शाइनकैप का लोगो
दाहिनी ओर रथ पर सवार होकर अर्जुन को सलाह देते हुए भगवान कृष्ण का चित्रण और बायीं ओर 'भगवद गीता | अध्याय 11 | विश्वरूप दर्शन योग श्लोक अर्थ सहित' लिखा हुआ है।

भगवद गीता - अध्याय 11
विश्वरूप दर्शन योग - श्लोक और अर्थ सहित

🧡 Introduction (परिचय)

भगवद गीता के ग्यारहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाते हैं। यह रूप इतना दिव्य और भव्य होता है कि अर्जुन की आँखें चकाचौंध हो जाती हैं।

इस अध्याय को विश्वरूप दर्शन योग कहा जाता है, जिसमें भगवान कहते हैं कि उन्होंने समस्त ब्रह्मांड को अपने ही शरीर में समाहित कर रखा है। यह अध्याय भक्तों के लिए भगवान की सर्वव्यापकता और अद्वितीयता का अनुभव कराने वाला है।

यदि आपने अध्याय 10 - विभूति योग नहीं पढ़ा है, तो पहले वह जरूर पढ़ें, क्योंकि उसी में भगवान अपनी शक्तियों की भूमिका बताते हैं जो इस अध्याय में पूर्ण रूप में प्रकट होती है।


श्लोक और हिंदी अर्थ

👇 नीचे अध्याय 11 के सभी श्लोक अर्थ सहित जोड़े जाएंगे:

अध्याय 11 - विश्वरूप दर्शन योग में-जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाते हैं, जो समय, शक्ति और ब्रह्म की एक साथ झलक है। यह अर्जुन श्रीकृष्ण से ईश्वर के विराट रूप के दर्शन की प्रार्थना करते हैं, और श्रीकृष्ण दिव्य चक्षु प्रदान कर उन्हें विश्वरूप का दर्शन कराते हैं। यह वह क्षण है जहाँ भक्ति, विस्मय और दिव्यता एक साथ प्रकट होते हैं।


अध्याय # 11
शलोक # 1
विश्वरूप के दर्शन हेतु अर्जुन की प्रार्थना

अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ||

arjuna uvāca
madanugrahāya paramaṅ guhyamadhyātmasaṅjñitam.
yattvayōktaṅ vacastēna mōhō.yaṅ vigatō mama||11:1||

भावार्थ: अर्जुन बोले-हे प्रभु! आपने मुझ पर कृपा करके जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक उपदेश दिया, उससे मेरा मोह नष्ट हो गया है।

🌿 यह अर्जुन की कृतज्ञता है-ज्ञान से अज्ञान का अंधकार मिट गया। ||11:01||

अध्याय # 11
शलोक # 2
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वतः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ||

bhavāpyayau hi bhūtānāṅ śrutau vistaraśō mayā.
tvattaḥ kamalapatrākṣa māhātmyamapi cāvyayam||11:2||

भावार्थ: हे कमलनयन! मैंने आपसे भूतों की उत्पत्ति और प्रलय तथा आपकी अविनाशी महिमा को विस्तार से सुना है।

🌺 यह दर्शाता है कि अर्जुन अब ईश्वर की व्यापकता को समझने लगा है। ||11:02||
अध्याय # 11
शलोक # 3
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ||

ēvamētadyathāttha tvamātmānaṅ paramēśvara.
draṣṭumicchāmi tē rūpamaiśvaraṅ puruṣōttama||11:3||

भावार्थ: हे परमेश्वर! आप जैसे अपने को कहते हैं, वह सत्य है-परंतु हे पुरुषोत्तम! मैं आपके ऐश्वर्ययुक्त दिव्य रूप को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।

🌼 यह भक्ति की उत्कंठा है-जहाँ ज्ञान अब दर्शन की ओर बढ़ता है। ||11:03||
अध्याय # 11
शलोक # 4
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ||

manyasē yadi tacchakyaṅ mayā draṣṭumiti prabhō.
yōgēśvara tatō mē tvaṅ darśayā.tmānamavyayam||11:4||

भावार्थ: हे प्रभो! यदि आप मानते हैं कि मैं आपके उस रूप को देखने योग्य हूँ, तो हे योगेश्वर! कृपा करके मुझे अपना अविनाशी स्वरूप दिखाइए।

🌸 यह विनम्रता और श्रद्धा का सुंदर संगम है। ||11:04||
अध्याय # 11
शलोक # 5
भगवान द्वारा अपने विश्व रूप का वर्णन

श्रीभगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ||

śrī bhagavānuvāca
paśya mē pārtha rūpāṇi śataśō.tha sahasraśaḥ.
nānāvidhāni divyāni nānāvarṇākṛtīni ca||11:5||

भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले-हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों दिव्य रूपों को देख, जो विविध रंगों और आकारों से युक्त हैं।

🌟 यह विश्वरूप के दर्शन की भूमिका है-जहाँ अनंतता प्रकट होने वाली है। ||11:05||

हमारे अन्य ब्लॉग पोस्ट के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें


अध्याय # 11
शलोक # 6
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ||

paśyādityānvasūnrudrānaśivanau marutastathā.
bahūnyadṛṣṭapūrvāṇi paśyā.ścaryāṇi bhārata||11:6||

भावार्थ: हे भारतवंशी अर्जुन! तू मुझमें आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार, मरुतगण और अद्भुत रूपों को देख-जो तूने पहले कभी नहीं देखे।

🌿 ईश्वर के विराट रूप में सभी देवता और शक्तियाँ समाहित हैं-यह दर्शन अद्वितीय है। ||11:06||
अध्याय # 11
शलोक # 7
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टमिच्छसि ||

ihaikasthaṅ jagatkṛtsnaṅ paśyādya sacarācaram.
mama dēhē guḍākēśa yaccānyaddraṣṭumicchasi||11:7||

भावार्थ: हे गुडाकेश! अब इस मेरे शरीर में ही सम्पूर्ण चराचर जगत को एक साथ देख-और जो कुछ तू देखना चाहता है, वह भी।

🌺 यह दर्शाता है कि ईश्वर के रूप में समस्त सृष्टि एक ही स्थान पर प्रकट हो सकती है। ||11:07||
अध्याय # 11
शलोक # 8
न तु मां शक्यसे द्रष्टमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ||

na tu māṅ śakyasē draṣṭumanēnaiva svacakṣuṣā.
divyaṅ dadāmi tē cakṣuḥ paśya mē yōgamaiśvaram||11:8||

भावार्थ: तू मुझे इन साधारण नेत्रों से नहीं देख सकता, इसलिए मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ-अब मेरी योगमाया की महिमा को देख।

🌼 ईश्वर को देखने के लिए केवल आँखें नहीं, कृपा और भक्ति से मिला दृष्टिकोण चाहिए। ||11:08||
अध्याय # 11
शलोक # 9
संजय द्वारा धृतराष्ट्र के प्रति विश्वरूप का वर्णन

संजय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ||

sañjaya uvāca
ēvamuktvā tatō rājanmahāyōgēśvarō hariḥ.
darśayāmāsa pārthāya paramaṅ rūpamaiśvaram||11:9||

भावार्थ: संजय बोले-हे राजन्! महायोगेश्वर श्रीकृष्ण ने ऐसा कहकर अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्य रूप दिखाया।

🌸 यह वह क्षण है जहाँ ईश्वर स्वयं को प्रकट करते हैं-भक्त की जिज्ञासा के उत्तर में। ||11:09||
अध्याय # 11
शलोक # 10
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ||

anēkavaktranayanamanēkādbhutadarśanam.
anēkadivyābharaṇaṅ divyānēkōdyatāyudham||11:10||
अध्याय # 11
शलोक # 11
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ||

divyamālyāmbaradharaṅ divyagandhānulēpanam.
sarvāścaryamayaṅ dēvamanantaṅ viśvatōmukham||11:11||

भावार्थ: अर्जुन ने उस रूप को देखा जो अनेक मुखों और नेत्रों, दिव्य आभूषणों, दिव्य शस्त्रों, दिव्य वस्त्रों और गंधों से युक्त था-वह सभी दिशाओं में मुख किए हुए, सीमाहीन और आश्चर्य से भरा परम देव था।

🌟 यह विश्वरूप की भव्यता और चमत्कारिकता की झलक देता है-जहाँ शब्द भी मौन हो जाते हैं। ||11.10-11||
अध्याय # 11
शलोक # 12
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ||

divi sūryasahasrasya bhavēdyugapadutthitā.
yadi bhāḥ sadṛśī sā syādbhāsastasya mahātmanaḥ||11:12||

भावार्थ: यदि हजार सूर्यों का प्रकाश एक साथ आकाश में प्रकट हो जाए, तो भी वह उस परमात्मा के तेज के समान नहीं हो सकता।

🌿 यह बताता है कि ईश्वर का तेज इंद्रियों से परे है-वह केवल अनुभव किया जा सकता है। ||11.12||
अध्याय # 11
शलोक # 13
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ||

tatraikasthaṅ jagatkṛtsnaṅ pravibhaktamanēkadhā.
apaśyaddēvadēvasya śarīrē pāṇḍavastadā||11:13||

भावार्थ: उस समय अर्जुन ने देवों के देव श्रीकृष्ण के शरीर में सम्पूर्ण जगत को विभिन्न रूपों में एक साथ स्थित देखा।

🌺 यह अद्वैत की अनुभूति है-जहाँ अनेकता में भी एकता का अनुभव होता है। ||11.13||
अध्याय # 11
शलोक # 14
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ||

tataḥ sa vismayāviṣṭō hṛṣṭarōmā dhanañjayaḥ.
praṇamya śirasā dēvaṅ kṛtāñjalirabhāṣata||11:14||

भावार्थ: इसके बाद अर्जुन आश्चर्य से अभिभूत और पुलकित होकर, श्रद्धा से सिर झुकाकर हाथ जोड़कर बोले।

🌼 यह दर्शाता है कि जब भक्त ईश्वर को प्रत्यक्ष देखता है, तो उसका हृदय कृतज्ञता से भर उठता है। ||11.14||
अध्याय # 11
शलोक # 15
अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति करना

अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ||

arjuna uvāca
paśyāmi dēvāṅstava dēva dēhē
sarvāṅstathā bhūtaviśēṣasaṅghān.
brahmāṇamīśaṅ kamalāsanastha-
mṛṣīṅśca sarvānuragāṅśca divyān||11:15||

भावार्थ: अर्जुन बोले-हे देव! मैं आपके शरीर में सभी देवताओं, भूतों के समुदायों, कमल पर विराजमान ब्रह्मा, महादेव, सभी ऋषियों और दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ।

🌸 यह बताता है कि ईश्वर के विराट रूप में सम्पूर्ण सृष्टि समाहित है-देव, ऋषि, तत्व और समय। ||11.15||
अध्याय # 11
शलोक # 16
अब अर्जुन उस विराट रूप की महिमा का वर्णन करते हुए भक्ति, विस्मय और भय से भर उठते हैं-और गीता समयस्वरूप ईश्वर की ओर प्रवाहित होने वाली है। 📿✨

अध्याय 11 - विश्वरूप दर्शन योग के श्लोक 16 से 25 तक की उस विस्मयकारी अनुभूति की ओर बढ़ते हैं, जहाँ अर्जुन श्रीकृष्ण के विराट रूप को देखकर भक्ति, भय और विस्मय से भर उठते हैं। यह वह क्षण है जहाँ ईश्वर की अनंतता और समयस्वरूप का साक्षात्कार होता है।

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रंपश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिंपश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ||

anēkabāhūdaravaktranētraṅ
paśyāmi tvāṅ sarvatō.nantarūpam.
nāntaṅ na madhyaṅ na punastavādiṅ
paśyāmi viśvēśvara viśvarūpa||11:16||

भावार्थ: हे विश्वेश्वर! मैं आपको असंख्य भुजाओं, पेटों, मुखों और नेत्रों से युक्त, सभी दिशाओं में फैले हुए अनंत रूपों में देख रहा हूँ। आपका न आदि दिखता है, न मध्य, न अंत।

🌿 यह ईश्वर की अनंतता और अपरिमेयता का साक्षात्कार है। ||11.16||
अध्याय # 11
शलोक # 17
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ||

kirīṭinaṅ gadinaṅ cakriṇaṅ ca
tējōrāśiṅ sarvatōdīptimantam.
paśyāmi tvāṅ durnirīkṣyaṅ samantā-
ddīptānalārkadyutimapramēyam||11:17||

भावार्थ: मैं आपको मुकुट, गदा और चक्र से युक्त, चारों ओर से तेज से प्रकाशित, अग्नि और सूर्य के समान प्रज्वलित और अप्रमेय स्वरूप में देख रहा हूँ-जिसे देख पाना अत्यंत कठिन है।

🌺 यह ईश्वर के तेजस्वी और दिव्य स्वरूप की झलक है। ||11.17||
अध्याय # 11
शलोक # 18
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यंत्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ||

tvamakṣaraṅ paramaṅ vēditavyaṅ
tvamasya viśvasya paraṅ nidhānam.
tvamavyayaḥ śāśvatadharmagōptā
sanātanastvaṅ puruṣō matō mē||11:18||

भावार्थ: आप ही जानने योग्य परम अक्षर, इस जगत के परम आश्रय, शाश्वत धर्म के रक्षक और सनातन पुरुष हैं-ऐसा मेरा दृढ़ मत है।

🌼 यह ईश्वर की तत्त्वस्वरूप स्थिति को प्रकट करता है। ||11.18||
अध्याय # 11
शलोक # 19
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रंस्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ||

anādimadhyāntamanantavīrya-
manantabāhuṅ śaśisūryanētram.
paśyāmi tvāṅ dīptahutāśavaktram
svatējasā viśvamidaṅ tapantam||11:19||

भावार्थ: मैं आपको आदि, मध्य और अंत से रहित, अनंत शक्ति और भुजाओं से युक्त, चंद्र-सूर्य रूप नेत्रों वाले, अग्निरूप मुख वाले और अपने तेज से सम्पूर्ण जगत को संतप्त करते हुए देख रहा हूँ।

🌸 यह ईश्वर के समयस्वरूप और तेजस्वरूप की अनुभूति है। ||11.19||
अध्याय # 11
शलोक # 20
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदंलोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ||

dyāvāpṛthivyōridamantaraṅ hi
vyāptaṅ tvayaikēna diśaśca sarvāḥ.
dṛṣṭvā.dbhutaṅ rūpamugraṅ tavēdaṅ
lōkatrayaṅ pravyathitaṅ mahātman||11:20||

भावार्थ: हे महात्मन्! स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश और सभी दिशाएँ आपसे ही व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक व्याकुल हो उठे हैं।

🌟 यह दर्शाता है कि ईश्वर की विराटता से सम्पूर्ण सृष्टि कंपित हो उठती है। ||11.20||
अध्याय # 11
शलोक # 21
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ||

amī hi tvāṅ surasaṅghāḥ viśanti
kēcidbhītāḥ prāñjalayō gṛṇanti.
svastītyuktvā maharṣisiddhasaṅghāḥ
stuvanti tvāṅ stutibhiḥ puṣkalābhiḥ||11:21||

भावार्थ: देवताओं के समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं, कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़कर आपकी स्तुति कर रहे हैं, और महर्षि व सिद्धजन "कल्याण हो" कहकर श्रेष्ठ स्तोत्रों से आपकी वंदना कर रहे हैं।

🌿 यह भक्ति और भय के अद्वितीय संगम को दर्शाता है। ||11.21||
अध्याय # 11
शलोक # 22
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गंधर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घावीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ||

rudrādityā vasavō yē ca sādhyā
viśvē.śivanau marutaścōṣmapāśca.
gandharvayakṣāsurasiddhasaṅghā
vīkṣantē tvāṅ vismitāścaiva sarvē||11:22||

भावार्थ: रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुतगण, पितर, गंधर्व, यक्ष, असुर और सिद्धों के समूह-सभी आपको विस्मय से देख रहे हैं।

🌺 यह दर्शाता है कि ईश्वर के विराट रूप को देखकर देवता भी चकित हो जाते हैं। ||11.22||
अध्याय # 11
शलोक # 23
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रंमहाबाहो बहुबाहूरूपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालंदृष्टवा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ||

rūpaṅ mahattē bahuvaktranētraṅ
mahābāhō bahubāhūrupādam.
bahūdaraṅ bahudaṅṣṭrākarālaṅ
dṛṣṭvā lōkāḥ pravyathitāstathā.ham||11:23||

भावार्थ: हे महाबाहो! आपके इस विशाल रूप में अनेक मुख, नेत्र, भुजाएँ, जंघाएँ, चरण, पेट और विकराल दाँत हैं-इसे देखकर सभी लोक व्याकुल हो गए हैं, और मैं भी भयभीत हूँ।

🌼 यह दर्शाता है कि ईश्वर का विराट रूप केवल सुंदर नहीं-भयानक भी हो सकता है। ||11.23||
अध्याय # 11
शलोक # 24
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्टवा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ||

nabhaḥspṛśaṅ dīptamanēkavarṇaṅ
vyāttānanaṅ dīptaviśālanētram.
dṛṣṭvā hi tvāṅ pravyathitāntarātmā
dhṛtiṅ na vindāmi śamaṅ ca viṣṇō||11:24||

भावार्थ: हे विष्णु! आकाश को छूने वाला, दीप्तिमान, अनेकवर्णों वाला, विकराल मुख और प्रज्वलित विशाल नेत्रों वाला आपका रूप देखकर मेरा अंतःकरण व्याकुल हो गया है-मुझे न धैर्य मिल रहा है, न शांति।

🌸 यह अर्जुन की भावनात्मक स्थिति को दर्शाता है-भक्ति में भय भी समाहित है। ||11.24||
अध्याय # 11
शलोक # 25
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्टैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ||

daṅṣṭrākarālāni ca tē mukhāni
dṛṣṭvaiva kālānalasannibhāni.
diśō na jānē na labhē ca śarma
prasīda dēvēśa jagannivāsa||11:25||

भावार्थ: आपके विकराल दाँतों वाले मुख, जो कालाग्नि के समान प्रज्वलित हैं, उन्हें देखकर मैं दिशाओं को नहीं जान पा रहा और मुझे कोई शांति नहीं मिल रही-हे देवेश! हे जगन्निवास! कृपा कीजिए।

🌟 यह अर्जुन की करुण पुकार है-जहाँ भक्त भय में भी ईश्वर से शरण माँगता है। ||11.25||

अब अर्जुन ईश्वर से विनती करते हैं कि वे अपने सौम्य रूप में लौट आएँ, क्योंकि विराट रूप की भव्यता अब भय में बदलने लगी है। अब गीता समयस्वरूप ईश्वर और भक्त की विनम्रता को प्रकट करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 11
शलोक # 26
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ||

amī ca tvāṅ dhṛtarāṣṭrasya putrāḥ
sarvē sahaivāvanipālasaṅghaiḥ.
bhīṣmō drōṇaḥ sūtaputrastathā.sau
sahāsmadīyairapi yōdhamukhyaiḥ||11:26||
अध्याय # 11
शलोक # 27
अध्याय 11 - विश्वरूप दर्शन योग के श्लोक 26 से 35 - जहाँ अर्जुन श्रीकृष्ण के कालस्वरूप को देखकर भयभीत हो उठते हैं, और श्रीकृष्ण समय और संहार के रूप में अपने विराट कार्य को प्रकट करते हैं।

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गै ||

vaktrāṇi tē tvaramāṇā viśanti
daṅṣṭrākarālāni bhayānakāni.
kēcidvilagnā daśanāntarēṣu
saṅdṛśyantē cūrṇitairuttamāṅgaiḥ||11:27||

भावार्थ: हे प्रभु! मैं देख रहा हूँ कि धृतराष्ट्र के पुत्र, उनके साथ राजाओं की सेनाएँ, भीष्म, द्रोण, कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रमुख योद्धा-आपके विकराल दाँतों वाले मुखों में दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं, और कुछ के सिर आपके दाँतों के बीच चूर्ण हो रहे हैं।

🌿 यह दर्शाता है कि ईश्वर कालस्वरूप में सबका संहार करते हैं-चाहे वे कितने ही महान क्यों न हों। ||11.26-27||
अध्याय # 11
शलोक # 28
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीराविशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ||

yathā nadīnāṅ bahavō.mbuvēgāḥ
samudramēvābhimukhāḥ dravanti.
tathā tavāmī naralōkavīrā
viśanti vaktrāṇyabhivijvalanti||11:28||

भावार्थ: जैसे नदियों की धाराएँ स्वाभाविक रूप से समुद्र की ओर दौड़ती हैं, वैसे ही ये नरवीर आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

🌺 यह बताता है कि मृत्यु की ओर गति भी उतनी ही स्वाभाविक है जितनी जीवन की। ||11.28||
अध्याय # 11
शलोक # 29
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगाविशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ||

yathā pradīptaṅ jvalanaṅ pataṅgā
viśanti nāśāya samṛddhavēgāḥ.
tathaiva nāśāya viśanti lōkā-
stavāpi vaktrāṇi samṛddhavēgāḥ||11:29||

भावार्थ: जैसे पतंगे अग्नि में जलने के लिए वेग से प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये लोक भी आपके मुखों में नाश के लिए दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं।

🌼 यह दर्शाता है कि माया में फँसा जीव स्वयं ही अपने विनाश की ओर बढ़ता है। ||11.29||
अध्याय # 11
शलोक # 30
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रंभासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ||

lēlihyasē grasamānaḥ samantā-
llōkānsamagrānvadanairjvaladbhiḥ.
tējōbhirāpūrya jagatsamagraṅ
bhāsastavōgrāḥ pratapanti viṣṇō||11:30||

भावार्थ: हे विष्णु! आप अपने प्रज्वलित मुखों से चारों ओर से समस्त लोकों को निगल रहे हैं, और आपका तेज सम्पूर्ण जगत को भरकर उसे संतप्त कर रहा है।

🌸 यह ईश्वर के संहारकारी तेज की महिमा है-जो सृष्टि को भी भस्म कर सकता है। ||11.30||
अध्याय # 11
शलोक # 31
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यंन हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ||

ākhyāhi mē kō bhavānugrarūpō
namō.stu tē dēvavara prasīda.
vijñātumicchāmi bhavantamādyaṅ
na hi prajānāmi tava pravṛttim||11:31||

भावार्थ: हे देवश्रेष्ठ! आप कौन हैं, जो इतने उग्र रूप में प्रकट हुए हैं? मैं आपको नमस्कार करता हूँ-कृपा कीजिए! मैं आपके आदि स्वरूप को जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति नहीं समझ पा रहा हूँ।

🌟 यह अर्जुन की करुण पुकार है-जहाँ भय में भी भक्ति की गहराई प्रकट होती है। ||11.31||
अध्याय # 11
शलोक # 32
भगवान द्वारा अपने प्रभाव का वर्णन और अर्जुन को युद्ध के लिए उत्साहित करना

श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ||

śrī bhagavānuvāca
kālō.smi lōkakṣayakṛtpravṛddhō
lōkānsamāhartumiha pravṛttaḥ.
ṛtē.pi tvāṅ na bhaviṣyanti sarvē
yē.vasthitāḥ pratyanīkēṣu yōdhāḥ||11:32||

भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले-मैं काल हूँ, जो लोकों का संहार करने के लिए बढ़ा हुआ है। इन योद्धाओं का नाश करने के लिए ही मैं प्रवृत्त हुआ हूँ-तेरे बिना भी ये सब नष्ट हो जाएँगे।

🌿 यह गीता का कालवाक्य है-ईश्वर समय के रूप में सबका नियंता है। ||11.32||
अध्याय # 11
शलोक # 33
तस्मात्त्वमुक्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ||

tasmāttvamuttiṣṭha yaśō labhasva
jitvā śatrūn bhuṅkṣva rājyaṅ samṛddham.
mayaivaitē nihatāḥ pūrvamēva
nimittamātraṅ bhava savyasācin||11:33||

भावार्थ: इसलिए तू उठ, यश प्राप्त कर, शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य का भोग कर-ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं, हे सव्यसाचिन्! तू केवल निमित्त मात्र बन जा।

🌺 यह कर्मयोग का सार है-ईश्वर कर्ता हैं, हम केवल साधन। ||11.33||
अध्याय # 11
शलोक # 34
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठायुध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ||

drōṇaṅ ca bhīṣmaṅ ca jayadrathaṅ ca
karṇaṅ tathā.nyānapi yōdhavīrān.
mayā hatāṅstvaṅ jahi mā vyathiṣṭhā
yudhyasva jētāsi raṇē sapatnān||11:34||

भावार्थ: द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और अन्य वीर योद्धा मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं-तू उन्हें मार, शोक मत कर, युद्ध कर, और शत्रुओं को जीत ले।

🌼 यह प्रेरणा है-जब ईश्वर साथ हों, तो भय का कोई स्थान नहीं। ||11.34||
अध्याय # 11
शलोक # 35
भयभीत हुए अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति और चतुर्भुज रूप का दर्शन कराने के लिए प्रार्थना

संजय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृतांजलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णंसगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ||

sañjaya uvāca
ētacchrutvā vacanaṅ kēśavasya
kṛtāñjalirvēpamānaḥ kirīṭī.
namaskṛtvā bhūya ēvāha kṛṣṇaṅ
sagadgadaṅ bhītabhītaḥ praṇamya||11:35||

भावार्थ: संजय बोले-केशव के इन वचनों को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन काँपते हुए, हाथ जोड़कर, कृपा की याचना करते हुए, गद्गद वाणी से भयभीत होकर श्रीकृष्ण को फिर से प्रणाम करते हैं।

🌸 यह दर्शाता है कि जब भक्त ईश्वर की महिमा को समझता है, तो उसका अहंकार पूर्णतः गल जाता है। ||11.35||

अब अर्जुन ईश्वर से विनती करते हैं कि वे अपने सौम्य रूप में लौट आएँ, और श्रीकृष्ण *चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर अर्जुन को शांति प्रदान करते हैं। अब गीता भक्ति, क्षमा और ईश्वर की करुणा को प्रकट करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 11
शलोक # 36
अध्याय 11 - विश्वरूप दर्शन योग के श्लोक 36 से 45 - जहाँ अर्जुन ईश्वर की विराटता को देखकर भक्ति, भय और पश्चात्ताप से भर उठते हैं। वह श्रीकृष्ण से क्षमा याचना करते हैं और उनके सौम्य रूप की पुनः प्रार्थना करते हैं।

अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घा: ||

arjuna uvāca
sthānē hṛṣīkēśa tava prakīrtyā
jagat prahṛṣyatyanurajyatē ca.
rakṣāṅsi bhītāni diśō dravanti
sarvē namasyanti ca siddhasaṅghāḥ||11:36||

भावार्थ: अर्जुन बोले-हे हृषीकेश! यह उचित ही है कि आपके नाम और यश का श्रवण करके संसार हर्षित होता है, राक्षस भयभीत होकर भागते हैं, और सिद्धजन आपको नमस्कार करते हैं।

🌿 यह ईश्वर की महिमा के प्रभाव को दर्शाता है-जहाँ प्रेम, भय और श्रद्धा एक साथ प्रकट होते हैं। ||11.36||
अध्याय # 11
शलोक # 37
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ||

kasmācca tē na namēranmahātman
garīyasē brahmaṇō.pyādikartrē.
ananta dēvēśa jagannivāsa
tvamakṣaraṅ sadasattatparaṅ yat||11:37||

भावार्थ: हे महात्मन्! आपको कौन नमस्कार न करे, जब आप ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ, अनादि कारण, अनन्त, देवों के स्वामी और सद-असद से परे अक्षर ब्रह्म हैं?

🌺 यह ईश्वर की सर्वोच्चता की घोषणा है-जो सबका कारण हैं, पर स्वयं अकारण हैं। ||11.37||
अध्याय # 11
शलोक # 38
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ।

tvamādidēvaḥ puruṣaḥ purāṇa-
stvamasya viśvasya paraṅ nidhānam.
vēttāsi vēdyaṅ ca paraṅ ca dhāma
tvayā tataṅ viśvamanantarūpa||11:38||

भावार्थ: आप ही आदि देव, सनातन पुरुष, इस जगत के परम आश्रय, ज्ञाता और जानने योग्य, तथा परम धाम हैं। आपका अनंत रूप सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है।

🌼 यह ईश्वर को ज्ञान, सत्ता और धाम के रूप में स्वीकार करता है। ||11.38||
अध्याय # 11
शलोक # 39
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||

vāyuryamō.gnirvaruṇaḥ śaśāṅkaḥ
prajāpatistvaṅ prapitāmahaśca.
namō namastē.stu sahasrakṛtvaḥ
punaśca bhūyō.pi namō namastē||11:39||

भावार्थ: आप ही वायु, यम, अग्नि, वरुण, चंद्रमा, प्रजापति और ब्रह्मा के भी पूर्वज हैं। आपको बारंबार नमस्कार है, हजारों बार नमस्कार है, फिर भी बार-बार नमस्कार है।

🌸 यह भक्त की पूर्ण समर्पण भावना को दर्शाता है-जहाँ शब्द भी कम पड़ जाते हैं। ||11.39||
अध्याय # 11
शलोक # 40
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||

namaḥ purastādatha pṛṣṭhatastē
namō.stu tē sarvata ēva sarva.
anantavīryāmitavikramastvaṅ
sarvaṅ samāpnōṣi tatō.si sarvaḥ||11:40||

भावार्थ: आपको आगे से, पीछे से, और चारों ओर से नमस्कार है-हे अनंत शक्ति और अपार पराक्रम वाले! आप ही सब कुछ में व्याप्त हैं, इसलिए आप ही सब कुछ हैं।

🌟 यह अद्वैत की अनुभूति है-जहाँ भक्त को हर दिशा में केवल ईश्वर ही दिखाई देते हैं। ||11.40||
अध्याय # 11
शलोक # 41
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वापि ||

sakhēti matvā prasabhaṅ yaduktaṅ
hē kṛṣṇa hē yādava hē sakhēti.
ajānatā mahimānaṅ tavēdaṅ
mayā pramādātpraṇayēna vāpi||11:41||
अध्याय # 11
शलोक # 42
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षंतत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ||

yaccāvahāsārthamasatkṛtō.si
vihāraśayyāsanabhōjanēṣu.
ēkō.thavāpyacyuta tatsamakṣaṅ
tatkṣāmayē tvāmahamapramēyam||11:42||

भावार्थ: हे अच्युत! मैंने आपको मित्र समझकर, कभी-कभी प्रमाद या स्नेहवश, हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे कहकर जो कुछ भी अनुचित कहा या किया, चाहे एकांत में या दूसरों के सामने, विहार, शयन, भोजन आदि में-उस सबके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ।

🌿 यह भक्त के पश्चात्ताप और नम्रता की पराकाष्ठा है-जहाँ वह ईश्वर को मित्र मानकर की गई भूलों के लिए क्षमा माँगता है। ||11.41-42||
अध्याय # 11
शलोक # 43
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्योलोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ||

pitāsi lōkasya carācarasya
tvamasya pūjyaśca gururgarīyān.
na tvatsamō.styabhyadhikaḥ kutō.nyō
lōkatrayē.pyapratimaprabhāva||11:43||

भावार्थ: आप चराचर जगत के पिता, पूज्य, और सर्वश्रेष्ठ गुरु हैं। तीनों लोकों में आपके समान या श्रेष्ठ कोई नहीं है-आप अप्रतिम प्रभाव वाले हैं।

🌺 यह ईश्वर की सर्वोच्चता और भक्त की पूर्ण श्रद्धा को प्रकट करता है। ||11.43||
अध्याय # 11
शलोक # 44
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायंप्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्||

tasmātpraṇamya praṇidhāya kāyaṅ
prasādayē tvāmahamīśamīḍyam.
pitēva putrasya sakhēva sakhyuḥ
priyaḥ priyāyārhasi dēva sōḍhum||11:44||

भावार्थ: इसलिए मैं शरीर को झुकाकर आपको प्रणाम करता हूँ और आपसे कृपा की याचना करता हूँ। जैसे पिता अपने पुत्र को, मित्र अपने मित्र को, और प्रिय अपने प्रिय को क्षमा करता है-वैसे ही हे देव! आप भी मुझे क्षमा करें।

🌼 यह भक्त की करुण पुकार है-जहाँ वह ईश्वर से प्रेमपूर्वक क्षमा माँगता है। ||11.44||
अध्याय # 11
शलोक # 45
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देवरूपंप्रसीद देवेश जगन्निवास ||

adṛṣṭapūrvaṅ hṛṣitō.smi dṛṣṭvā
bhayēna ca pravyathitaṅ manō mē.
tadēva mē darśaya dēva rūpaṅ
prasīda dēvēśa jagannivāsa||11:45||

भावार्थ: मैं आपके इस पहले कभी न देखे गए रूप को देखकर हर्षित तो हूँ, परंतु मेरा मन भय से व्याकुल हो गया है। इसलिए हे देवेश! हे जगन्निवास! कृपा करके मुझे अपना वही सौम्य रूप दिखाइए।

🌸 यह दर्शाता है कि भक्त की आत्मा सौम्यता में विश्राम पाती है-विराटता में नहीं। ||11.45||

अब श्रीकृष्ण अपने चतुर्भुज और मानवीय रूप में प्रकट होकर अर्जुन को शांति और प्रेम का अनुभव कराते हैं-और गीता भक्ति की पूर्णता और सौम्यता की ओर प्रवाहित होने वाली है।
अध्याय # 11
शलोक # 46
अध्याय 11 - विश्वरूप दर्शन योग के अंतिम श्लोकों की ओर बढ़ते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण अपने सौम्य चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर अर्जुन को शांति और भक्ति का वरदान देते हैं। यह वह क्षण है जहाँ भय से भक्ति, और विराट से सखा की ओर वापसी होती है।

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेनसहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते||

kirīṭinaṅ gadinaṅ cakrahasta-
micchāmi tvāṅ draṣṭumahaṅ tathaiva.
tēnaiva rūpēṇa caturbhujēna
sahasrabāhō bhava viśvamūrtē||11:46||

भावार्थ: हे सहस्रबाहु! हे विश्वमूर्ति! मैं आपको उसी चतुर्भुज रूप में देखना चाहता हूँ, जिसमें मुकुट, गदा और चक्र हैं।

🌿 यह दर्शाता है कि भक्त का मन सौम्यता और स्नेह में विश्राम पाता है। ||11.46||
अध्याय # 11
शलोक # 47
भगवान द्वारा अपने विश्वरूप के दर्शन की महिमा का कथन तथा चतुर्भुज और सौम्य रूप का दिखाया जाना

श्रीभगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदंरूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यंयन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ||

śrī bhagavānuvāca
mayā prasannēna tavārjunēdaṅ
rūpaṅ paraṅ darśitamātmayōgāt.
tējōmayaṅ viśvamanantamādyaṅ
yanmē tvadanyēna na dṛṣṭapūrvam||11:47||

भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले-हे अर्जुन! मेरी कृपा से ही तूने यह तेजस्वी, अनंत, आदि और विश्वरूप देखा है, जिसे तुझसे पहले किसी ने नहीं देखा।

🌺 यह बताता है कि ईश्वर का विराट दर्शन केवल कृपा से संभव है। ||11.47||
अध्याय # 11
शलोक # 48
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः।
एवं रूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ||

na vēdayajñādhyayanairna dānai-
rna ca kriyābhirna tapōbhirugraiḥ.
ēvaṅrūpaḥ śakya ahaṅ nṛlōkē
draṣṭuṅ tvadanyēna kurupravīra||11:48||

भावार्थ: हे कुरुश्रेष्ठ! न वेदाध्ययन, न यज्ञ, न दान, न कठोर तप से यह रूप देखा जा सकता है-केवल तूने ही इसे देखा है।

🌼 यह दर्शाता है कि भक्ति और कृपा ही ईश्वर के दर्शन का मार्ग हैं। ||11.48||
अध्याय # 11
शलोक # 49
मा ते व्यथा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्।
व्यतेपभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वंतदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ||

mā tē vyathā mā ca vimūḍhabhāvō
dṛṣṭvā rūpaṅ ghōramīdṛṅmamēdam.
vyapētabhīḥ prītamanāḥ punastvaṅ
tadēva mē rūpamidaṅ prapaśya||11:49||

भावार्थ: इस भयंकर रूप को देखकर तू व्याकुल या भ्रमित न हो, भय को त्याग और प्रेमपूर्वक अब मेरा वही सौम्य रूप देख।

🌸 यह ईश्वर की करुणा है-जो भक्त को भय से मुक्त करते हैं। ||11.49||
अध्याय # 11
शलोक # 50
संजय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनंभूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ||

sañjaya uvāca
ityarjunaṅ vāsudēvastathōktvā
svakaṅ rūpaṅ darśayāmāsa bhūyaḥ.
āśvāsayāmāsa ca bhītamēnaṅ
bhūtvā punaḥ saumyavapurmahātmā||11:50||

भावार्थ: संजय बोले-वासुदेव ने ऐसा कहकर फिर से अपना सौम्य चतुर्भुज रूप दिखाया और भयभीत अर्जुन को सांत्वना दी।

🌟 यह दर्शाता है कि ईश्वर केवल विराट नहीं-वह सखा, गुरु और करुणामूर्ति भी हैं। ||11.50||
अध्याय # 11
शलोक # 51
बिना अनन्य भक्ति के चतुर्भुज रूप के दर्शन की दुर्लभता का और फलसहित अनन्य भक्ति का कथन

अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः||

arjuna uvāca
dṛṣṭvēdaṅ mānuṣaṅ rūpaṅ tavasaumyaṅ janārdana.
idānīmasmi saṅvṛttaḥ sacētāḥ prakṛtiṅ gataḥ||11:51||

भावार्थ: अर्जुन बोले-हे जनार्दन! आपका यह सौम्य मानवीय रूप देखकर अब मैं शांत और स्थिर चित्त हो गया हूँ।

🌿 यह बताता है कि भक्त का चित्त ईश्वर की सौम्यता में विश्राम पाता है। ||11.51||
अध्याय # 11
शलोक # 52
अर्जुन उवाच
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः||

śrī bhagavānuvāca
sudurdarśamidaṅ rūpaṅ dṛṣṭavānasi yanmama.
dēvā apyasya rūpasya nityaṅ darśanakāṅkṣiṇaḥ||11:52||

भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले-जो रूप तूने देखा है, वह अत्यंत दुर्लभ है। देवता भी इस रूप के दर्शन की इच्छा करते हैं।

🌺 यह दर्शाता है कि भक्त को जो कृपा मिलती है, वह देवताओं को भी दुर्लभ है। ||11.52||
अध्याय # 11
शलोक # 53
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।
शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्ट्वानसि मां यथा ||

nāhaṅ vēdairna tapasā na dānēna na cējyayā.
śakya ēvaṅvidhō draṣṭuṅ dṛṣṭavānasi māṅ yathā||11:53||

भावार्थ: न वेदों के अध्ययन से, न तप से, न दान से, न यज्ञ से-मुझे ऐसे रूप में देखा जा सकता है, जैसा तूने देखा है।

🌼 यह बताता है कि भक्ति ही वह साधन है जो सब साधनों से श्रेष्ठ है। ||11.53||
अध्याय # 11
शलोक # 54
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ||

bhaktyā tvananyayā śakyamahamēvaṅvidhō.rjuna.
jñātuṅ dṛṣṭuṅ ca tattvēna pravēṣṭuṅ ca paraṅtapa||11:54||

भावार्थ: हे अर्जुन! केवल अनन्य भक्ति से ही मैं इस रूप में जाना, देखा और प्राप्त किया जा सकता हूँ।

🌸 यह गीता का हृदय है-जहाँ भक्ति ही ब्रह्म का द्वार बन जाती है। ||11.54||
अध्याय # 11
शलोक # 55
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ||

matkarmakṛnmatparamō madbhaktaḥ saṅgavarjitaḥ.
nirvairaḥ sarvabhūtēṣu yaḥ sa māmēti pāṇḍava||11:55||

भावार्थ: हे पाण्डव! जो मेरे लिए कर्म करता है, मुझे ही परम मानता है, मुझमें भक्ति करता है, संग से रहित है, और सभी प्राणियों से द्वेषरहित है-वह मुझे प्राप्त करता है।

🌟 यह गीता का निष्कर्ष है-जहाँ कर्म, भक्ति, वैराग्य और करुणा मिलकर मोक्ष का द्वार खोलते हैं। ||11.55||

🌺 इस प्रकार अध्याय 11 - "विश्वरूप दर्शन योग" पूर्ण होता है। यह केवल दर्शन नहीं, भक्ति की पराकाष्ठा, ईश्वर की करुणा, और मानवता की विनम्रता का अद्वितीय संगम है।


🧘 Conclusion (निष्कर्ष)

विश्वरूप दर्शन योग यह सिद्ध करता है कि भगवान श्रीकृष्ण केवल एक साधारण मानव नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के आधार हैं। उन्होंने अर्जुन को यह रूप इसलिए दिखाया ताकि वह अपने कर्तव्य से विमुख न हो।

यह अध्याय न केवल अर्जुन को, बल्कि हर भक्त को यह स्मरण कराता है कि ईश्वर सर्वत्र हैं - समय, स्थान, जीवन और मृत्यु के पार। यह अनुभव मन को स्थिर और हृदय को नम्र बना देता है।


अन्य उपयोगी लिंक

❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

विश्वरूप क्या होता है?

विश्वरूप भगवान का वह दिव्य रूप है जिसमें पूरा ब्रह्मांड, काल, देवता, मानव, असुर आदि समाहित होते हैं। यह रूप भौतिक आँखों से नहीं, केवल दिव्य दृष्टि से देखा जा सकता है।

भगवान ने अर्जुन को यह रूप क्यों दिखाया?

भगवान ने अर्जुन को यह रूप इसलिए दिखाया ताकि वह समझ सके कि जो युद्ध हो रहा है वह केवल एक मनुष्य की इच्छा नहीं, बल्कि दिव्य योजना का हिस्सा है।

अर्जुन की क्या प्रतिक्रिया थी?

अर्जुन भयभीत, चकित और कृतज्ञ हो गए। उन्होंने भगवान से अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगी और उनकी शरण में आने का निर्णय लिया।

क्या कोई भी भगवान का यह रूप देख सकता है?

नहीं, यह रूप केवल दिव्य दृष्टि द्वारा देखा जा सकता है, जिसे स्वयं भगवान ही प्रदान करते हैं।

क्या यह अध्याय केवल भक्तों के लिए है?

यह अध्याय हर आत्मा के लिए है जो ईश्वर की महिमा को समझना चाहता है, लेकिन यह विशेष रूप से भक्ति मार्ग में आगे बढ़ने वालों के लिए अत्यंत प्रेरक है।


लेखक: शाइनकैप टीम | प्रकाशित: | संशोधित: