भगवद गीता - अध्याय 7
ज्ञान विज्ञान योग - श्लोक और अर्थ सहित
🧡 Introduction (परिचय)
श्रीमद भगवद गीता का सातवाँ अध्याय ज्ञान विज्ञान योग कहलाता है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञान (तत्व ज्ञान) और विज्ञान (उसका प्रत्यक्ष अनुभव) का रहस्य समझाते हैं। भगवान स्वयं को प्रकृति, जीव, और सम्पूर्ण ब्रह्मांड का आधार बताते हैं।
यह अध्याय स्पष्ट करता है कि केवल सच्ची भक्ति और समर्पण के द्वारा ही भगवान को पूरी तरह जाना जा सकता है। श्रीकृष्ण यह भी बताते हैं कि अधिकांश लोग माया के प्रभाव में फंसे रहते हैं और उन्हें परम सत्य तक पहुंचना कठिन लगता है।
यदि आपने अध्याय 6 - ध्यान योग नहीं पढ़ा है, तो पहले उसे जरूर पढ़ें। सभी अध्यायों की सूची के लिए श्रीमद भगवद गीता हिंदी में पेज देखें।
श्लोक और हिंदी भावार्थ
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अध्याय 7 - ज्ञान विज्ञान योग में-जहाँ श्रीकृष्ण अपने स्वरूप, माया, और भक्त की दुर्लभता का रहस्य प्रकट करते हैं। याहाँ श्रीकृष्ण अपने स्वरूप, माया और भक्ति की दुर्लभता का रहस्य प्रकट करते हैं। यह अध्याय ज्ञान (theoretical) और विज्ञान (experiential) दोनों का संगम है।
शलोक # 1
श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ||
śrī bhagavānuvāca
mayyāsaktamanāḥ pārtha yōgaṅ yuñjanmadāśrayaḥ.
asaṅśayaṅ samagraṅ māṅ yathā jñāsyasi tacchṛṇu||7:1||
भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले-हे पार्थ! मन को मुझमें आसक्त करके, योग में स्थित होकर और मेरी शरण में आकर, तू मुझे संपूर्ण रूप से और बिना संदेह के कैसे जान सकेगा-वह सुन।
🌿 यह श्लोक भक्ति और योग के माध्यम से ईश्वर को जानने की भूमिका है। ||7:01||
शलोक # 2
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ||
jñānaṅ tē.haṅ savijñānamidaṅ vakṣyāmyaśēṣataḥ.
yajjñātvā nēha bhūyō.nyajjñātavyamavaśiṣyatē||7:2||
भावार्थ: मैं तुझे यह ज्ञान और विज्ञान सहित तत्वज्ञान पूर्ण रूप से बताऊँगा, जिसे जानकर इस संसार में फिर कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाएगा।
🌺 यह श्लोक बताता है कि यह ज्ञान अंतिम और पूर्ण है-जो आत्मा को ब्रह्म से जोड़ता है। ||7:02||
शलोक # 3
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः ||
manuṣyāṇāṅ sahasrēṣu kaśicadyatati siddhayē.
yatatāmapi siddhānāṅ kaśicanmāṅ vētti tattvataḥ||7:3||
भावार्थ: हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए प्रयास करता है, और उन प्रयास करने वालों में भी कोई एक मुझे तत्त्व से जानता है।
🌼 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर को तत्त्व से जानना अत्यंत दुर्लभ है। ||7:03||
शलोक # 4
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ||
bhūmirāpō.nalō vāyuḥ khaṅ manō buddhirēva ca.
ahaṅkāra itīyaṅ mē bhinnā prakṛtiraṣṭadhā||7:4||
भावार्थ: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार-ये मेरी आठ प्रकार की भिन्न-भिन्न प्रकृति हैं।
🌸 यह श्लोक ईश्वर की भौतिक प्रकृति (अपरा प्रकृति) को प्रकट करता है। ||7:04||
शलोक # 5
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ||
aparēyamitastvanyāṅ prakṛtiṅ viddhi mē parām.
jīvabhūtāṅ mahābāhō yayēdaṅ dhāryatē jagat||7:5||
भावार्थ: हे महाबाहो! यह अपरा प्रकृति है, इससे भिन्न मेरी परा (चेतन) प्रकृति को जान, जो जीव रूप है और जिससे यह जगत धारण किया जाता है।
🌿 यह श्लोक चेतन और जड़ प्रकृति के भेद को स्पष्ट करता है। ||7:05||
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शलोक # 6
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ||
ētadyōnīni bhūtāni sarvāṇītyupadhāraya.
ahaṅ kṛtsnasya jagataḥ prabhavaḥ pralayastathā||7:6||
भावार्थ: इन दोनों प्रकृतियों से ही सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं। जान लो कि मैं ही सम्पूर्ण जगत का उद्गम और प्रलय हूँ।
🌺 यह श्लोक श्रीकृष्ण को सृष्टि के मूल कारण के रूप में स्थापित करता है। ||7:06||
शलोक # 7
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ||
mattaḥ parataraṅ nānyatkiñcidasti dhanañjaya.
mayi sarvamidaṅ prōtaṅ sūtrē maṇigaṇā iva||7:7||
भावार्थ: हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ कोई अन्य कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत मुझमें ही सूत्र में पिरोए हुए मोतियों की तरह स्थित है।
🌼 यह श्लोक अद्वैत की सुंदर उपमा है-ईश्वर ही सबका आधार है। ||7:07||
शलोक # 8
श्रीभगवानुवाच
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ||
rasō.hamapsu kauntēya prabhāsmi śaśisūryayōḥ.
praṇavaḥ sarvavēdēṣu śabdaḥ khē pauruṣaṅ nṛṣu||7:8||
भावार्थ: हे कौन्तेय! मैं जल में रस हूँ, चंद्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द हूँ और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ।
🌸 यह श्लोक ईश्वर की व्यापकता को दर्शाता है-वह हर तत्व में व्याप्त हैं। ||7:08||
शलोक # 9
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ||
puṇyō gandhaḥ pṛthivyāṅ ca tējaścāsmi vibhāvasau.
jīvanaṅ sarvabhūtēṣu tapaścāsmi tapasviṣu||7:9||
भावार्थ: मैं पृथ्वी में पवित्र गंध हूँ, अग्नि में तेज हूँ, सभी प्राणियों में जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ।
🌿 यह श्लोक बताता है कि ईश्वर हर गुण और तत्व में दिव्यता के रूप में प्रकट हैं। ||7:09||
शलोक # 10
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ||
bījaṅ māṅ sarvabhūtānāṅ viddhi pārtha sanātanam.
buddhirbuddhimatāmasmi tējastējasvināmaham||7:10||
भावार्थ: हे पार्थ! मुझे सभी प्राणियों का सनातन बीज जानो। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।
🌺 यह श्लोक ईश्वर को सृष्टि के मूल बीज और सभी गुणों के स्रोत के रूप में प्रकट करता है। ||7:10||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को गुणों की उत्पत्ति, माया की शक्ति, और भक्ति की दुर्लभता की ओर ले जा रहे हैं। अब गीता माया के पार जाने वाले भक्तों की महिमा प्रकट करने वाली है। 📿✨
शलोक # 11
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ||
balaṅ balavatāmasmi kāmarāgavivarjitam.
dharmāviruddhō bhūtēṣu kāmō.smi bharatarṣabha||7:11||
भावार्थ: हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का कामना और आसक्ति से रहित बल हूँ, और सभी प्राणियों में धर्म के अनुकूल कामना भी मैं ही हूँ।
🌿 यह श्लोक दर्शाता है कि जब शक्ति और इच्छा धर्म के अनुसार हों, तो वे भी ईश्वरमय हो जाती हैं। ||7:11||
शलोक # 12
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ||
yē caiva sāttvikā bhāvā rājasāstāmasāśca yē.
matta ēvēti tānviddhi natvahaṅ tēṣu tē mayi||7:12||
भावार्थ: जो भी भाव सत्त्व, रज और तम से उत्पन्न होते हैं, उन्हें मुझसे ही उत्पन्न जानो। परंतु वास्तव में मैं उनमें नहीं हूँ और वे मुझमें नहीं हैं।
🌺 यह श्लोक बताता है कि ईश्वर गुणों के कारण नहीं, बल्कि उनसे परे हैं। ||7:12||
शलोक # 13
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ||
tribhirguṇamayairbhāvairēbhiḥ sarvamidaṅ jagat.
mōhitaṅ nābhijānāti māmēbhyaḥ paramavyayam||7:13||
भावार्थ: यह सम्पूर्ण जगत इन तीनों गुणों से मोहित होकर मुझ अविनाशी परमात्मा को नहीं जानता।
🌼 यह श्लोक माया की शक्ति को दर्शाता है-जो सत्य को ढक देती है। ||7:13||
शलोक # 14
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ||
daivī hyēṣā guṇamayī mama māyā duratyayā.
māmēva yē prapadyantē māyāmētāṅ taranti tē||7:14||
भावार्थ: मेरी यह दैवी त्रिगुणमयी माया अत्यंत कठिन है, परंतु जो मुझमें पूर्ण रूप से शरणागत होते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।
🌸 यह श्लोक बताता है कि केवल भक्ति ही माया से पार ले जा सकती है। ||7:14||
शलोक # 15
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ||
na māṅ duṣkṛtinō mūḍhāḥ prapadyantē narādhamāḥ.
māyayāpahṛtajñānā āsuraṅ bhāvamāśritāḥ||7:15||
भावार्थ: जो पापी, मूढ़, अधम और आसुरी स्वभाव वाले होते हैं, जिनका ज्ञान माया ने हर लिया है-वे मेरी शरण नहीं लेते।
🌿 यह श्लोक चेतावनी है-माया का प्रभाव ज्ञान को ढक देता है और ईश्वर से दूर कर देता है। ||7:15||
शलोक # 16
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ||
caturvidhā bhajantē māṅ janāḥ sukṛtinō.rjuna.
ārtō jijñāsurarthārthī jñānī ca bharatarṣabha||7:16||
भावार्थ: हे अर्जुन! चार प्रकार के पुण्यात्मा लोग मेरी भक्ति करते हैं-आर्त (दुखी), जिज्ञासु (जिज्ञासु), अर्थार्थी (सांसारिक इच्छाओं वाले), और ज्ञानी (ब्रह्म को जानने वाले)।
🌺 यह श्लोक दर्शाता है कि भक्ति के मार्ग पर सभी का स्वागत है-चाहे कारण कोई भी हो। ||7:16||
शलोक # 17
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ||
tēṣāṅ jñānī nityayukta ēkabhakitarviśiṣyatē.
priyō hi jñāninō.tyarthamahaṅ sa ca mama priyaḥ||7:17||
भावार्थ: इन चारों में ज्ञानी भक्त सबसे श्रेष्ठ है, जो नित्य मुझमें लीन रहता है। वह मुझे अत्यंत प्रिय है और मैं भी उसे।
🌼 यह श्लोक ज्ञानयुक्त भक्ति की महिमा है-जहाँ प्रेम और तत्त्वज्ञान एक हो जाते हैं। ||7:17||
शलोक # 18
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ||
udārāḥ sarva ēvaitē jñānī tvātmaiva mē matam.
āsthitaḥ sa hi yuktātmā māmēvānuttamāṅ gatim||7:18||
भावार्थ: ये सभी भक्त उदार हैं, परंतु ज्ञानी तो मेरा ही स्वरूप है-क्योंकि वह मुझमें ही स्थित होकर मुझे ही परम लक्ष्य मानता है।
🌸 यह श्लोक बताता है कि ज्ञानी भक्त और ईश्वर में कोई भेद नहीं रहता। ||7:18||
शलोक # 19
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ||
bahūnāṅ janmanāmantē jñānavānmāṅ prapadyatē.
vāsudēvaḥ sarvamiti sa mahātmā sudurlabhaḥ||7:19||
भावार्थ: अनेक जन्मों के अंत में जो ज्ञानवान होता है, वह मुझे इस भाव से भजता है-"वासुदेव ही सब कुछ हैं।" ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ होता है।
🌟 यह श्लोक दर्शाता है कि सच्चा ज्ञान अंततः भक्ति में ही परिणत होता है। ||7:19||
शलोक # 20
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ||
kāmaistaistairhṛtajñānāḥ prapadyantē.nyadēvatāḥ.
taṅ taṅ niyamamāsthāya prakṛtyā niyatāḥ svayā||7:20||
भावार्थ: जिनका ज्ञान विभिन्न कामनाओं से हर लिया गया है, वे अपनी प्रकृति के अनुसार अन्य देवताओं की पूजा करते हैं और उनके नियमों का पालन करते हैं।
🌿 यह श्लोक बताता है कि सकाम भक्ति साधक को ईश्वर से दूर कर सकती है। ||7:20||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को अन्य देवताओं की पूजा, उसके सीमित फल, और ईश्वर की सर्वोच्चता की ओर ले जा रहे हैं। अब गीता सच्ची भक्ति और ईश्वर की प्राप्ति की ओर प्रवाहित होने वाली है। 📿✨
शलोक # 21
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ||
yō yō yāṅ yāṅ tanuṅ bhaktaḥ śraddhayārcitumicchati.
tasya tasyācalāṅ śraddhāṅ tāmēva vidadhāmyaham||7:21||
भावार्थ: जो भक्त जिस-जिस देवता की श्रद्धा से पूजा करना चाहता है, मैं उसकी श्रद्धा को उसी देवता में स्थिर कर देता हूँ।
🌿 यह श्लोक दर्शाता है कि सभी श्रद्धा का मूल स्रोत भी ईश्वर ही हैं-भले ही वह किसी देवता की ओर क्यों न हो। ||7:21||
शलोक # 22
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ||
sa tayā śraddhayā yuktastasyārādhanamīhatē.
labhatē ca tataḥ kāmānmayaiva vihitān hi tān||7:22||
भावार्थ: वह भक्त उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता की पूजा करता है और उससे जो फल प्राप्त करता है, वह भी मेरे द्वारा ही नियत होता है।
🌺 यह श्लोक बताता है कि सभी फल-even देवताओं द्वारा दिए गए-ईश्वर की ही कृपा से प्राप्त होते हैं। ||7:22||
शलोक # 23
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ||
antavattu phalaṅ tēṣāṅ tadbhavatyalpamēdhasām.
dēvāndēvayajō yānti madbhaktā yānti māmapi||7:23||
भावार्थ: परंतु उन अल्पबुद्धि वालों का फल नाशवान होता है। देवताओं की पूजा करने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, और मेरे भक्त मुझे प्राप्त होते हैं।
🌼 यह श्लोक भक्ति की दिशा को स्पष्ट करता है-सकाम भक्ति सीमित फल देती है, निष्काम भक्ति ईश्वर को। ||7:23||
शलोक # 24
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ||
avyaktaṅ vyakitamāpannaṅ manyantē māmabuddhayaḥ.
paraṅ bhāvamajānantō mamāvyayamanuttamam||7:24||
भावार्थ: बुद्धिहीन लोग मुझे अव्यक्त से व्यक्त हुआ मानते हैं, क्योंकि वे मेरे अविनाशी और परम स्वरूप को नहीं जानते।
🌸 यह श्लोक बताता है कि ईश्वर का सच्चा स्वरूप इंद्रियों से परे है-वह केवल श्रद्धा और ज्ञान से जाना जा सकता है। ||7:24||
शलोक # 25
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ||
nāhaṅ prakāśaḥ sarvasya yōgamāyāsamāvṛtaḥ.
mūḍhō.yaṅ nābhijānāti lōkō māmajamavyayam||7:25||
भावार्थ: मैं अपनी योगमाया से ढका हुआ हूँ, इसलिए सभी मुझे नहीं जान सकते। यह अज्ञानी संसार मुझे अजन्मा और अविनाशी नहीं समझता।
🌿 यह श्लोक माया की शक्ति को दर्शाता है-जो ईश्वर को सामान्य मानने का भ्रम पैदा करती है। ||7:25||
शलोक # 26
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ||
vēdāhaṅ samatītāni vartamānāni cārjuna.
bhaviṣyāṇi ca bhūtāni māṅ tu vēda na kaścana||7:26||
भावार्थ: हे अर्जुन! मैं भूत, वर्तमान और भविष्य के सभी प्राणियों को जानता हूँ-परंतु कोई मुझे तत्त्व से नहीं जानता।
🌺 यह श्लोक ईश्वर की सर्वज्ञता और जीव की सीमितता को प्रकट करता है। ||7:26||
शलोक # 27
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ||
icchādvēṣasamutthēna dvandvamōhēna bhārata.
sarvabhūtāni saṅmōhaṅ sargē yānti parantapa||7:27||
भावार्थ: हे भारतवंशी! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वंद्वमय मोह के कारण सभी प्राणी सृष्टि के समय भ्रम में पड़ जाते हैं।
🌼 यह श्लोक बताता है कि जन्म के साथ ही जीव माया के जाल में उलझ जाता है। ||7:27||
शलोक # 28
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ||
yēṣāṅ tvantagataṅ pāpaṅ janānāṅ puṇyakarmaṇām.
tē dvandvamōhanirmuktā bhajantē māṅ dṛḍhavratāḥ||7:28||
भावार्थ: जिन पुण्यात्माओं के पाप नष्ट हो गए हैं, वे द्वंद्वों से मुक्त होकर दृढ़ निश्चय से मेरी भक्ति करते हैं।
🌸 यह श्लोक बताता है कि सच्ची भक्ति के लिए भीतर की शुद्धि आवश्यक है। ||7:28||
शलोक # 29
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ||
jarāmaraṇamōkṣāya māmāśritya yatanti yē.
tē brahma tadviduḥ kṛtsnamadhyātmaṅ karma cākhilam||7:29||
भावार्थ: जो बुढ़ापे और मृत्यु से मुक्ति के लिए मेरी शरण लेते हैं, वे ब्रह्म, अध्यात्म और समस्त कर्म को जान लेते हैं।
🌟 यह श्लोक मोक्ष की ओर बढ़ते साधक की पहचान है-जो ज्ञान और भक्ति दोनों से युक्त होता है। ||7:29||
शलोक # 30
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ||
sādhibhūtādhidaivaṅ māṅ sādhiyajñaṅ ca yē viduḥ.
prayāṇakālē.pi ca māṅ tē viduryuktacētasaḥ||7:30||
भावार्थ: जो अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के साथ मुझे जानते हैं, वे मृत्यु के समय भी मुझमें स्थित रहते हैं।
🌿 यह श्लोक बताता है कि जो साधक जीवनभर ईश्वर में लीन रहता है, वह अंत समय में भी विचलित नहीं होता। ||7:30||
🌺 इस प्रकार अध्याय 7 - "ज्ञान विज्ञान योग" पूर्ण होता है। यह केवल ज्ञान का उपदेश नहीं, बल्कि भक्ति, माया से पार जाने की शक्ति, और ईश्वर से एकत्व की दिव्य यात्रा है।
🧘 Conclusion (निष्कर्ष)
अध्याय 7 यह सिद्ध करता है कि केवल बुद्धि से जाना गया ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है - जब तक उसे अनुभूत न किया जाए, वह अपूर्ण है। इसलिए इस अध्याय में भगवान स्वयं को संपूर्ण ब्रह्मांड की जड़ और चेतना के रूप में प्रकट करते हैं और बताते हैं कि भक्ति ही उन्हें पाने का सर्वोत्तम मार्ग है।
आज के युग में जब माया (भ्रम) चारों ओर फैली है, यह अध्याय हमें आध्यात्मिक ज्ञान और विवेक प्रदान करता है।
अन्य उपयोगी लिंक
- अध्याय 1 - अर्जुन विषाद योग
- अध्याय 2 - सांख्य योग
- अध्याय 3 - कर्म योग
- अध्याय 4 - ज्ञान कर्म संन्यास योग
- अध्याय 5 - संन्यास योग
- अध्याय 6 - ध्यान योग
❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
भगवद गीता का अध्याय 7 किस विषय पर है?
यह अध्याय ज्ञान और विज्ञान पर आधारित है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अपने स्वरूप, प्रकृति और भक्ति का रहस्य बताते हैं।
ज्ञान और विज्ञान में क्या अंतर है?
ज्ञान वह होता है जो शास्त्रों से प्राप्त हो, और विज्ञान वह होता है जिसे अनुभव से जाना जाए।
ईश्वर को जानने का सबसे सरल मार्ग क्या बताया गया है?
भक्ति और पूर्ण समर्पण को ईश्वर को जानने का सर्वोत्तम मार्ग बताया गया है।
माया क्या है और यह कैसे बाँधती है?
माया एक दिव्य शक्ति है जो जीव को ईश्वर से विमुख करके संसार में बांधती है।
क्या सभी लोग ईश्वर को जान सकते हैं?
नहीं, केवल वे ही जो माया को पार कर जाते हैं और भगवान में पूर्ण समर्पण करते हैं, वही ईश्वर को जान सकते हैं।
