने को तैयार हैं।

भावार्थ: वह अपनी सेना की ताकत गिनाता है, लेकिन भीतर से जानता है कि पांडवों की सेना धर्म और संकल्प से भरी है। ||1:07 - 1:09||
अध्याय # 1
शलोक # 10
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ||

aparyāptaṅ tadasmākaṅ balaṅ bhīṣmābhirakṣitam.
paryāptaṅ tvidamētēṣāṅ balaṅ bhīmābhirakṣitam||1:10||
अध्याय # 1
शलोक # 11
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ||

ayanēṣu ca sarvēṣu yathābhāgamavasthitāḥ.
bhīṣmamēvābhirakṣantu bhavantaḥ sarva ēva hi||1:11||

हमारी सेना भीष्म के नेतृत्व में असीम है, लेकिन पांडवों की सेना भीम के नेतृत्व में संगठित है। सभी योद्धा भीष्म की रक्षा करें।

भावार्थ: दुर्योधन को भीष्म पर भरोसा है, लेकिन वह जानता है कि भीष्म का हृदय पांडवों के लिए कोमल है-इसलिए वह सबको उनकी रक्षा का आदेश देता है। ||1:10 - 1:11||
अध्याय # 1
शलोक # 12
दोनों सेनाओं की शंख-ध्वनि का वर्णन
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मो प्रतापवान् ||

tasya saṅjanayanharṣaṅ kuruvṛddhaḥ pitāmahaḥ.
siṅhanādaṅ vinadyōccaiḥ śaṅkhaṅ dadhmau pratāpavān||1:12||

भावार्थ: कौरवों के वृद्ध और प्रतापी पितामह भीष्म ने दुर्योधन को उत्साहित करने के लिए सिंह की तरह गर्जना करते हुए ऊँचे स्वर में शंख बजाया। ||1:12||
अध्याय # 1
शलोक # 13
ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ||

tataḥ śaṅkhāśca bhēryaśca paṇavānakagōmukhāḥ.
sahasaivābhyahanyanta sa śabdastumulō.bhavat||1:13||

भावार्थ: फिर शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और नरसिंघे एक साथ बज उठे। वह ध्वनि इतनी प्रचंड थी कि युद्ध का माहौल पूरी तरह से जाग उठा। ||1:13||
अध्याय # 1
शलोक # 14
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ||

tataḥ śvētairhayairyuktē mahati syandanē sthitau.
mādhavaḥ pāṇḍavaścaiva divyau śaṅkhau pradadhmatuḥ||1:14||

भावार्थ: फिर सफेद घोड़ों से जुते दिव्य रथ में बैठे भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी अपने-अपने अलौकिक शंख बजाए। ||1:14||
अध्याय # 1
शलोक # 15
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः ||

pāñcajanyaṅ hṛṣīkēśō dēvadattaṅ dhanaṅjayaḥ.
pauṇḍraṅ dadhmau mahāśaṅkhaṅ bhīmakarmā vṛkōdaraḥ||1:15||

भावार्थ: श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य, अर्जुन ने देवदत्त और बलशाली भीम ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया-जैसे धर्म और पराक्रम की गर्जना हो। ||1:15||
अध्याय # 1
शलोक # 16
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ||

anantavijayaṅ rājā kuntīputrō yudhiṣṭhiraḥ.
nakulaḥ sahadēvaśca sughōṣamaṇipuṣpakau||1:16||
अध्याय # 1
शलोक # 17
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ||

kāśyaśca paramēṣvāsaḥ śikhaṇḍī ca mahārathaḥ.
dhṛṣṭadyumnō virāṭaśca sātyakiścāparājitaḥ||1:17||
अध्याय # 1
शलोक # 18
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक् ||

drupadō draupadēyāśca sarvaśaḥ pṛthivīpatē.
saubhadraśca mahābāhuḥ śaṅkhāndadhmuḥ pṛthakpṛthak||1:18||

भावार्थ: युधिष्ठिर ने अनन्तविजय, नकुल-सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक, और अन्य महारथियों-काशिराज, शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट, सात्यकि, द्रुपद, द्रौपदी के पुत्रों और अभिमन्यु-ने भी अपने-अपने शंख बजाए। यह केवल शंखध्वनि नहीं थी, यह धर्म की पुकार थी। ||1:16 - 1:18||
अध्याय # 1
शलोक # 19
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ||

sa ghōṣō dhārtarāṣṭrāṇāṅ hṛdayāni vyadārayat.
nabhaśca pṛthivīṅ caiva tumulō vyanunādayan||1:19||

भावार्थ: वह भयंकर ध्वनि आकाश और पृथ्वी को गुंजा रही थी और धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदयों को भय से कंपा रही थी। ||1:19||

हम धीरे-धीरे अर्जुन के मन की गहराइयों में उतरते हैं-जहाँ युद्ध से पहले आत्मा की पुकार सुनाई देती है। 🌺📿
अध्याय # 1
शलोक # 20
अब हम अर्जुन के भीतर उठते भावनात्मक तूफ़ान में प्रवेश करते हैं-जहाँ करुणा, मोह और धर्म का द्वंद्व गहराता है|

अर्जुन उवाचः
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ||

arjuna uvāca
atha vyavasthitān dṛṣṭvā dhārtarāṣṭrānkapidhvajaḥ.
pravṛttē śastrasaṅpātē dhanurudyamya pāṇḍavaḥ||1:20||
अध्याय # 1
शलोक # 21
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ||

hṛṣīkēśaṅ tadā vākyamidamāha mahīpatē.
sēnayōrubhayōrmadhyē rathaṅ sthāpaya mē.cyuta||1:21||

अर्जुन ने कहा: हे अच्युत! जब मैंने कौरवों को युद्ध के लिए तैयार देखा, तो कृपया मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में ले चलिए।

भावार्थ: अर्जुन अब युद्ध से पहले अपने शत्रुओं को देखना चाहता है। लेकिन यह केवल रणनीति नहीं-यह आत्मा की पुकार है, जो अपने ही बंधु-बांधवों से युद्ध करने को लेकर विचलित हो रही है। ||1:20 - 1:21||
अध्याय # 1
शलोक # 22
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ||

yāvadētānnirīkṣē.haṅ yōddhukāmānavasthitān.
kairmayā saha yōddhavyamasminraṇasamudyamē||1:22||
अध्याय # 1
शलोक # 23
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ||

yōtsyamānānavēkṣē.haṅ ya ētē.tra samāgatāḥ.
dhārtarāṣṭrasya durbuddhēryuddhē priyacikīrṣavaḥ||1:23||

मैं देखना चाहता हूँ कि किन-किन लोगों से मुझे युद्ध करना है-जो इस दुर्बुद्धि दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए यहाँ एकत्र हुए हैं।

भावार्थ: अर्जुन की दृष्टि अब केवल शत्रु पर नहीं, बल्कि उन संबंधों पर है जो धर्म और अधर्म के बीच फँस गए हैं। वह जानना चाहता है कि कौन-कौन अपने स्वार्थ के लिए अधर्म का साथ दे रहा है। ||1:22 - 1:23||
अध्याय # 1
शलोक # 24
संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ||

sañjaya uvāca
ēvamuktō hṛṣīkēśō guḍākēśēna bhārata.
sēnayōrubhayōrmadhyē sthāpayitvā rathōttamam||1:24||
अध्याय # 1
शलोक # 25
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति ||

bhīṣmadrōṇapramukhataḥ sarvēṣāṅ ca mahīkṣitām.
uvāca pārtha paśyaitānsamavētānkurūniti||1:25||

संजय बोले: हृषीकेश श्रीकृष्ण ने अर्जुन के कहने पर रथ को भीष्म, द्रोण और अन्य राजाओं के सामने खड़ा कर दिया और कहा-हे पार्थ! देखो इन कौरवों को।

भावार्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन को केवल युद्धभूमि नहीं दिखा रहे-वह उसे उसके भीतर के युद्ध से भी परिचित करा रहे हैं। यह दृश्य अर्जुन के मन को झकझोर देता है। ||1:24 - 1:25||
अध्याय # 1
शलोक # 26
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः पितृनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ||

tatrāpaśyatsthitānpārthaḥ pitṛnatha pitāmahān.
ācāryānmātulānbhrātṛnputrānpautrānsakhīṅstathā||1:26||
अध्याय # 1
शलोक # 27
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान् ||

कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत् ।

tānsamīkṣya sa kauntēyaḥ sarvānbandhūnavasthitān||1:27||

kṛpayā parayā||viṣṭō viṣīdannidamabravīt

अर्जुन ने वहाँ अपने पितरों, गुरुओं, भाइयों, पुत्रों, मित्रों और ससुरों को देखा-और करुणा से भर गया।

भावार्थ: यह युद्ध अब केवल बाहरी नहीं रहा। अर्जुन के लिए यह आत्मा और कर्तव्य के बीच का संघर्ष बन गया है। वह अपने ही प्रियजनों को सामने देखकर विचलित हो उठता है। ||1:26 - 1:27||
अध्याय # 1
शलोक # 28
अर्जुन का विषाद,भगवान के नामों की व्याख्या

अर्जुन उवाच
दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ||

arjuna uvāca
dṛṣṭvēmaṅ svajanaṅ kṛṣṇa yuyutsuṅ samupasthitam||1:28||
अध्याय # 1
शलोक # 29
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते ||

sīdanti mama gātrāṇi mukhaṅ ca pariśuṣyati.
vēpathuśca śarīrē mē rōmaharṣaśca jāyatē||1:29||

हे कृष्ण! मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुख सूख रहा है, शरीर काँप रहा है, और रोमांच हो रहा है।

भावार्थ अर्जुन का शरीर उसकी आत्मा की पीड़ा को प्रकट कर रहा है। यह केवल भय नहीं-यह करुणा, मोह और धर्म का गहन द्वंद्व है। ||1:28 - 1:29||

अर्जुन की यह अवस्था हम सभी के जीवन में कभी न कभी आती है-जब हमें अपने ही प्रियजनों के विरुद्ध सत्य के लिए खड़ा होना पड़ता है।
अध्याय # 1
शलोक # 30
अब हम अर्जुन के उस आंतरिक संघर्ष में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ उसका हृदय धर्म, करुणा और मोह के बीच झूल रहा है।

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ||

gāṇḍīvaṅ sraṅsatē hastāttvakcaiva paridahyatē.
na ca śaknōmyavasthātuṅ bhramatīva ca mē manaḥ||1:30||

भावार्थ: हे केशव! मैं अब खड़ा भी नहीं रह पा रहा हूँ, मेरा मन चक्कर खा रहा है। मुझे चारों ओर अशुभ संकेत दिखाई दे रहे हैं। ||1:30||
अध्याय # 1
शलोक # 31
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ||

nimittāni ca paśyāmi viparītāni kēśava.
na ca śrēyō.nupaśyāmi hatvā svajanamāhavē||1:31||

भावार्थ: हे गोविन्द! न मुझे विजय चाहिए, न राज्य और न ही सुख। जब अपने ही प्रियजन मारे जाएँगे, तो इन सबका क्या मूल्य रह जाएगा? ||1:31||
अध्याय # 1
शलोक # 32
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा ||

na kāṅkṣē vijayaṅ kṛṣṇa na ca rājyaṅ sukhāni ca.
kiṅ nō rājyēna gōvinda kiṅ bhōgairjīvitēna vā||1:32||
अध्याय # 1
शलोक # 33
येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ||

yēṣāmarthē kāṅkṣitaṅ nō rājyaṅ bhōgāḥ sukhāni ca.
ta imē.vasthitā yuddhē prāṇāṅstyaktvā dhanāni ca||1:33||

भावार्थ: जिनके लिए हम राज्य, सुख और भोग चाहते हैं-वे ही हमारे सामने युद्धभूमि में खड़े हैं, अपने प्राण और धन त्यागने को तैयार। ||1:32 - 1:33||
अध्याय # 1
शलोक # 34
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा ||

ācāryāḥ pitaraḥ putrāstathaiva ca pitāmahāḥ.
mātulāḥ ścaśurāḥ pautrāḥ śyālāḥ sambandhinastathā||1:34||
अध्याय # 1
शलोक # 35
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ||

ētānna hantumicchāmi ghnatō.pi madhusūdana.
api trailōkyarājyasya hētōḥ kiṅ nu mahīkṛtē||1:35||

भावार्थ: हे जनार्दन! क्या हमें अपने ही गुरु, पिता, पुत्र, ससुर और मित्रों को मारकर कोई सुख मिलेगा? भले ही वे हमें मारना चाहें, मैं उन्हें मारना नहीं चाहता-even if offered the three worlds. ||1:34 - 1:35||
अध्याय # 1
शलोक # 36
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः ||

nihatya dhārtarāṣṭrānnaḥ kā prītiḥ syājjanārdana.
pāpamēvāśrayēdasmānhatvaitānātatāyinaḥ||1:36||
अध्याय # 1
शलोक # 37
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ||

tasmānnārhā vayaṅ hantuṅ dhārtarāṣṭrānsvabāndhavān.
svajanaṅ hi kathaṅ hatvā sukhinaḥ syāma mādhava||1:37||

भावार्थ: भले ही वे अधर्मी हों, लेकिन उन्हें मारना हमारे लिए पाप होगा। अपने ही स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी रह सकते हैं, हे माधव? ||1:36 - 1:37||

अर्जुन की यह करुण पुकार केवल युद्ध से हटने की नहीं है-यह आत्मा की गहराई से उठी हुई पुकार है, जो धर्म, करुणा और कर्तव्य के बीच रास्ता खोज रही है। 🌺📜
अध्याय # 1
शलोक # 38
अब हम अर्जुन के उस गहरे मानसिक और आध्यात्मिक द्वंद्व में प्रवेश कर रहे हैं, जहाँ वह केवल युद्ध नहीं, बल्कि धर्म, कुल परंपरा और आत्मा की शांति के बारे में सोच रहा है।

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ||

yadyapyētē na paśyanti lōbhōpahatacētasaḥ.
kulakṣayakṛtaṅ dōṣaṅ mitradrōhē ca pātakam||1:38||
अध्याय # 1
शलोक # 39
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ||

kathaṅ na jñēyamasmābhiḥ pāpādasmānnivartitum.
kulakṣayakṛtaṅ dōṣaṅ prapaśyadbhirjanārdana||1:39||

भावार्थ: अर्जुन कहता है-भले ही ये लोग लोभ में अंधे होकर कुल के नाश और मित्रद्रोह को पाप नहीं मानते, पर हमें तो यह समझना चाहिए और इस पाप से बचना चाहिए। ||1:38 - 1:39||
अध्याय # 1
शलोक # 40
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ||

kulakṣayē praṇaśyanti kuladharmāḥ sanātanāḥ.
dharmē naṣṭē kulaṅ kṛtsnamadharmō.bhibhavatyuta||1:40||

भावार्थ: जब कुल नष्ट होता है, तो उसके साथ उसकी परंपराएँ, संस्कार और धर्म भी नष्ट हो जाते हैं। और जब धर्म नष्ट होता है, तो अधर्म हावी हो जाता है। ||1:40||
अध्याय # 1
शलोक # 41
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ||

adharmābhibhavātkṛṣṇa praduṣyanti kulastriyaḥ.
strīṣu duṣṭāsu vārṣṇēya jāyatē varṇasaṅkaraḥ||1:41||

भावार्थ: हे कृष्ण! जब अधर्म बढ़ता है, तो कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, और इससे समाज में वर्णसंकर (अवांछित संतति) उत्पन्न होती है। ||1:41||
अध्याय # 1
शलोक # 42
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ||

saṅkarō narakāyaiva kulaghnānāṅ kulasya ca.
patanti pitarō hyēṣāṅ luptapiṇḍōdakakriyāḥ||1:42||

भावार्थ: वर्णसंकर संतति से कुल का पतन होता है, और पितरों को पिंड-जल आदि श्राद्ध कर्म नहीं मिलते-इससे वे भी नरक में चले जाते हैं। ||1;42||
अध्याय # 1
शलोक # 43
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ||

dōṣairētaiḥ kulaghnānāṅ varṇasaṅkarakārakaiḥ.
utsādyantē jātidharmāḥ kuladharmāśca śāśvatāḥ||1:43||

भावार्थ: इस प्रकार कुल का नाश और वर्णसंकर की वृद्धि से जाति और कुल के शाश्वत धर्म भी नष्ट हो जाते हैं। ||1:43||
अध्याय # 1
शलोक # 44
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ||

utsannakuladharmāṇāṅ manuṣyāṇāṅ janārdana.
narakē.niyataṅ vāsō bhavatītyanuśuśruma||1:44||

भावार्थ: हे जनार्दन! हमने सुना है कि जिनका कुलधर्म नष्ट हो जाता है, वे नरक में स्थायी रूप से निवास करते हैं। ||1:44||

अर्जुन अब केवल योद्धा नहीं रहा-वह एक चिंतक, एक धर्मात्मा बन गया है, जो युद्ध के पीछे के गहरे नैतिक और आध्यात्मिक परिणामों को देख रहा है। 🌼📖
अध्याय # 1
शलोक # 45
अब हम अर्जुन के उस क्षण में पहुँचते हैं जहाँ वह युद्ध से पूरी तरह विमुख हो जाता है।

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ||

ahō bata mahatpāpaṅ kartuṅ vyavasitā vayam.
yadrājyasukhalōbhēna hantuṅ svajanamudyatāḥ||1:45||

भावार्थ: हाय! हम कितने बड़े पाप के लिए तैयार हो गए हैं-सिर्फ राज्य और सुख के लोभ में अपने ही स्वजनों को मारने जा रहे हैं। ||1;45||
अध्याय # 1
शलोक # 46
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ||

yadi māmapratīkāramaśastraṅ śastrapāṇayaḥ.
dhārtarāṣṭrā raṇē hanyustanmē kṣēmataraṅ bhavēt||1:46||

भावार्थ: यदि धृतराष्ट्र के पुत्र मुझे निहत्था और प्रतिकार न करने की अवस्था में युद्ध में मार डालें, तो भी वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा। ||1:46||
अध्याय # 1
शलोक # 47
संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ||

sañjaya uvāca
ēvamuktvā.rjunaḥ saṅkhyē rathōpastha upāviśat.
visṛjya saśaraṅ cāpaṅ śōkasaṅvignamānasaḥ||1:47||

भावार्थ: संजय बोले-इस प्रकार कहकर अर्जुन ने अपना धनुष-बाण त्याग दिया और शोक से व्याकुल मन से रथ के भीतर बैठ गया। ||1:47||

🌿 इस प्रकार अध्याय 1-"अर्जुन विषाद योग" समाप्त होता है। यह केवल युद्ध की भूमिका नहीं है, बल्कि आत्मा के भीतर उठते उस तूफ़ान की कथा है, जहाँ धर्म, मोह, करुणा और कर्तव्य एक-दूसरे से टकराते हैं।


🧘 Conclusion (निष्कर्ष)

अर्जुन विषाद योग यह दिखाता है कि कैसे एक महायोद्धा भी मोह और मानसिक भ्रम में पड़ सकता है। यह अध्याय केवल एक युद्ध की तैयारी नहीं है, बल्कि हर मनुष्य के अंदर चलने वाले भावनात्मक संघर्ष का प्रतीक है।

अर्जुन का आत्ममंथन और उनके मन में उठ रहे प्रश्न ही भगवद गीता की शुरुआत का कारण बनते हैं। यह अध्याय हमें सिखाता है कि कर्तव्य और धर्म के मार्ग पर चलना आसान नहीं होता, लेकिन जब मन संदेहों से भर जाए, तो आध्यात्मिक मार्गदर्शन आवश्यक हो जाता है।


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❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

भगवद गीता का पहला अध्याय क्या है?

अर्जुन विषाद योग, जो युद्ध से पहले की परिस्थिति और अर्जुन की मानसिक स्थिति को दर्शाता है।

पहले अध्याय में अर्जुन क्या अनुभव करता है?

अर्जुन अपने रिश्तेदारों को देखकर युद्ध से पीछे हटने की भावना व्यक्त करता है।

इस अध्याय का क्या महत्व है?

यह अध्याय बताता है कि मानसिक भ्रम और मोह से उबरने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान कितना आवश्यक है।

भगवद गीता का यह अध्याय कब बोला गया था?

यह संवाद [महाभारत] के युद्ध से ठीक पहले कहा गया था।

क्या मैं गीता के बाकी अध्याय भी पढ़ सकता हूँ?

हाँ, आप सभी अध्यायों को पढ़ सकते हैं यहाँ: 👉 श्रीमद भगवद गीता हिंदी में - सभी अध्याय


लेखक: शाइनकैप टीम | प्रकाशित: | संशोधित: