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भगवद गीता अध्याय 14 गुणत्रय विभाग योग - अर्जुन को उपदेश देते भगवान कृष्ण

भगवद गीता - अध्याय 14
गुणत्रय विभाग योग - श्लोक और अर्थ सहित

🧡 Introduction (परिचय)

भगवद गीता का अध्याय 14 'गुणत्रय विभाग योग' आत्मा और शरीर में काम करने वाले तीन गुणों - सत्त्व, रज और तम की प्रकृति और प्रभाव को विस्तार से समझाता है। श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह तीनों गुण प्रकृति के अंतर्गत आते हैं और जीवात्मा को बाँधते हैं।

सत्त्व गुण ज्ञान, शांति और पवित्रता को प्रेरित करता है, रज गुण कामना और कर्म को बढ़ाता है और तम गुण अज्ञान, आलस्य और मोह से संबंधित है। इस अध्याय को पढ़कर हम समझ सकते हैं कि कैसे इन गुणों के प्रभाव से मनुष्य अज्ञान में बंध जाता है और मोक्ष की प्राप्ति कैसे संभव है।


श्लोक और हिंदी अर्थ

👇 नीचे अध्याय 14 के सभी श्लोक अर्थ सहित जोड़े जाएंगे:

अध्याय 14 - "गुणत्रय विभाग योग" में-जहाँ श्रीकृष्ण प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस् और तमस्) की व्याख्या करते हैं। ये गुण हर जीव के स्वभाव, कर्म और चेतना को प्रभावित करते हैं। इस ज्ञान से हम अपने स्वभाव को समझ सकते हैं और उससे ऊपर उठकर शुद्ध चेतना तक पहुँच सकते हैं।


अध्याय # 14
शलोक # 1
ज्ञान की महिमा और प्रकृति-पुरुष से जगत् की उत्पत्ति

श्रीभगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानं मानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः || (१)

śrī bhagavānuvāca
paraṅ bhūyaḥ pravakṣyāmi jñānānāṅ jñānamuttamam.
yajjñātvā munayaḥ sarvē parāṅ siddhimitō gatāḥ||14:1||

भावार्थ : श्रीकृष्ण कहते हैं-अब मैं फिर से परम ज्ञान कहता हूँ, जो सभी ज्ञानों में श्रेष्ठ है। जिसे जानकर ऋषिगण परम सिद्धि को प्राप्त हो चुके हैं।

🌟 यह अध्याय एक रहस्य का उद्घाटन है-ऐसा ज्ञान जो जन्म-मरण से पार ले जाए। ||14:01||

अध्याय # 14
शलोक # 2
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च || (२)

idaṅ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ.sargē.pi nōpajāyantē pralayē na vyathanti ca||14:2||

भावार्थ : इस ज्ञान को अपनाकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए साधक सृष्टि में फिर जन्म नहीं लेते और प्रलय में भी विचलित नहीं होते।

🕊 यह मुक्ति का वचन है-जहाँ प्रकृति का खेल समाप्त हो जाता है। ||14:02||
अध्याय # 14
शलोक # 3
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत || (३)

mama yōnirmahadbrahma tasmin garbhaṅ dadhāmyaham.saṅbhavaḥ sarvabhūtānāṅ tatō bhavati bhārata||14:3||

भावार्थ : मेरी महायोनि (प्रकृति) में मैं गर्भ स्थापित करता हूँ, जिससे समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं।

🌱 यहाँ सृष्टि का दिव्य रहस्य है-ईश्वर ही बीजदाता है। ||14:03||
अध्याय # 14
शलोक # 4
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता || (४)

sarvayōniṣu kauntēya mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ.tāsāṅ brahma mahadyōnirahaṅ bījapradaḥ pitā||14:4||

भावार्थ : हे अर्जुन! सभी योनियों में जो भी रूप उत्पन्न होते हैं-उनकी माता प्रकृति है और मैं उनका बीजदाता पिता हूँ।

👶 यहाँ जीवन की दिव्यता स्पष्ट होती है-हर आत्मा ईश्वर से ही उत्पन्न है। ||14:04||
अध्याय # 14
शलोक # 5
सत्, रज, तम- तीनों गुणों का विषय
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् || (५)

sattvaṅ rajastama iti guṇāḥ prakṛtisaṅbhavāḥ.nibadhnanti mahābāhō dēhē dēhinamavyayam||14:5||

भावार्थ : सत्त्व, रजस् और तमस्-ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न हैं और ये अविनाशी आत्मा को शरीर में बाँधते हैं।

⚖️ यहाँ चेतना की बंदिशें प्रकट होती हैं-हमारे कर्म, स्वभाव, यहाँ तक कि सोच भी इन गुणों से संचालित होती है। ||14:05||

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अध्याय # 14
शलोक # 6
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ || (६)

tatra sattvaṅ nirmalatvātprakāśakamanāmayam.sukhasaṅgēna badhnāti jñānasaṅgēna cānagha||14:6||

भावार्थ : सत्त्वगुण निर्मल और प्रकाशस्वरूप है, यह सुख और ज्ञान के प्रति आसक्ति के द्वारा आत्मा को बाँधता है।

💡 सत्त्व सबसे उज्ज्वल है, परंतु मोह मुक्त नहीं-यह भी सुख में बाँध सकता है। ||14:06||
अध्याय # 14
शलोक # 7
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् || (७)

rajō rāgātmakaṅ viddhi tṛṣṇāsaṅgasamudbhavam.tannibadhnāti kauntēya karmasaṅgēna dēhinam||14:7||

भावार्थ : रजोगुण रागयुक्त है, तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न होता है। यह कर्मों की प्रवृत्ति से जीव को बाँधता है।

🔥 रजस् गति देता है, परंतु यह भागदौड़, कामना और क्लेश का कारण बनता है। ||14:07||
अध्याय # 14
शलोक # 8
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत || (८)

tamastvajñānajaṅ viddhi mōhanaṅ sarvadēhinām.pramādālasyanidrābhistannibadhnāti bhārata||14:8||

भावार्थ : तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है, यह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा आत्मा को मोह में बाँधता है।

🌑 तमस् जड़ता का प्रतिनिधि है-यह विवेक को ढक लेता है। ||14:08||
अध्याय # 14
शलोक # 9
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत || (९)

sattvaṅ sukhē sañjayati rajaḥ karmaṇi bhārata.jñānamāvṛtya tu tamaḥ pramādē sañjayatyuta||14:9||

भावार्थ : सत्त्व सुख में, रजस् कर्म में, और तमस् अज्ञान में बाँधता है।

🌪 तीनों गुण अपना प्रभाव डालते हैं-कोई भी मुक्त नहीं करता जब तक उनसे ऊपर न उठा जाए। ||14:09||
अध्याय # 14
शलोक # 10
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा || (१०)

rajastamaścābhibhūya sattvaṅ bhavati bhārata.rajaḥ sattvaṅ tamaścaiva tamaḥ sattvaṅ rajastathā||14:10||

भावार्थ : कभी सत्त्व रजस् और तमस् पर हावी होता है, कभी रजस् सत्त्व और तमस् पर, और कभी तमस् दोनों पर। ये तीनों गुण निरंतर एक-दूसरे को पराजित करते रहते हैं।

🔁 यह निरंतर संघर्ष है-मनुष्य की चेतना इन्हीं गुणों की स्पंदनशील रस्सी पर झूलती है। ||14:10||

🌼 श्लोक 14.1 से 14.10 तक सृष्टि के मूल गुणों का रहस्य प्रकट होता है। यहाँ से हमें आत्म-निरीक्षण का अवसर मिलता है: क्या मैं सत्त्व में हूँ, रजस् में, या तमस् में? और क्या मैं इन गुणों के पार जा सकता हूँ?

श्लोकों (14.11 से 14.20) यहाँ श्रीकृष्ण विस्तार से बताते हैं कि जब सत्त्व, रजस् या तमस् गुण प्रबल होते हैं, तो उनका व्यवहार, प्रभाव और फल जीवन में कैसे प्रकट होता है। साथ ही यह भी बताते हैं कि जन्म के समय कौन-सा गुण मुख्य हो, तो आगे की गति कैसी होती है।
अध्याय # 14
शलोक # 11
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत || (११)

sarvadvārēṣu dēhē.sminprakāśa upajāyatē.jñānaṅ yadā tadā vidyādvivṛddhaṅ sattvamityuta||14:11||

भावार्थ : जब शरीर के सभी द्वारों (ज्ञानेंद्रियों) में प्रकाश दिखाई देता है और मन शांत व एकाग्र हो जाता है-तब जानो कि सत्त्वगुण का विकास हो रहा है।

🌞 सत्त्व आता है तो दृष्टि स्पष्ट होती है-जैसे भीतर कोई दीप जल उठा हो। ||14:11||
अध्याय # 14
शलोक # 12
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ || (१२)

lōbhaḥ pravṛttirārambhaḥ karmaṇāmaśamaḥ spṛhā.rajasyētāni jāyantē vivṛddhē bharatarṣabha||14:12||

भावार्थ : जब लोभ, अत्यधिक क्रिया-प्रवृत्ति, कर्मों की व्याकुलता, अशांति और तृष्णा बढ़ने लगे-तो समझो कि रजोगुण प्रबल हो गया है।

🔥 रजस् की तीव्रता आकर्षक लग सकती है, पर यह थकावट और बेचैनी छोड़ जाती है। ||14:12||
अध्याय # 14
शलोक # 13
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन || (१३)

aprakāśō.pravṛttiśca pramādō mōha ēva ca.tamasyētāni jāyantē vivṛddhē kurunandana||14:13||

भावार्थ : जब अंधकार, निष्क्रियता, प्रमाद और मोह बढ़ने लगे-तो जानो कि तमोगुण बढ़ रहा है।

🌑 तमस् का आभास तब होता है जब दिशा धुँधली और मन निष्क्रिय हो जाए। ||14:13||
अध्याय # 14
शलोक # 14
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते || (१४)

yadā sattvē pravṛddhē tu pralayaṅ yāti dēhabhṛt.tadōttamavidāṅ lōkānamalānpratipadyatē||14:14||

भावार्थ : जब कोई व्यक्ति सत्त्वगुण में स्थित रहकर शरीर त्यागता है, तब वह पुण्यलोकों की ओर जाता है।

🕊 सत्त्वमय अंत शांति की ओर ले जाता है-स्वर्ग समान अनुभूतियाँ देता है। ||14:14||
अध्याय # 14
शलोक # 15
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते || (१५)

rajasi pralayaṅ gatvā karmasaṅgiṣu jāyatē.tathā pralīnastamasi mūḍhayōniṣu jāyatē||14:15||

भावार्थ : जो रजोगुण में मृत्यु को प्राप्त होता है, वह कर्म में आसक्त व्यक्तियों के रूप में जन्म लेता है। और जो तमोगुण में मरता है, वह मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।

🔁 गुण ही गति बनाते हैं-जैसा भाव, वैसा भव। ||14:15||
अध्याय # 14
शलोक # 16
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् || (१६)

karmaṇaḥ sukṛtasyāhuḥ sāttvikaṅ nirmalaṅ phalam.rajasastu phalaṅ duḥkhamajñānaṅ tamasaḥ phalam||14:16||

भावार्थ : शुभ कर्म का फल निर्मल और सत्त्वमय होता है। रजस का फल दुःख होता है और तमस का फल अज्ञान।

🍃 कर्मों की गुणवत्ता उनके फल में प्रतिबिंबित होती है-प्रकाश या अंधकार। ||14:16||
अध्याय # 14
शलोक # 17
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च || (१७)

sattvātsañjāyatē jñānaṅ rajasō lōbha ēva ca.pramādamōhau tamasō bhavatō.jñānamēva ca||14:17||

भावार्थ : सत्त्व से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजस् से लोभ उत्पन्न होता है, और तमस् से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान उत्पन्न होते हैं।

📚 सत्त्व उपहार है ज्ञान का, रजस् है दौड़, और तमस् है नींद। ||14:17||
अध्याय # 14
शलोक # 18
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः || (१८)

ūrdhvaṅ gacchanti sattvasthā madhyē tiṣṭhanti rājasāḥ.jaghanyaguṇavṛttisthā adhō gacchanti tāmasāḥ||14:18||

भावार्थ : सत्त्वगुण में स्थित लोग ऊपर (श्रेष्ठ लोकों) की ओर जाते हैं, रजोगुण वाले मध्य में रहते हैं और तमोगुण वाले नीचे गिरते हैं।

🪶 गुण ही हमारी उड़ान की ऊँचाई तय करते हैं। ||14:18||
अध्याय # 14
शलोक # 19
भगवत्प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति || (१९)

nānyaṅ guṇēbhyaḥ kartāraṅ yadā draṣṭānupaśyati.guṇēbhyaśca paraṅ vētti madbhāvaṅ sō.dhigacchati||14:19||

भावार्थ : जब कोई देखता है कि गुणों के सिवा और कुछ भी कर्ता नहीं है, और वह मुझ परमेश्वर को गुणों से परे जान लेता है-तब वह मेरी स्थिति को प्राप्त हो जाता है।

☀️ यहाँ से शुरू होती है मुक्ति की यात्रा-गुणों से ऊपर उठकर ब्रह्म को जानना। ||14:19||
अध्याय # 14
शलोक # 20
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते || (२०)

guṇānētānatītya trīndēhī dēhasamudbhavān.janmamṛtyujarāduḥkhairvimuktō.mṛtamaśnutē||14:20||

भावार्थ : जब देही इन तीनों गुणों को पार कर लेता है, तब वह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और दुःख से मुक्त हो जाता है और अमरता को प्राप्त करता है।

🌺 गुणातीत बनना ही गीता का शिखर है-जहाँ आत्मा स्वतंत्र और शांत हो जाती है। ||14:20||

यह अध्याय हमें अपने गुणों को पहचानने और अंततः उनके पार जाने की राह दिखाता है-जहाँ आत्मा न प्रकाश में, न अंधकार में, बस ब्रह्म में स्थित होती है।
अध्याय # 14
शलोक # 21
अब अध्याय 14 - "गुणत्रय विभाग योग" के अंतिम श्लोकों (14.21 से 14.27), जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन के एक अद्भुत प्रश्न का उत्तर देते हैं-"गुणातीत व्यक्ति कौन होता है?" और फिर उसके लक्षणों को इस तरह चित्रित करते हैं कि मानो साक्षात मुक्त आत्मा हमारे समक्ष खड़ी हो।

अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते || (२१)

arjuna uvācakairliṅgaistrīnguṇānētānatītō bhavati prabhō.kimācāraḥ kathaṅ caitāṅstrīnguṇānativartatē||14:21||

भावार्थ : अर्जुन पूछते हैं-हे प्रभु! त्रिगुणों से परे जाने वाला व्यक्ति किन लक्षणों से पहचाना जाता है? वह कैसा आचरण करता है? और इन गुणों को कैसे पार करता है?

🪔 यह प्रश्न केवल अर्जुन का नहीं, हर साधक की अंतरतम जिज्ञासा है-गुणों से परे जाना ही तो मुक्ति है। ||14:21||
अध्याय # 14
शलोक # 22
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति || (२२)

śrī bhagavānuvācaprakāśaṅ ca pravṛttiṅ ca mōhamēva ca pāṇḍava.na dvēṣṭi sampravṛttāni na nivṛttāni kāṅkṣati||14:22||
अध्याय # 14
शलोक # 23
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते || (२३)

udāsīnavadāsīnō guṇairyō na vicālyatē.guṇā vartanta ityēva yō.vatiṣṭhati nēṅgatē||14:23||

भावार्थ : जो सत्त्व की ज्योति, रजस की क्रियाशीलता और तमस के मोह से प्रभावित नहीं होता-न उन्हें रोकता है, न चाहता है-वह त्रिगुणातीत कहलाता है।

🌿 गुणातीत की पहचान यह है- वह भीतर स्थिर है, गुण बाहर चलते हैं। ||14:22 - 14:23||
अध्याय # 14
शलोक # 24
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः || (२४)

samaduḥkhasukhaḥ svasthaḥ samalōṣṭāśmakāñcanaḥ.tulyapriyāpriyō dhīrastulyanindātmasaṅstutiḥ||14:24||

भावार्थ : जो सुख-दुख में समान रहता है, जो मिट्टी, पत्थर और सोने को एक समान समझता है; प्रिय और अप्रिय में सम है; निंदा-स्तुति में स्थिर रहता है-वही गुणातीत है।

💠 यहाँ परम संतुलन प्रकट होता है-जहाँ वस्तुएँ, संबंध और शब्द आत्मा को नहीं डिगाते। ||14:24||
अध्याय # 14
शलोक # 25
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः सा उच्यते || (२५)

mānāpamānayōstulyastulyō mitrāripakṣayōḥ.sarvārambhaparityāgī guṇātītaḥ sa ucyatē||14:25||

भावार्थ : जो मान-अपमान, मित्र-शत्रु, सफलता-असफलता में समान रहता है; और सभी कर्मों में आसक्ति छोड़ देता है-वही त्रिगुणों से परे कहलाता है।

🕊 जहाँ त्याग सहज हो जाए, वहाँ आत्मा गुणों के बंधन से मुक्त होती है। ||14:25||
अध्याय # 14
शलोक # 26
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्येतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते || (२६)

māṅ ca yō.vyabhicārēṇa bhakitayōgēna sēvatē.sa guṇānsamatītyaitān brahmabhūyāya kalpatē||14:26||

भावार्थ : जो अविचल भक्ति के माध्यम से मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को पार कर ब्रह्मरूप हो जाता है।

📿 भक्ति यहाँ द्वार बनती है-ब्रह्म तक पहुँचने का सीधा, प्रेममय मार्ग। ||14:26||
अध्याय # 14
शलोक # 27
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च || (२७)

brahmaṇō hi pratiṣṭhā.hamamṛtasyāvyayasya ca.śāśvatasya ca dharmasya sukhasyaikāntikasya ca||14:27||

भावार्थ : क्योंकि मैं ही उस निर्विकार ब्रह्म का आधार हूँ, जो अमर, अविनाशी, शाश्वत धर्मस्वरूप और परम सुख का स्रोत है।

🌺 यहाँ श्रीकृष्ण स्वयं को "ब्रह्म का आधार" घोषित करते हैं-वह स्थिर ज्योति हैं, जो आत्मा को त्रिगुणातीत कर परम में स्थित करती है। ||14:27||

🌼 इस प्रकार अध्याय 14 - "गुणत्रय विभाग योग" का समापन होता है। यह केवल गुणों की चर्चा नहीं, बल्कि चेतना के तीन स्तरों का विज्ञान है-और फिर उनसे पार उठने का दिव्य रहस्य।


🧘 Conclusion (निष्कर्ष)

इस अध्याय से यह स्पष्ट होता है कि तीनों गुणों का प्रभाव हमारी चेतना और जीवनशैली पर पड़ता है। श्रीकृष्ण हमें सिखाते हैं कि गुणातीत होकर - यानी इन तीनों गुणों के प्रभाव से ऊपर उठकर - हम परम शांति और मोक्ष

यदि आपने अध्याय 13 - क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग पढ़ा है, तो आप इस अध्याय को प्राकृतिक गुणों के विस्तार के रूप में समझ सकते हैं। और अध्याय 15 इस ज्ञान को और ऊँचाई पर ले जाता है।


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❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

गुणत्रय विभाग योग का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है तीनों गुणों (सत्त्व, रज और तम) का विस्तार से विवेचन। यह अध्याय उनके प्रभाव, कार्य और मुक्ति का मार्ग बताता है।

तीन गुण कौन से हैं और क्या कार्य करते हैं?

सत्त्व ज्ञान और पवित्रता देता है, रज कर्म और इच्छाएं बढ़ाता है, और तम अज्ञान, आलस्य और मोह उत्पन्न करता है।

गुणों से ऊपर उठना क्यों आवश्यक है?

क्योंकि जब तक आत्मा इन गुणों में बंधी है, तब तक वह मोक्ष नहीं पा सकती। श्रीकृष्ण कहते हैं कि गुणातीत बनना ही मुक्ति का मार्ग है।

क्या कोई व्यक्ति केवल एक गुण से प्रभावित होता है?

नहीं, प्रत्येक व्यक्ति में तीनों गुण मौजूद होते हैं, परंतु जीवन की परिस्थिति और मन के भाव के अनुसार कोई एक प्रमुख हो सकता है।

इस अध्याय का आध्यात्मिक महत्व क्या है?

यह अध्याय आत्मा को प्रकृति के बंधन से मुक्त कराकर मोक्ष की ओर ले जाने वाला गहन ज्ञान प्रदान करता है।


लेखक: शाइनकैप टीम | प्रकाशित: | संशोधित: