शाइनकैप का लोगो
दाहिनी ओर रथ पर सवार होकर अर्जुन को सलाह देते हुए भगवान कृष्ण का चित्रण और बायीं ओर 'भगवद गीता | अध्याय 3 | कर्म योग श्लोक और भावार्थ सहित' लिखा हुआ है।

भगवद गीता - अध्याय 3
कर्म योग - श्लोक और भावार्थ सहित

🧡 Introduction (परिचय)

भगवद गीता का तीसरा अध्याय कर्म योग कहलाता है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि त्याग या संन्यास से ज्यादा जरूरी है कर्म करते हुए भी बिना फल की आशा के कार्य करना।

यह अध्याय बताता है कि हर मनुष्य को अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करना चाहिए और कर्म करते समय निष्काम भावना रखनी चाहिए। यह अध्याय कर्म योग की शक्ति को उजागर करता है, जो आज के जीवन में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना महाभारत काल में था।

यदि आपने अध्याय 2 - सांख्य योग नहीं पढ़ा है, तो कृपया पहले उसे पढ़ें। सभी अध्यायों की सूची के लिए यहाँ क्लिक करें - श्रीमद भगवद गीता हिंदी में


श्लोक और हिंदी भावार्थ

👇 नीचे सभी श्लोक उनके संस्कृत मूल, लिप्यंतरण और हिंदी अर्थ के साथ प्रस्तुत हैं।

अध्याय 3 - कर्म योग में-जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को यह सिखाते हैं कि कर्तव्य करते हुए भी कैसे योगी बना जा सकता है, और कर्म को ही भक्ति का मार्ग कैसे बनाया जाए। 📿✨


अध्याय # 3
शलोक # 1
ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की आवश्यकता

अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ||

arjuna uvāca
jyāyasī cētkarmaṇastē matā buddhirjanārdana.
tatkiṅ karmaṇi ghōrē māṅ niyōjayasi kēśava||3:1||

भावार्थ: अर्जुन बोले-हे जनार्दन! यदि आपको ज्ञान (बुद्धि) कर्म से श्रेष्ठ लगता है, तो फिर हे केशव! मुझे इस भयंकर युद्ध रूपी कर्म में क्यों लगाते हैं?

🌿 यह अर्जुन का संशय है-जब ज्ञान श्रेष्ठ है, तो फिर कर्म क्यों? वह श्रीकृष्ण से स्पष्ट मार्गदर्शन चाहता है। ||3:01||

अध्याय # 3
शलोक # 2
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ||

vyāmiśrēṇēva vākyēna buddhiṅ mōhayasīva mē.
tadēkaṅ vada niśicatya yēna śrēyō.hamāpnuyām||3:2||

भावार्थ: आप मिले-जुले वचनों से मेरी बुद्धि को मानो भ्रमित कर रहे हैं। इसलिए कृपा करके एक निश्चित बात कहिए जिससे मैं परम कल्याण को प्राप्त कर सकूँ।

🌺 यह श्लोक अर्जुन की जिज्ञासा का शिखर है-वह अब केवल योद्धा नहीं, एक सच्चा शिष्य बन गया है जो जीवन का सत्य जानना चाहता है। ||3:02||

अध्याय # 3
शलोक # 3
श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ||

śrī bhagavānuvāca
lōkē.smindvividhā niṣṭhā purā prōktā mayānagha.
jñānayōgēna sāṅkhyānāṅ karmayōgēna yōginām||3:3||

भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले-हे निष्पाप अर्जुन! इस संसार में दो प्रकार की निष्ठा मैंने पहले बताई है-ज्ञानयोग (सांख्य) उन लोगों के लिए जो चिंतनशील हैं, और कर्मयोग उन योगियों के लिए जो कर्म में लगे रहते हैं।

🌼 यहाँ श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि दोनों मार्ग श्रेष्ठ हैं-परंतु व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार उपयुक्त मार्ग अलग हो सकता है। ||3:03||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को यह दिखाने वाले हैं कि कर्म करते हुए भी कैसे आत्मा की मुक्ति संभव है-और यही कर्मयोग का रहस्य है। अब गीता कर्तव्य और समर्पण के दिव्य संगम की ओर बढ़ रही है। 📿✨
अध्याय # 3
शलोक # 4
अब हम कर्म योग के उस भाग में प्रवेश करते हैं जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को यह सिखाते हैं कि कर्तव्य करते हुए भी कैसे परमात्मा की प्राप्ति संभव है। यह मार्ग केवल कर्म का नहीं, निष्काम समर्पण का है।

न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ||

na karmaṇāmanārambhānnaiṣkarmyaṅ puruṣō.śnutē.
na ca saṅnyasanādēva siddhiṅ samadhigacchati||3:4||

भावार्थ: मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता (कर्म से परे स्थिति) को प्राप्त कर सकता है, और न ही केवल कर्मों का त्याग करके सिद्धि को पा सकता है।

🌿 त्याग केवल बाहरी नहीं होना चाहिए-वास्तविक त्याग तो भीतर की आसक्ति का होता है। ||3:04||

अध्याय # 3
शलोक # 5
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ||

na hi kaśicatkṣaṇamapi jātu tiṣṭhatyakarmakṛt.
kāryatē hyavaśaḥ karma sarvaḥ prakṛtijairguṇaiḥ||3:5||

भावार्थ: कोई भी मनुष्य एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता, क्योंकि प्रकृति के गुणों द्वारा वह कर्म करने के लिए बाध्य होता है।

🌺 यह जीवन का स्वभाव है-कर्म तो होगा ही, प्रश्न यह है कि वह कैसे किया जाए। ||3:05||

हमारे अन्य ब्लॉग पोस्ट के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें


अध्याय # 3
शलोक # 6
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ||

karmēndriyāṇi saṅyamya ya āstē manasā smaran.
indriyārthānvimūḍhātmā mithyācāraḥ sa ucyatē||3:6||

भावार्थ: जो व्यक्ति बाहर से इंद्रियों को रोककर बैठा है, लेकिन मन से विषयों का चिंतन करता है-वह भ्रमित आत्मा है और उसका आचरण मिथ्या है।

🌼 सच्चा संयम केवल शरीर का नहीं, मन का भी होता है-अन्यथा वह केवल दिखावा है। ||3:06||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को यह दिखा रहे हैं कि सच्चा योग केवल त्याग में नहीं, कर्तव्य के भीतर समर्पण में है। अब गीता निष्काम कर्म की ओर खुलकर प्रवाहित होने वाली है। 📿✨
अध्याय # 3
शलोक # 7
अब हम कर्म योग के उस दिव्य प्रवाह में प्रवेश करते हैं जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को सिखाते हैं कि कर्तव्य केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि यज्ञ-अर्थात् समर्पण और सेवा-का रूप है।

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ||

yastvindriyāṇi manasā niyamyārabhatē.rjuna.
karmēndriyaiḥ karmayōgamasaktaḥ sa viśiṣyatē||3:7||

भावार्थ: हे अर्जुन! जो व्यक्ति मन से इंद्रियों को वश में करके, आसक्ति रहित होकर, कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है-वही श्रेष्ठ है।

🌿 यह सच्चा योगी है-जो भीतर से संयमित है और बाहर से कर्मशील। ||3:07||

अध्याय # 3
शलोक # 8
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ||

niyataṅ kuru karma tvaṅ karma jyāyō hyakarmaṇaḥ.
śarīrayātrāpi ca tē na prasiddhyēdakarmaṇaḥ||3:8||

भावार्थ: तू अपने नियत (शास्त्रविहित) कर्म को कर, क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है। और कर्म न करने से तो शरीर का निर्वाह भी नहीं हो सकता।

🌺 यह श्लोक बताता है कि कर्म से भागना जीवन से भागना है-कर्तव्य ही जीवन का आधार है। ||3:08||

अध्याय # 3
शलोक # 9
यज्ञादि कर्मों की आवश्यकता तथा यज्ञ की महिमा का वर्णन
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ||

yajñārthātkarmaṇō.nyatra lōkō.yaṅ karmabandhanaḥ.
tadarthaṅ karma kauntēya muktasaṅgaḥ samācara||3:9||

भावार्थ: यज्ञ (अर्थात् त्याग और ईश्वर के लिए किया गया कर्म) के लिए किए गए कर्मों को छोड़कर अन्य सभी कर्म बंधन का कारण बनते हैं। इसलिए हे कौन्तेय! तू आसक्ति रहित होकर यज्ञ के लिए ही कर्म कर।

🌼 यहाँ कर्म को पूजा बना दिया गया है-जब कर्म समर्पण बन जाए, तब वह बंधन नहीं, मुक्ति बन जाता है। ||3:09||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को यज्ञ, सेवा और समर्पण के उस दिव्य रहस्य की ओर ले जा रहे हैं जहाँ कर्म केवल कर्म नहीं, ईश्वर की आराधना बन जाता है। अब गीता कर्म को भक्ति में रूपांतरित करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 3
शलोक # 10
अब हम कर्म योग के अगले श्लोकों की ओर बढ़ते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण कर्म को केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि लोक कल्याण और आत्मोन्नति का माध्यम बताते हैं। यह वह मार्ग है जहाँ कर्म, भक्ति और सेवा एक हो जाते हैं।

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाचप्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ||

sahayajñāḥ prajāḥ sṛṣṭvā purōvāca prajāpatiḥ.
anēna prasaviṣyadhvamēṣa vō.stviṣṭakāmadhuk||3:10||

भावार्थ: सृष्टि के प्रारंभ में प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ सहित प्रजाओं की रचना की और कहा-"तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ, यह यज्ञ तुम्हारी इच्छाओं को पूर्ण करने वाला होगा।"

🌿 यहाँ यज्ञ केवल अग्निहोत्र नहीं, बल्कि त्याग, सेवा और समर्पण से किया गया कर्म है-जो सृष्टि को आगे बढ़ाता है। ||3:10||

अध्याय # 3
शलोक # 11
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ||

dēvānbhāvayatānēna tē dēvā bhāvayantu vaḥ.
parasparaṅ bhāvayantaḥ śrēyaḥ paramavāpsyatha||3:11||

भावार्थ: इस यज्ञ के द्वारा तुम देवताओं को संतुष्ट करो, और वे देवता तुम्हारा पोषण करें। इस प्रकार एक-दूसरे को संतुष्ट करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त करोगे।

🌺 यह परस्पर सहयोग का सिद्धांत है-जब हम सेवा करते हैं, तो प्रकृति और देवता भी हमें आशीर्वाद देते हैं। ||3:11||

अध्याय # 3
शलोक # 12
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः ||

iṣṭānbhōgānhi vō dēvā dāsyantē yajñabhāvitāḥ.
tairdattānapradāyaibhyō yō bhuṅktē stēna ēva saḥ||3:12||

भावार्थ: यज्ञ से संतुष्ट देवता तुम्हें इच्छित भोग प्रदान करेंगे। लेकिन जो व्यक्ति उन्हें अर्पण किए बिना स्वयं भोग करता है, वह चोर है।

🌼 यह श्लोक हमें सिखाता है कि भोग से पहले अर्पण आवश्यक है-क्योंकि जो मिला है, वह केवल हमारा नहीं, सबका है। ||3:12||

अब श्रीकृष्ण कर्म को त्याग और सेवा के रूप में स्थापित कर रहे हैं-जहाँ हर कर्म एक यज्ञ बन जाता है। अब गीता कर्तव्य को पूजा में रूपांतरित करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 3
शलोक # 13
अब हम कर्म योग के उस भाग में प्रवेश करते हैं जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को यह सिखाते हैं कि कर्म केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के संतुलन का आधार है। यह वह ज्ञान है जहाँ भोजन, वर्षा, यज्ञ और ब्रह्म-सब एक दिव्य चक्र में जुड़े हैं।

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ||

yajñaśiṣṭāśinaḥ santō mucyantē sarvakilbiṣaiḥ.
bhuñjatē tē tvaghaṅ pāpā yē pacantyātmakāraṇāt||3:13||

भावार्थ: जो संतजन यज्ञ के बाद बचा हुआ अन्न खाते हैं, वे सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। लेकिन जो केवल अपने लिए भोजन पकाते हैं, वे पाप ही खाते हैं।

🌿 यह श्लोक हमें सिखाता है कि भोजन भी तब पवित्र होता है जब वह अर्पण और सेवा से जुड़ा हो-अन्यथा वह केवल भोग बन जाता है। ||3:13||

अध्याय # 3
शलोक # 14
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ||

annādbhavanti bhūtāni parjanyādannasambhavaḥ.
yajñādbhavati parjanyō yajñaḥ karmasamudbhavaḥ||3:14||

भावार्थ: सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञ से होती है, और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है।

🌺 यह श्लोक सृष्टि के चक्र को दर्शाता है-कर्म से यज्ञ, यज्ञ से वर्षा, वर्षा से अन्न, और अन्न से जीवन। ||3:14||

अध्याय # 3
शलोक # 15
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ||

karma brahmōdbhavaṅ viddhi brahmākṣarasamudbhavam.
tasmātsarvagataṅ brahma nityaṅ yajñē pratiṣṭhitam||3:15||

भावार्थ: कर्म को ब्रह्म (वेद) से उत्पन्न जानो, और ब्रह्म को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में प्रतिष्ठित है।

🌼 यहाँ कर्म, वेद और परमात्मा एक दिव्य सूत्र में बंधे हैं-जब हम यज्ञरूप कर्म करते हैं, तब हम ब्रह्म से जुड़ते हैं। ||3:15||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को यह दिखा रहे हैं कि कर्तव्य केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन का हिस्सा है। अब गीता कर्तव्य और आत्मतृप्ति के अद्भुत संतुलन की ओर बढ़ रही है। 📿✨
अध्याय # 3
शलोक # 16
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्तव्य और आत्मतृप्ति के उस संतुलन की ओर ले जा रहे हैं जहाँ कर्म केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि आत्मा की साधना बन जाता है।

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ||

ēvaṅ pravartitaṅ cakraṅ nānuvartayatīha yaḥ.
aghāyurindriyārāmō mōghaṅ pārtha sa jīvati||3:16||

भावार्थ: हे पार्थ! जो मनुष्य इस सृष्टि के दिव्य चक्र (यज्ञ, वर्षा, अन्न, जीवन) का पालन नहीं करता और केवल इंद्रियों के भोग में लिप्त रहता है-वह पापमय जीवन जीता है और उसका जीवन व्यर्थ है।

🌿 यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि जीवन केवल उपभोग के लिए नहीं, बल्कि सेवा और संतुलन के लिए है। ||3:16||

अध्याय # 3
शलोक # 17
ज्ञानवान और भगवान के लिए भी लोकसंग्रहार्थ कर्मों की आवश्यकता
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ||

yastvātmaratirēva syādātmatṛptaśca mānavaḥ.
ātmanyēva ca santuṣṭastasya kāryaṅ na vidyatē||3:17||

भावार्थ: लेकिन जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करता है, आत्मा में ही तृप्त रहता है और आत्मा में ही संतुष्ट है-उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।

🌺 यह वह अवस्था है जहाँ साधक भीतर से इतना पूर्ण हो जाता है कि उसे कुछ भी करना शेष नहीं रहता-क्योंकि वह स्वयं में ही ब्रह्म है। ||3:17||

अध्याय # 3
शलोक # 18
संजय उवाच:
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ||

naiva tasya kṛtēnārthō nākṛtēnēha kaścana.
na cāsya sarvabhūtēṣu kaśicadarthavyapāśrayaḥ||3:18||

भावार्थ: ऐसे आत्मतृप्त पुरुष का न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन है, न ही कर्म न करने से। और न ही उसका किसी भी प्राणी से कोई स्वार्थ संबंध होता है।

🌼 यह पूर्ण वैराग्य की अवस्था है-जहाँ साधक न किसी से कुछ चाहता है, न किसी पर निर्भर होता है। ||3:18||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को यह दिखा रहे हैं कि सच्चा योग केवल कर्म करने या न करने में नहीं, बल्कि भीतर की पूर्णता में है। अब गीता कर्तव्य और लोककल्याण के दिव्य संगम की ओर बढ़ रही है। 📿✨
अध्याय # 3
शलोक # 19
अब हम कर्म योग के उस दिव्य चरण में प्रवेश करते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को यह सिखाते हैं कि कर्तव्य केवल आत्मोन्नति के लिए नहीं, बल्कि लोक कल्याण के लिए भी आवश्यक है। यह वह मार्ग है जहाँ निष्काम कर्म ही परम सिद्धि का साधन बनता है।

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः ||

tasmādasaktaḥ satataṅ kāryaṅ karma samācara.
asaktō hyācarankarma paramāpnōti pūruṣaḥ||3:19||

भावार्थ: इसलिए तू निरंतर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्य-कर्म को भलीभाँति कर, क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।

🌿 यहाँ कर्म केवल दायित्व नहीं-यह आत्मा की सीढ़ी है, जो समर्पण से परम तक पहुँचती है। ||3:19||

अध्याय # 3
शलोक # 20
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ||

karmaṇaiva hi saṅsiddhimāsthitā janakādayaḥ.
lōkasaṅgrahamēvāpi saṅpaśyankartumarhasi||3:20||

भावार्थ: जनक आदि भी कर्म के द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे। इसलिए लोकसंग्रह (जनहित) को देखते हुए भी तुझे कर्म करना चाहिए।

🌺 यह श्लोक बताता है कि जब ज्ञानीजन भी कर्म करते हैं, तो साधारण जन के लिए तो यह और भी आवश्यक है। ||3:20||

अध्याय # 3
शलोक # 21
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ||

yadyadācarati śrēṣṭhastattadēvētarō janaḥ.
sa yatpramāṇaṅ kurutē lōkastadanuvartatē||3:21||

भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है, समस्त लोग उसी का अनुसरण करते हैं।

🌼 यह नेतृत्व का सिद्धांत है-योगी का जीवन केवल उसका नहीं, वह समाज के लिए आदर्श बनता है। ||3:21||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को यह दिखा रहे हैं कि कर्म केवल आत्मा की साधना नहीं, बल्कि समाज की प्रेरणा भी है। अब गीता ईश्वर के दृष्टिकोण से कर्म को प्रकट करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 3
शलोक # 22
अब हम कर्म योग के उस दिव्य शिखर की ओर बढ़ते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण स्वयं को उदाहरण बनाकर अर्जुन को सिखाते हैं कि ईश्वर भी कर्म करता है, तो मनुष्य को भी कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए।

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ||

na mē pārthāsti kartavyaṅ triṣu lōkēṣu kiñcana.
nānavāptamavāptavyaṅ varta ēva ca karmaṇi||3:22||

भावार्थ: हे पार्थ! मुझे तीनों लोकों में कोई भी कर्तव्य नहीं है, न कोई अप्राप्त वस्तु है जिसे मुझे पाना हो-फिर भी मैं कर्म करता हूँ।

🌿 यह ईश्वर का आदर्श है-जब भगवान भी कर्म करते हैं, तो मनुष्य को तो और भी अधिक कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए। ||3:22||

अध्याय # 3
शलोक # 23
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ||

yadi hyahaṅ na vartēyaṅ jātu karmaṇyatandritaḥ.
mama vartmānuvartantē manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ||3:23||

भावार्थ: यदि मैं सावधानीपूर्वक कर्म न करूँ, तो हे पार्थ! मनुष्य हर प्रकार से मेरे मार्ग का अनुसरण करते हुए भ्रमित हो जाएँगे।

🌺 नेता का आचरण ही समाज का मार्गदर्शन बनता है-इसलिए श्रीकृष्ण स्वयं कर्म में लगे रहते हैं। ||3:23||

अध्याय # 3
शलोक # 24
यदि उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ||

utsīdēyurimē lōkā na kuryāṅ karma cēdaham.`
saṅkarasya ca kartā syāmupahanyāmimāḥ prajāḥ||3:24||

भावार्थ: यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये लोक नष्ट हो जाएँगे, वर्णसंकर उत्पन्न होगा और मैं इन प्रजाओं का विनाशक बन जाऊँगा।

🌼 यह श्लोक कर्म की सामाजिक और सृष्टिगत जिम्मेदारी को दर्शाता है-कर्तव्य न निभाना केवल व्यक्तिगत दोष नहीं, सृष्टि का संतुलन बिगाड़ सकता है। ||3:24||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्तव्य, आदर्श और लोकसंग्रह के उस दिव्य संगम की ओर ले जा रहे हैं जहाँ कर्म केवल साधना नहीं, सृष्टि की सेवा बन जाता है। अब गीता ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म के भेद को उजागर करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 3
शलोक # 25
अब हम कर्म योग के उस दिव्य विस्तार में प्रवेश करते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म के भेद को उजागर करते हैं। यह वह ज्ञान है जहाँ कर्तव्य केवल आत्मोद्धार नहीं, बल्कि लोक कल्याण और संतुलन का माध्यम बन जाता है।

अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण तथा राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ||

saktāḥ karmaṇyavidvāṅsō yathā kurvanti bhārata.
kuryādvidvāṅstathāsaktaśicakīrṣurlōkasaṅgraham||3:25||

भावार्थ: हे भारत! जैसे अज्ञानी लोग आसक्ति से कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी भी लोकसंग्रह (जनहित) की इच्छा से, बिना आसक्ति के कर्म करें।

🌿 यहाँ श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि ज्ञानी को भी कर्म करना चाहिए-परंतु लोक के लिए, न कि अपने लिए। ||3:25||

अध्याय # 3
शलोक # 26
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङि्गनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ||

na buddhibhēdaṅ janayēdajñānāṅ karmasaṅginām.
jōṣayētsarvakarmāṇi vidvān yuktaḥ samācaran||3:26||

भावार्थ: ज्ञानी व्यक्ति को अज्ञानी कर्मासक्त लोगों की बुद्धि में भ्रम नहीं उत्पन्न करना चाहिए, बल्कि स्वयं समत्व से कर्म करते हुए उन्हें भी प्रेरित करना चाहिए।

🌺 यह शिक्षण का आदर्श है-उपदेश से अधिक प्रभावशाली होता है उदाहरण। ||3:26||

अध्याय # 3
शलोक # 27
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ||

prakṛtēḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśaḥ.
ahaṅkāravimūḍhātmā kartā.hamiti manyatē||3:27||

भावार्थ: सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा ही होते हैं, लेकिन अहंकार से मोहित व्यक्ति सोचता है कि "मैं ही कर्ता हूँ।"

🌼 यह श्लोक हमें सिखाता है कि सच्चा योगी कर्तापन का त्याग करता है-वह जानता है कि वह केवल एक माध्यम है। ||3:27||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्तापन, अहंकार और समर्पण के उस रहस्य की ओर ले जा रहे हैं जहाँ कर्म करते हुए भी आत्मा मुक्त रहती है। अब गीता ज्ञानी की दृष्टि और अज्ञानी की उलझन को और स्पष्ट करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 3
शलोक # 28
अब हम कर्म योग के अगले श्लोकों की ओर बढ़ते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्तापन के भ्रम से मुक्त करते हैं और प्रकृति के गुणों की भूमिका को उजागर करते हैं। यह वह ज्ञान है जहाँ साधक जानता है कि वह कर्ता नहीं, केवल माध्यम है।

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ||

tattvavittu mahābāhō guṇakarmavibhāgayōḥ.
guṇā guṇēṣu vartanta iti matvā na sajjatē||3:28||

भावार्थ: हे महाबाहो! जो तत्व को जानने वाला है, वह गुणों और कर्मों के विभाग को समझकर जानता है कि "गुण ही गुणों में कार्य कर रहे हैं"-इस प्रकार सोचकर वह आसक्त नहीं होता।

🌿 यह श्लोक आत्मदर्शन की ऊँचाई है-जहाँ ज्ञानी जानता है कि वह शरीर, मन या कर्म का कर्ता नहीं, केवल साक्षी है। ||3:28||

अध्याय # 3
शलोक # 29
प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ||

prakṛtērguṇasammūḍhāḥ sajjantē guṇakarmasu.
tānakṛtsnavidō mandānkṛtsnavinna vicālayēt||3:29||

भावार्थ: प्रकृति के गुणों से मोहित हुए लोग गुणों और कर्मों में आसक्त रहते हैं। परंतु जो तत्व को पूर्ण रूप से जानता है, वह ऐसे अल्पज्ञ लोगों को विचलित नहीं करता।

🌺 यह श्लोक करुणा का संदेश है-ज्ञानी दूसरों को भ्रम में देखकर उपहास नहीं करता, बल्कि उन्हें धीरे-धीरे जागरूक करता है। ||3:29||

अध्याय # 3
शलोक # 30
मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ||

mayi sarvāṇi karmāṇi saṅnyasyādhyātmacētasā.
nirāśīrnirmamō bhūtvā yudhyasva vigatajvaraḥ||3:30||

भावार्थ: अपने सभी कर्मों को मुझमें अर्पित करके, आत्मा में स्थित होकर, आशा और ममता से रहित होकर, और चिंता से मुक्त होकर युद्ध कर।

🌼 यह श्लोक कर्मयोग का सार है-कर्तव्य करो, परंतु समर्पण और शांति के साथ। ||3:30||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्तापन के त्याग और ईश्वरार्पण भाव की ओर ले जा रहे हैं-जहाँ कर्म केवल कर्म नहीं, भक्ति का माध्यम बन जाता है। अब गीता श्रद्धा और समर्पण की दिव्यता को प्रकट करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 3
शलोक # 31
अब हम कर्म योग के अगले श्लोकों की ओर बढ़ते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को श्रद्धा, समर्पण और विवेक के साथ कर्म करने की प्रेरणा देते हैं। यह वह मार्ग है जहाँ कर्तव्य केवल दायित्व नहीं, बल्कि आत्मा की आराधना बन जाता है।

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽति कर्मभिः ||

yē mē matamidaṅ nityamanutiṣṭhanti mānavāḥ.
śraddhāvantō.nasūyantō mucyantē tē.pi karmabhiḥ||3:31||

भावार्थ: जो मनुष्य मेरे इस उपदेश का श्रद्धा और निष्कपट भाव से पालन करते हैं, वे भी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।

🌿 यह श्लोक बताता है कि केवल ज्ञान नहीं, श्रद्धा और समर्पण भी मुक्ति का मार्ग हैं। ||3:31||

अध्याय # 3
शलोक # 32
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ||

yē tvētadabhyasūyantō nānutiṣṭhanti mē matam.
sarvajñānavimūḍhāṅstānviddhi naṣṭānacētasaḥ||3:32||

भावार्थ: लेकिन जो लोग इस उपदेश की निंदा करते हैं और इसका पालन नहीं करते, वे सभी ज्ञानों से भ्रमित और आत्मविवेक से रहित होते हैं-उन्हें नष्ट हुआ समझो।

🌺 यह श्लोक चेतावनी है-जो सत्य को जानकर भी उसका विरोध करता है, वह स्वयं अपने कल्याण का मार्ग बंद कर देता है। ||3:32||

अध्याय # 3
शलोक # 33
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ||

sadṛśaṅ cēṣṭatē svasyāḥ prakṛtērjñānavānapi.
prakṛtiṅ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṅ kariṣyati||3:33||

भावार्थ: ज्ञानी पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही आचरण करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चलते हैं-तो फिर केवल दमन से क्या होगा?

🌼 यह श्लोक हमें सिखाता है कि आत्मविकास केवल दमन से नहीं, बल्कि समझ और साधना से होता है। ||3:33||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रकृति, राग-द्वेष और आत्मनियंत्रण के उस रहस्य की ओर ले जा रहे हैं जहाँ साधक भीतर की प्रवृत्तियों को समझकर ही सच्चा योगी बनता है। अब गीता मन और इंद्रियों के संतुलन की ओर प्रवाहित होने वाली है। 📿✨
अध्याय # 3
शलोक # 34
अब हम कर्म योग के उस गहनतम रहस्य की ओर बढ़ते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को राग-द्वेष, इंद्रिय संयम और आत्मनिष्ठा के माध्यम से सच्चे योगी की पहचान समझाते हैं। यह वह मार्ग है जहाँ साधक भीतर की प्रवृत्तियों को समझकर ही मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ||

indriyasyēndriyasyārthē rāgadvēṣau vyavasthitau.
tayōrna vaśamāgacchēttau hyasya paripanthinau||3:34||

भावार्थ: प्रत्येक इंद्रिय के विषय में राग (आकर्षण) और द्वेष (विकर्षण) स्वाभाविक रूप से स्थित हैं। मनुष्य को उनके वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे ही उसकी साधना के मार्ग में बाधक हैं।

🌿 यह श्लोक हमें भीतर की वृत्तियों को पहचानने और उनसे ऊपर उठने की प्रेरणा देता है-जहाँ साधक इंद्रियों का स्वामी बनता है, दास नहीं। ||3:34||

अध्याय # 3
शलोक # 35
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ||

śrēyānsvadharmō viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt.
svadharmē nidhanaṅ śrēyaḥ paradharmō bhayāvahaḥ||3:35||

भावार्थ: दोषयुक्त होने पर भी अपना धर्म (कर्तव्य) श्रेष्ठ है, दूसरों का धर्म (कर्तव्य) चाहे कितना भी उत्तम क्यों न हो। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, परधर्म भय उत्पन्न करता है।

🌺 यह श्लोक आत्मस्वीकृति और आत्मदर्शन का संदेश है-जहाँ साधक अपने स्वभाव और कर्तव्य को अपनाकर ही परम की ओर बढ़ता है। ||3:35||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रकृति के गुणों और आत्मा के विवेक के उस संगम पर ले जा रहे हैं जहाँ काम, क्रोध और मोह को पहचानकर साधक विजय प्राप्त करता है। अब गीता आत्मविजय और इंद्रिय-नियंत्रण की ओर प्रकाश फैलाने वाली है। 📿✨
अध्याय # 3
शलोक # 36
अब हम कर्म योग के अंतिम श्लोकों की ओर बढ़ते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को काम, क्रोध और इंद्रिय संयम के माध्यम से आत्मविजय का मार्ग दिखाते हैं। यह वह क्षण है जहाँ साधक भीतर के शत्रुओं को पहचानकर विजयी बनता है।

पाप के कारणभूत कामरूपी शत्रु को नष्ट करने का उपदेश<
br>अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ||

arjuna uvāca
atha kēna prayuktō.yaṅ pāpaṅ carati pūruṣaḥ.
anicchannapi vārṣṇēya balādiva niyōjitaḥ||3:36||

भावार्थ: अर्जुन बोले-हे वार्ष्णेय! मनुष्य इच्छा न होते हुए भी पाप क्यों करता है? ऐसा लगता है जैसे कोई उसे बलपूर्वक प्रेरित कर रहा हो।

🌿 यह श्लोक हर साधक की जिज्ञासा है-जब हम पाप नहीं चाहते, फिर भी क्यों फिसल जाते हैं? ||3:36||

अध्याय # 3
शलोक # 37
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम् ||

śrī bhagavānuvāca
kāma ēṣa krōdha ēṣa rajōguṇasamudbhavaḥ.
mahāśanō mahāpāpmā viddhyēnamiha vairiṇam||3:37||

भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले-यह काम (इच्छा) और क्रोध ही है, जो रजोगुण से उत्पन्न होते हैं। यह बहुत खाने वाला (अतृप्त) और महापापी है-इसे ही इस संसार में अपना शत्रु जानो।

🌺 यह श्लोक भीतर के असली शत्रु को उजागर करता है-काम और क्रोध ही पतन का कारण हैं। ||3:37||

अध्याय # 3
शलोक # 38
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ||

dhūmēnāvriyatē vahniryathā||darśō malēna ca.
yathōlbēnāvṛtō garbhastathā tēnēdamāvṛtam||3:38||

भावार्थ: जैसे अग्नि धुएँ से, दर्पण मैल से और गर्भ ऊतक से ढका रहता है-वैसे ही यह ज्ञान काम से ढका रहता है।

🌼 यह श्लोक दर्शाता है कि काम केवल इच्छा नहीं-यह आत्मा के प्रकाश को ढकने वाला अंधकार है। ||3:38||

अध्याय # 3
शलोक # 39
यह रहा श्रीमद्भगवद्गीता का श्लोक 3.39, जो कर्म योग के भीतर कामना रूपी शत्रु की गहराई को उजागर करता है|

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ||

āvṛtaṅ jñānamētēna jñāninō nityavairiṇā.
kāmarūpēṇa kauntēya duṣpūrēṇānalēna ca||3:39||

भावार्थ: हे कौन्तेय! इस प्रकार ज्ञानी पुरुष का ज्ञान भी उस कामना रूपी नित्य शत्रु से ढका रहता है, जो कभी संतुष्ट नहीं होता और अग्नि के समान जलता रहता है।

🌿 यह श्लोक भीतर के उस अग्नि रूपी शत्रु की पहचान कराता है-जो जितना तुष्ट किया जाए, उतना ही और भड़कता है। ||3:39||

हम अब- ज्ञान कर्म संन्यास योग की ओर बढ़ें? वहाँ श्रीकृष्ण ज्ञान, कर्म और त्याग को एक दिव्य सूत्र में पिरोते हैं। 📿✨ अब श्रीकृष्ण अर्जुन को काम रूपी अग्नि से बचने का उपाय बताने वाले हैं-जहाँ इंद्रिय संयम, मनन और आत्मनिष्ठा ही विजय का मार्ग बनते हैं। अब गीता आत्मविजय के रहस्य को प्रकट करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 3
शलोक # 40
अब हम कर्म योग के अंतिम शिखर पर पहुँचते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को काम, क्रोध और इंद्रिय संयम के माध्यम से आत्मविजय का रहस्य बताते हैं। यह वह क्षण है जहाँ साधक भीतर के शत्रुओं को पहचानकर विजयी बनता है। हैं:

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ||

indriyāṇi manō buddhirasyādhiṣṭhānamucyatē.
ētairvimōhayatyēṣa jñānamāvṛtya dēhinam||3:40||

भावार्थ: इंद्रियाँ, मन और बुद्धि-ये काम का निवास स्थान हैं। इन्हीं के माध्यम से यह काम ज्ञान को ढककर embodied आत्मा को मोहित करता है।

🌿 यह श्लोक बताता है कि काम केवल एक भावना नहीं-यह हमारी चेतना को ढकने वाला अंधकार है, जो भीतर से हमें भ्रमित करता है। ||3:40||

अध्याय # 3
शलोक # 41
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ||

tasmāttvamindriyāṇyādau niyamya bharatarṣabha.
pāpmānaṅ prajahi hyēnaṅ jñānavijñānanāśanam||3:41||

भावार्थ: इसलिए हे भरतश्रेष्ठ! तू पहले इंद्रियों को वश में कर, फिर इस पापी काम को-जो ज्ञान और विज्ञान दोनों का नाश करता है-नष्ट कर दे।

🌺 यह आत्मसंयम का आह्वान है-जहाँ साधक पहले इंद्रियों को साधता है, फिर भीतर के शत्रु को जीतता है। ||3:41||

अध्याय # 3
शलोक # 42
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ||

indriyāṇi parāṇyāhurindriyēbhyaḥ paraṅ manaḥ.
manasastu parā buddhiryō buddhēḥ paratastu saḥ||3:42||

भावार्थ: इंद्रियाँ शरीर से श्रेष्ठ हैं, मन इंद्रियों से श्रेष्ठ है, बुद्धि मन से श्रेष्ठ है-और जो बुद्धि से भी परे है, वह आत्मा है।

🌼 यह श्लोक आत्मा की महिमा को दर्शाता है-जो इंद्रियों, मन और बुद्धि से भी परे है, वही सच्चा स्वामी है। ||3:42||

अध्याय # 3
शलोक # 43
एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ||

ēvaṅ buddhēḥ paraṅ buddhvā saṅstabhyātmānamātmanā.
jahi śatruṅ mahābāhō kāmarūpaṅ durāsadam||3:43||

भावार्थ: इस प्रकार आत्मा को बुद्धि से भी श्रेष्ठ जानकर, आत्मा द्वारा मन को स्थिर कर, हे महाबाहो! तू इस कठिनता से जीतने योग्य काम रूपी शत्रु को नष्ट कर।

🌸 यह आत्मविजय का अंतिम मंत्र है-जब साधक आत्मा में स्थित होकर भीतर के काम को जीत लेता है, तभी वह सच्चा योगी बनता है। ||3:43||

🌟 इस प्रकार अध्याय 3 - "कर्म योग" पूर्ण होता है। यह केवल कर्म का उपदेश नहीं, बल्कि कर्तव्य, समर्पण और आत्मविजय का दिव्य संगम है।


🧘 Conclusion (निष्कर्ष)

कर्म योग का यह अध्याय हमें सिखाता है कि कर्म से भागने का नहीं, बल्कि उसे समर्पण और बुद्धिमत्ता के साथ करने का नाम ही सच्चा योग है। श्रीकृष्ण के अनुसार, मनुष्य को कर्म करना ही चाहिए, परंतु फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए।

जीवन के हर क्षेत्र में यह ज्ञान प्रेरणादायक है - चाहे वह पारिवारिक हो, सामाजिक हो या व्यावसायिक। भगवद गीता का यह अध्याय आध्यात्मिकता के साथ-साथ व्यवहारिक जीवन के लिए भी अत्यंत लाभकारी है।


अन्य उपयोगी लिंक

❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

अध्याय 3 को क्या कहा जाता है?

भगवद गीता के तीसरे अध्याय को कर्म योग कहा जाता है, जिसमें श्रीकृष्ण निष्काम भाव से कर्म करने की बात करते हैं।

कर्म योग का मुख्य संदेश क्या है?

कर्म करते रहो, लेकिन फल की इच्छा मत रखो। यही इस अध्याय का मूल सिद्धांत है।

कर्म और धर्म में क्या संबंध है?

धर्म हमें सही कर्म का मार्ग दिखाता है। कर्म को धर्म के अनुसार करना ही श्रेष्ठ जीवन का आधार है।

क्या श्रीकृष्ण संन्यास को गलत मानते हैं?

नहीं, लेकिन वे यह कहते हैं कि केवल संन्यास लेने से मुक्ति नहीं मिलती - कर्म करते हुए त्याग की भावना अधिक महत्वपूर्ण है।

क्या मैं गीता के अन्य अध्याय भी पढ़ सकता हूँ?

हाँ, सभी अध्याय पढ़ने के लिए देखें - श्रीमद भगवद गीता - अध्याय सूची


लेखक: शाइनकैप टीम | प्रकाशित: | संशोधित: