भगवद गीता - अध्याय 12
भक्ति योग - श्लोक और अर्थ सहित
🧡 Introduction (परिचय)
भगवद गीता का बारहवां अध्याय "भक्ति योग" पर आधारित है। इसमें अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से यह प्रश्न पूछते हैं कि कौन श्रेष्ठ है - निराकार ब्रह्म की उपासना करने वाला या भगवान के साकार रूप का भजन करने वाला?
भगवान श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि जो भावपूर्वक मेरी भक्ति करता है, मैं उसका अत्यंत प्रिय हूं और वह मेरा। इस अध्याय में सच्चे भक्त के गुण, भक्ति के लाभ और भक्त की स्थिति का सुंदर वर्णन है।
यदि आपने अभी तक अध्याय 11 - विश्वरूप दर्शन योग नहीं पढ़ा है, तो पहले वह अवश्य पढ़ें, ताकि इस अध्याय की पृष्ठभूमि अच्छे से समझ में आए।
श्लोक और हिंदी अर्थ
👇 नीचे अध्याय 12 के सभी श्लोक अर्थ सहित जोड़े जाएंगे:
अध्याय 12 - भक्ति योग के मार्ग पर - जहाँ भगवान कृष्ण साकार और निराकार दोनों की पूजा, भक्त के गुण और भक्ति की सरलता को प्रकट करते हैं। यह अध्याय वास्तव में अपने आप में एक अनूठा उपहार है - यह भक्ति के गहन रहस्यों को सरल, सुंदर और संवेदनशील तरीके से उजागर करता है।
शलोक # 1
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ||
arjuna uvāca
ēvaṅ satatayuktā yē bhaktāstvāṅ paryupāsatē.
yēcāpyakṣaramavyaktaṅ tēṣāṅ kē yōgavittamāḥ||12:1||
भावार्थ : अर्जुन पूछते हैं-हे कृष्ण! जो भक्त सगुण रूप में आपकी भक्ति करते हैं और जो लोग निर्गुण, अव्यक्त ब्रह्म की उपासना करते हैं-इनमें श्रेष्ठ कौन है?
🌿 यह प्रश्न हर जिज्ञासु मन का है-क्या ईश्वर साकार रूप में अधिक समीप है, या निराकार रूप में अधिक गहन? ||12:01||
शलोक # 2
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ||
śrī bhagavānuvāca
mayyāvēśya manō yē māṅ nityayuktā upāsatē.
śraddhayā parayōpētāstē mē yuktatamā matāḥ||12:2||
भावार्थ : श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं-हे पार्थ! जो मन लगाकर सगुण रूप में मेरी भक्ति करते हैं और अपार श्रद्धा से युक्त हैं, वे सबसे उत्तम योगी हैं।
💖 ईश्वर कहते हैं-जहाँ मन, श्रद्धा और प्रेम साथ हों, वहीं मैं हूँ। ||12:02||
शलोक # 3
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ||
yē tvakṣaramanirdēśyamavyaktaṅ paryupāsatē.
sarvatragamacintyaṅ ca kūṭasthamacalaṅ dhruvam||12:3||
शलोक # 4
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ||
saṅniyamyēndriyagrāmaṅ sarvatra samabuddhayaḥ.
tē prāpnuvanti māmēva sarvabhūtahitē ratāḥ||12:4||
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शलोक # 5
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ||
klēśō.dhikatarastēṣāmavyaktāsaktacētasām.
avyaktā hi gatirduḥkhaṅ dēhavadbhiravāpyatē||12:5||
भावार्थ : जो लोग निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं-जो इंद्रियों से परे, अव्यक्त और सर्वव्यापी है-वे भी मुझे प्राप्त करते हैं, किन्तु यह मार्ग कठिन है।
🌀 निराकार की ओर यात्रा एक गहन साधना है-जहाँ मार्ग लंबा है और मन को थामना कठिन। ||12:03 - 12:05||
शलोक # 6
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ||
yē tu sarvāṇi karmāṇi mayi saṅnyasya matparāḥ.
ananyēnaiva yōgēna māṅ dhyāyanta upāsatē||12:6||
शलोक # 7
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ||
tēṣāmahaṅ samuddhartā mṛtyusaṅsārasāgarāt.
bhavāmi nacirātpārtha mayyāvēśitacētasām||12:7||
भावार्थ : जो भक्त अपने समस्त कर्म मुझे समर्पित करते हैं, मेरी भक्ति में लीन रहते हैं-उनका मैं स्वयं उद्धार करता हूँ।
🌊 यहाँ श्रीकृष्ण जीवन की सबसे बड़ी आश्वस्ति देते हैं-"मैं स्वयं तुम्हें पार लगाऊँगा।" ||12:06 - 12:07||
शलोक # 8
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ||
mayyēva mana ādhatsva mayi buddhiṅ nivēśaya.
nivasiṣyasi mayyēva ata ūrdhvaṅ na saṅśayaḥ||12:8||
भावार्थ : मन को मुझमें लगाओ, बुद्धि को मुझमें स्थिर करो-तब तुम सदा मुझमें स्थित रहोगे, इसमें कोई संदेह नहीं।
🪷 यह योग का सार है-मन और बुद्धि जहाँ एक हो जाएँ, वहाँ भगवान मिलते हैं। ||12:08||
शलोक # 9
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ||
atha cittaṅ samādhātuṅ na śaknōṣi mayi sthiram.
abhyāsayōgēna tatō māmicchāptuṅ dhanañjaya||12:9||
शलोक # 10
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ||
abhyāsē.pyasamarthō.si matkarmaparamō bhava.
madarthamapi karmāṇi kurvan siddhimavāpsyasi||12:10||
भावार्थ : यदि तुम मन को मुझमें स्थिर नहीं कर पाते, तो अभ्यास करो। यदि अभ्यास कठिन लगे, तो कर्म करो मेरे लिए। यदि वह भी कठिन हो, तो कर्म का फल त्याग दो-तभी तुम्हें शांति मिलेगी।
🌸 यहाँ गीता की कोमलता प्रकट होती है-ईश्वर हर स्तर पर मार्ग सुझाते हैं, कोई भी पीछे नहीं रहता। ||12:09 - 12:10||
🌺 इस प्रकार अध्याय 12 के प्रारंभिक 10 श्लोकों में भक्ति के विविध स्वरूप, कठिनाइयाँ, विकल्प और प्रभु की करुणा-all unfold like petals of a lotus.
शलोक # 11
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ||
athaitadapyaśaktō.si kartuṅ madyōgamāśritaḥ.
sarvakarmaphalatyāgaṅ tataḥ kuru yatātmavān||12:11||
भावार्थ : यदि तुम अभ्यास, ध्यान, और कर्म-योग में भी असमर्थ हो, तो बस कर्मों का फल त्याग दो और आत्मसंयमी बनकर मुझमें लीन हो जाओ।
🍂 यहाँ भगवान भक्ति को और सरल बनाते हैं-न अभ्यास चाहिए, न ध्यान; बस त्याग और संकल्प। ||12:11||
शलोक # 12
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ||
śrēyō hi jñānamabhyāsājjñānāddhyānaṅ viśiṣyatē.
dhyānātkarmaphalatyāgastyāgācchāntiranantaram||12:12||
भावार्थ : अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है, ध्यान से कर्मफल का त्याग श्रेष्ठ है; और त्याग से शांति मिलती है।
🕊 यह भक्ति की सीढ़ियाँ गिनाता है-जहाँ अंतिम सोपान है परम शांति। ||12:12||
शलोक # 13
अर्जुन उवाच
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ||
advēṣṭā sarvabhūtānāṅ maitraḥ karuṇa ēva ca.
nirmamō nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī||12:13||
शलोक # 14
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः||
santuṣṭaḥ satataṅ yōgī yatātmā dṛḍhaniścayaḥ.
mayyarpitamanōbuddhiryō madbhaktaḥ sa mē priyaḥ||12:14||
भावार्थ : जो किसी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र है, करुणामय है, अहंकाररहित, संयमी, संतुष्ट और मुझमें दृढ़ है-वही मुझे प्रिय है।
🌸 यहाँ से आरंभ होता है 'प्रियता का पाठ'-जहाँ व्यवहार ही पूजा है। ||12:13 - 12:14||
शलोक # 15
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः||
yasmānnōdvijatē lōkō lōkānnōdvijatē ca yaḥ.
harṣāmarṣabhayōdvēgairmuktō yaḥ sa ca mē priyaḥ||12:15||
भावार्थ : जिससे कोई भयभीत न हो, और जो स्वयं भी किसी से विचलित न हो-वह भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है।
🌸 एक शांत जीवन ही भक्ति का सबसे सुंदर स्वरूप है। ||12:15||
शलोक # 16
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः||
anapēkṣaḥ śucirdakṣa udāsīnō gatavyathaḥ.
sarvārambhaparityāgī yō madbhaktaḥ sa mē priyaḥ||12:16||
शलोक # 17
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः||
yō na hṛṣyati na dvēṣṭi na śōcati na kāṅkṣati.
śubhāśubhaparityāgī bhaktimān yaḥ sa mē priyaḥ||12:17||
शलोक # 18
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः||
samaḥ śatrau ca mitrē ca tathā mānāpamānayōḥ.
śītōṣṇasukhaduḥkhēṣu samaḥ saṅgavivarjitaḥ||12:18||
भावार्थ : जो अपेक्षारहित, शुद्ध, कुशल, उदासीन, दुखों से परे, सबके प्रति समभाव रखने वाला, मान-अपमान, सुख-दुख में एक समान है-वह मुझे प्रिय है।
🌾 यहाँ श्रीकृष्ण दिखाते हैं कि एक संतुलित हृदय ही प्रभु की सच्ची अर्चना है। ||12:16 - 12:18||
शलोक # 19
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः||
tulyanindāstutirmaunī santuṣṭō yēnakēnacit.
anikētaḥ sthiramatirbhakitamānmē priyō naraḥ||12:19||
भावार्थ : जो निंदा और प्रशंसा में सम रहता है, कम बोलता है, किसी भी परिस्थिति में संतुष्ट है, स्थिर बुद्धि और भक्ति से युक्त है-वह मुझे अत्यंत प्रिय है।
🏞 यहाँ 'मौन', 'तुल्यता' और 'तटस्थता'-इन गुणों से सजी भक्ति, निर्मल जल की तरह स्वच्छ है। ||12:19||
शलोक # 20
श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः||
yē tu dharmyāmṛtamidaṅ yathōktaṅ paryupāsatē.
śraddadhānā matparamā bhaktāstē.tīva mē priyāḥ||12:20||
भावार्थ : जो श्रद्धा से युक्त होकर इस अमृतमय धर्म का आचरण करते हैं, और मुझे ही परम मानते हैं-वे भक्त मुझे अतिशय प्रिय हैं।
🌟 यह अंतिम 'प्रियत्व' की पूर्णता है-श्रद्धा ही है जो हर साधना को सार्थक बनाती है। ||12:20||
🌺 इस प्रकार अध्याय 12 - "भक्ति योग" पूर्ण होता है। यह अध्याय एक श्रद्धामय यात्रा है - जहाँ ईश्वर का प्रिय बनने के लिए ज्ञान नहीं, प्रेम चाहिए; क्रिया नहीं, करुणा चाहिए।
🧘 Conclusion (निष्कर्ष)
भगवद गीता का यह अध्याय हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म से भगवान में समर्पण है। भक्ति का मार्ग सरल है, लेकिन उसमें त्याग, सहनशीलता और समभाव की आवश्यकता होती है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो भक्ति से युक्त है, वह मुझे सबसे प्रिय है और मैं उसे कभी नहीं छोड़ता। यह अध्याय उन सभी के लिए प्रेरणास्रोत है जो ईश्वर से जुड़ना चाहते हैं।
अन्य उपयोगी लिंक
- अध्याय 1 - अर्जुन विषाद योग
- अध्याय 2 - सांख्य योग
- अध्याय 3 - कर्म योग
- अध्याय 4 - ज्ञान कर्म संन्यास योग
- अध्याय 5 - संन्यास योग
- अध्याय 6 - ध्यान योग
- अध्याय 7 - ज्ञान विज्ञान योग
- अध्याय 8 - अक्षर ब्रह्म योग
- अध्याय 9 - राजविद्या राजगुह्य योग
- अध्याय 10 - विभूति योग
- अध्याय 11 - विश्वरूप दर्शन योग
❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
भक्ति योग क्या है?
भक्ति योग एक ऐसा मार्ग है जिसमें प्रेमपूर्वक ईश्वर की उपासना की जाती है। यह योग साधक को भगवान से जोड़ता है।
सच्चे भक्त के क्या लक्षण होते हैं?
सच्चा भक्त दया, क्षमा, शांति, अहंकार रहितता, समभाव, और संकल्पशक्ति से युक्त होता है। वह हर परिस्थिति में भगवान को स्मरण करता है।
निराकार और साकार उपासना में कौन श्रेष्ठ है?
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि दोनों ही मार्ग सही हैं, लेकिन साकार भक्ति मार्ग अधिक सरल और शीघ्र फलदायक होता है।
क्या भक्ति योग सबके लिए है?
हां, भक्ति योग किसी जाति, लिंग या उम्र का भेद नहीं करता। जो भी भावपूर्वक भगवान का स्मरण करता है, वह भगवान को प्रिय होता है।
भक्ति योग का लाभ क्या है?
भक्ति योग से मन शांत होता है, जीवन में स्थिरता आती है और ईश्वर से जुड़ने की अनुभूति होती है।
