भगवद गीता अध्याय 4
ज्ञान कर्म संन्यास योग - श्लोक व अर्थ सहित
🧡 Introduction (परिचय)
भगवद गीता का चौथा अध्याय ज्ञान कर्म संन्यास योग कहलाता है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बताते हैं कि किस प्रकार दिव्य ज्ञान प्राप्त कर कर्म का त्याग संभव है।
श्रीकृष्ण इस अध्याय में यह भी कहते हैं कि उन्होंने यह अमूल्य ज्ञान सूर्यदेव से प्रारंभ कर मनुष्यों तक पहुँचाया है। इस अध्याय का मुख्य विषय है - आत्मज्ञान द्वारा मोक्ष की ओर अग्रसर होना और कर्मों को अर्पण भाव से करना।
यह अध्याय उन seekers के लिए अत्यंत उपयोगी है जो ज्ञान, भक्ति और कर्म को संतुलित रूप से अपनाकर जीवन में शांति और मोक्ष पाना चाहते हैं।
अगर आपने अध्याय 3 - कर्म योग नहीं पढ़ा है, तो पहले उसे पढ़ना लाभकारी रहेगा। सभी अध्यायों की सूची देखने के लिए यहाँ जाएं - श्रीमद भगवद गीता हिंदी में
श्लोक और हिंदी भावार्थ
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अध्याय 4 - ज्ञान कर्म संन्यास योग में-जहाँ श्रीकृष्ण ज्ञान, कर्म और त्याग के रहस्य को एक सूत्र में पिरोते हैं। यह श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञान, कर्म और त्याग के दिव्य रहस्य से परिचित कराते हैं। यह अध्याय ईश्वर के अवतार, कर्म की गहराई, और ज्ञान की अग्नि से कर्मों के दहन की दिव्यता को प्रकट करता है। अध्याय 4 - ज्ञान कर्म संन्यास योग - जहाँ श्रीकृष्ण सनातन योग परंपरा और भक्त-सखा अर्जुन के प्रति अपने स्नेह को प्रकट करते हैं|
शलोक # 1
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ||
śrī bhagavānuvāca
imaṅ vivasvatē yōgaṅ prōktavānahamavyayam.
vivasvān manavē prāha manurikṣvākavē.bravīt||4:1||
भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले-मैंने यह अविनाशी योग पहले सूर्यदेव विवस्वान को बताया, विवस्वान ने मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को बताया।
🌿 यह योग कोई नया उपदेश नहीं-यह सनातन परंपरा है, जो युगों से चली आ रही है। ||4:01||
शलोक # 2
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ||
ēvaṅ paramparāprāptamimaṅ rājarṣayō viduḥ.
sa kālēnēha mahatā yōgō naṣṭaḥ parantapa||4:2||
भावार्थ: हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, लेकिन समय के प्रभाव से यह ज्ञान लुप्त हो गया।
🌺 जब ज्ञान की परंपरा टूटती है, तब अधर्म बढ़ता है-इसलिए श्रीकृष्ण अब स्वयं इसे पुनः प्रकट कर रहे हैं। ||4:02||
शलोक # 3
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ||
sa ēvāyaṅ mayā tē.dya yōgaḥ prōktaḥ purātanaḥ.
bhaktō.si mē sakhā cēti rahasyaṅ hyētaduttamam||4:3||
भावार्थ: वही यह पुरातन योग आज मैंने तुमसे कहा है, क्योंकि तुम मेरे भक्त और प्रिय सखा हो। यह अत्यंत उत्तम रहस्य है।
🌼 जब शिष्य श्रद्धावान और प्रिय होता है, तब गुरु स्वयं ज्ञान का रहस्य प्रकट करता है। ||4:03||
शलोक # 4
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ||
arjuna uvāca
aparaṅ bhavatō janma paraṅ janma vivasvataḥ.
kathamētadvijānīyāṅ tvamādau prōktavāniti||4:4||
भावार्थ: अर्जुन बोले-आपका जन्म तो अभी हुआ है, और सूर्य का जन्म तो बहुत पहले। फिर मैं कैसे मानूं कि आपने ही आदिकाल में सूर्य को यह योग बताया?
🌿 यह अर्जुन की जिज्ञासा है-वह श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप को समझना चाहता है। ||4:04||
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शलोक # 5
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ||
śrī bhagavānuvāca
bahūni mē vyatītāni janmāni tava cārjuna.
tānyahaṅ vēda sarvāṇi na tvaṅ vēttha parantapa||4:5||
भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले-हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म हो चुके हैं। तुम उन्हें नहीं जानते, पर मैं सब जानता हूँ।
🌺 यहाँ श्रीकृष्ण अपने अवतार के रहस्य की झलक देते हैं-वे जन्म लेते हैं, पर जन्म से बंधते नहीं। ||4:05||
शलोक # 6
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ||
ajō.pi sannavyayātmā bhūtānāmīśvarō.pi san.
prakṛtiṅ svāmadhiṣṭhāya saṅbhavāmyātmamāyayā||4:6||
भावार्थ: मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ, फिर भी अपनी योगमाया से अपनी प्रकृति को अधीन करके प्रकट होता हूँ।
🌼 यह श्लोक बताता है कि ईश्वर का जन्म साधारण नहीं-वह योगमाया से होता है, संसार के कल्याण के लिए। ||4:06||
शलोक # 7
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ||
yadā yadā hi dharmasya glānirbhavati bhārata.
abhyutthānamadharmasya tadā||tmānaṅ sṛjāmyaham||4:7||
भावार्थ: हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप में प्रकट होता हूँ।
🌸 यह श्रीकृष्ण का दिव्य वचन है-जब भी संसार में संतुलन बिगड़ता है, ईश्वर स्वयं आते हैं। ||4:07||
शलोक # 8
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||
paritrāṇāya sādhūnāṅ vināśāya ca duṣkṛtām.
dharmasaṅsthāpanārthāya saṅbhavāmi yugē yugē||4:8||
भावार्थ: साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
🌟 यह श्लोक गीता का हृदय है-ईश्वर का अवतार केवल लीला नहीं, कर्तव्य है। ||4:08||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को यह दिखाने वाले हैं कि जो उनके जन्म और कर्म को दिव्य जानता है, वह जन्म-मरण से मुक्त हो जाता है। अब गीता ज्ञान और भक्ति के अद्वितीय संगम की ओर प्रवाहित होने वाली है। 📿✨
शलोक # 9
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ||
janma karma ca mē divyamēvaṅ yō vētti tattvataḥ.
tyaktvā dēhaṅ punarjanma naiti māmēti sō.rjuna||4:9||
भावार्थ: हे अर्जुन! जो मेरे जन्म और कर्म की दिव्यता को तत्त्व से जानता है, वह शरीर त्यागने के बाद पुनः जन्म नहीं लेता, बल्कि मुझे ही प्राप्त होता है।
🌿 यह श्लोक मोक्ष का वचन है-जो श्रीकृष्ण की लीलाओं को दिव्य जानता है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। ||4:09||
शलोक # 10
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ||
vītarāgabhayakrōdhā manmayā māmupāśritāḥ.
bahavō jñānatapasā pūtā madbhāvamāgatāḥ||4:10||
भावार्थ: जिनके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, जो मुझमें लीन हैं और मेरे शरणागत हैं-ऐसे अनेक भक्त ज्ञानरूपी तप से शुद्ध होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।
🌺 यह श्लोक बताता है कि भक्ति, ज्ञान और समर्पण से ही परम की प्राप्ति होती है। ||4:10||
शलोक # 11
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ||
yē yathā māṅ prapadyantē tāṅstathaiva bhajāmyaham.
mama vartmānuvartantē manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ||4:11||
भावार्थ: हे पार्थ! जो भक्त मुझे जिस भाव से भजते हैं, मैं भी उन्हें उसी भाव से प्राप्त होता हूँ। सभी मनुष्य मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
🌼 यह श्लोक श्रीकृष्ण की करुणा का प्रतीक है-वे हर भक्त को उसके भाव के अनुसार अपनाते हैं। ||4:11||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म, भक्ति और ज्ञान के उस दिव्य संगम की ओर ले जा रहे हैं जहाँ हर मार्ग अंततः उन्हीं तक पहुँचता है। अब गीता कर्म की सिद्धि और ब्रह्म की प्राप्ति के रहस्य को खोलने वाली है। 📿✨
शलोक # 12
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ||
kāṅkṣantaḥ karmaṇāṅ siddhiṅ yajanta iha dēvatāḥ.
kṣipraṅ hi mānuṣē lōkē siddhirbhavati karmajā||4:12||
भावार्थ: जो लोग कर्मों की सिद्धि चाहते हैं, वे देवताओं की पूजा करते हैं, क्योंकि इस मनुष्य लोक में कर्मों से प्राप्त होने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है।
🌿 यह श्लोक बताता है कि सकाम कर्म करने वाले लोग तात्कालिक फल के लिए देवताओं की शरण लेते हैं-परंतु यह मार्ग स्थायी मुक्ति नहीं देता। ||4:12||
शलोक # 13
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम् ||
cāturvarṇyaṅ mayā sṛṣṭaṅ guṇakarmavibhāgaśaḥ.
tasya kartāramapi māṅ viddhyakartāramavyayam||4:13||
भावार्थ: चारों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) को गुण और कर्म के आधार पर मैंने रचा है। यद्यपि मैं इसका कर्ता हूँ, फिर भी जानो कि मैं अकर्ता और अविनाशी हूँ।
🌺 यह श्लोक कर्म और स्वभाव के अनुसार समाज की रचना को दर्शाता है-जहाँ ईश्वर सृष्टिकर्ता होकर भी कर्म से परे हैं। ||4:13||
शलोक # 14
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ||
na māṅ karmāṇi limpanti na mē karmaphalē spṛhā.
iti māṅ yō.bhijānāti karmabhirna sa badhyatē||4:14||
भावार्थ: मुझे कर्म लिप्त नहीं करते, न ही मुझे कर्मफल की इच्छा है। जो मुझे इस प्रकार जानता है, वह भी कर्मों से नहीं बंधता।
🌼 यह श्लोक सिखाता है कि जब हम ईश्वर की तरह कर्मफल की आसक्ति छोड़ देते हैं, तब कर्म हमें बाँधते नहीं-बल्कि मुक्त करते हैं। ||4:14||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञानयुक्त कर्म और कर्म में अकर्म के उस रहस्य की ओर ले जा रहे हैं जहाँ साधक कर्म करता हुआ भी मुक्त रहता है। अब गीता ज्ञान की अग्नि से कर्मों के दहन की ओर बढ़ रही है। 📿✨
शलोक # 15
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ||
ēvaṅ jñātvā kṛtaṅ karma pūrvairapi mumukṣubhiḥ.
kuru karmaiva tasmāttvaṅ pūrvaiḥ pūrvataraṅ kṛtam||4:15||
भावार्थ: इस प्रकार जानकर ही प्राचीन मुमुक्षु (मोक्ष चाहने वाले) पुरुषों ने कर्म किया। इसलिए तू भी पूर्वजों के समान कर्म कर।
🌿 यह श्लोक प्रेरणा देता है-ज्ञानयुक्त कर्म ही मोक्ष का मार्ग है, और यही परंपरा ऋषियों की रही है। ||4:15||
शलोक # 16
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्||
kiṅ karma kimakarmēti kavayō.pyatra mōhitāḥ.
tattē karma pravakṣyāmi yajjñātvā mōkṣyasē.śubhāt||4:16||
भावार्थ: कर्म क्या है और अकर्म क्या है-इसमें बुद्धिमान भी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुझे वह कर्म बताऊँगा जिसे जानकर तू अशुभ (बंधन) से मुक्त हो जाएगा।
🌺 यह श्लोक कर्म के गूढ़ रहस्य की भूमिका है-जहाँ श्रीकृष्ण अब कर्म, अकर्म और विकर्म का भेद स्पष्ट करेंगे। ||4:16||
शलोक # 17
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ||
karmaṇō hyapi bōddhavyaṅ bōddhavyaṅ ca vikarmaṇaḥ.
akarmaṇaśca bōddhavyaṅ gahanā karmaṇō gatiḥ||4:17||
भावार्थ: कर्म का स्वरूप जानना चाहिए, विकर्म (वर्जित कर्म) का भी और अकर्म (कर्म में निष्क्रियता) का भी-क्योंकि कर्म की गति अत्यंत गूढ़ है।
🌼 यह श्लोक चेतावनी है-केवल कर्म करना पर्याप्त नहीं, उसे समझना भी आवश्यक है। ||4:17||
शलोक # 18
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ||
karmaṇyakarma yaḥ paśyēdakarmaṇi ca karma yaḥ.
sa buddhimān manuṣyēṣu sa yuktaḥ kṛtsnakarmakṛt||4:18||
भावार्थ: जो व्यक्ति कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म को देखता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है और वही समस्त कर्मों को करने वाला (योगी) है।
🌸 यह श्लोक योग की दृष्टि है-जहाँ साधक कर्म करता हुआ भी भीतर से निष्क्रिय और शांत रहता है। ||4:18||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञान की अग्नि से कर्मों के दहन और निष्काम कर्म की उस दिव्यता की ओर ले जा रहे हैं जहाँ कर्तापन भी जलकर भस्म हो जाता है। अब गीता पूर्ण ज्ञानयुक्त कर्म की ओर प्रवाहित होने वाली है। 📿✨
शलोक # 19
कर्म में अकर्मता-भाव, नैराश्य-सुख, यज्ञ की व्याख्या
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः ||
yasya sarvē samārambhāḥ kāmasaṅkalpavarjitāḥ.
jñānāgnidagdhakarmāṇaṅ tamāhuḥ paṇḍitaṅ budhāḥ||4:19||
भावार्थ: जिसके सभी कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं, और जिसके कर्म ज्ञान रूपी अग्नि से भस्म हो चुके हैं-उसे ज्ञानीजन सच्चा पंडित कहते हैं।
🌿 यह श्लोक आत्मज्ञानी की पहचान है-वह कर्म करता है, परंतु उसमें कोई आसक्ति नहीं होती। ||4:19||
शलोक # 20
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः ||
tyaktvā karmaphalāsaṅgaṅ nityatṛptō nirāśrayaḥ.
karmaṇyabhipravṛttō.pi naiva kiñcitkarōti saḥ||4:20||
भावार्थ: जो व्यक्ति कर्मफल की आसक्ति को त्यागकर सदा आत्मा में तृप्त रहता है और किसी पर निर्भर नहीं होता-वह कर्म करता हुआ भी वास्तव में कुछ नहीं करता।
🌺 यह श्लोक निष्काम कर्मयोग का सार है-जहाँ कर्म तो होता है, पर कर्तापन नहीं। ||4:20||
शलोक # 21
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ||
nirāśīryatacittātmā tyaktasarvaparigrahaḥ.
śārīraṅ kēvalaṅ karma kurvannāpnōti kilbiṣam||4:21||
भावार्थ: जिसकी इच्छाएँ शांत हैं, मन और आत्मा संयमित हैं, और जिसने सभी भौतिक संग्रहों का त्याग कर दिया है-वह केवल शरीर निर्वाह के लिए कर्म करता है और पाप से मुक्त रहता है।
🌼 यह श्लोक सिखाता है कि जब जीवन केवल सेवा और संतुलन बन जाए, तब कर्म बंधन नहीं बनता। ||4:21||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को संतोष, समत्व और आत्मनिष्ठा के उस दिव्य पथ पर ले जा रहे हैं जहाँ कर्म करते हुए भी आत्मा मुक्त रहती है। अब गीता पूर्ण आत्मतृप्त योगी की झलक देने वाली है। 📿✨
शलोक # 22
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ||
yadṛcchālābhasantuṣṭō dvandvātītō vimatsaraḥ.
samaḥ siddhāvasiddhau ca kṛtvāpi na nibadhyatē||4:22||
भावार्थ: जो व्यक्ति संयोग से प्राप्त वस्तुओं में संतुष्ट रहता है, द्वंद्वों (सुख-दुख, लाभ-हानि) से परे है, ईर्ष्या से रहित है, और सफलता-असफलता में सम रहता है-वह कर्म करता हुआ भी बंधता नहीं।
🌿 यह श्लोक सिखाता है कि जब मन समत्व में स्थित हो, तब कर्म बंधन नहीं बनता-बल्कि साधना बन जाता है। ||4:22||
शलोक # 23
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ||
gatasaṅgasya muktasya jñānāvasthitacētasaḥ.
yajñāyācarataḥ karma samagraṅ pravilīyatē||4:23||
भावार्थ: जिसकी आसक्ति समाप्त हो गई है, जो मुक्त है, और जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है-ऐसे व्यक्ति के यज्ञरूप कर्म पूर्णतः विलीन हो जाते हैं।
🌺 यहाँ कर्म का अंत नहीं, उसका रूपांतरण है-जब कर्म यज्ञ बन जाए, तब वह आत्मा को बाँधता नहीं, बल्कि मुक्त करता है। ||4:23||
शलोक # 24
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्रौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ||
brahmārpaṇaṅ brahmahavirbrahmāgnau brahmaṇā hutam.
brahmaiva tēna gantavyaṅ brahmakarmasamādhinā||4:24||
भावार्थ: जो अर्पण है वह ब्रह्म है, जो आहुति है वह ब्रह्म है, जो अग्नि है वह ब्रह्म है, और जो हवन करता है वह भी ब्रह्म है-ऐसे ब्रह्म में स्थित व्यक्ति को ब्रह्म ही प्राप्त होता है।
🌸 यह श्लोक अद्वैत की पराकाष्ठा है-जहाँ साधक, साधन और साध्य-all merge into the One. ||4:24||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को विभिन्न प्रकार के यज्ञों की ओर ले जा रहे हैं-जहाँ ज्ञान, तप, सेवा और ध्यान सभी यज्ञ बन जाते हैं। अब गीता यज्ञ की विविधता और ज्ञान की महिमा को प्रकट करने वाली है। 📿✨
शलोक # 25
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ||
daivamēvāparē yajñaṅ yōginaḥ paryupāsatē.
brahmāgnāvaparē yajñaṅ yajñēnaivōpajuhvati||4:25||
भावार्थ: कुछ योगी देवताओं की पूजा को यज्ञ मानकर करते हैं, जबकि अन्य ब्रह्मरूप अग्नि में आत्मार्पण रूप यज्ञ करते हैं।
🌿 यह श्लोक दर्शाता है कि यज्ञ केवल बाह्य क्रिया नहीं-यह भीतर की भावना और समर्पण है। ||4:25||
शलोक # 26
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ||
śrōtrādīnīndriyāṇyanyē saṅyamāgniṣu juhvati.
śabdādīnviṣayānanya indriyāgniṣu juhvati||4:26||
भावार्थ: कुछ योगी इंद्रियों को संयम की अग्नि में अर्पित करते हैं, और कुछ इंद्रिय विषयों को इंद्रियों की अग्नि में अर्पित करते हैं।
🌺 यह आत्मसंयम का यज्ञ है-जहाँ साधक विषयों को त्यागकर भीतर की शुद्धि करता है। ||4:26||
शलोक # 27
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ||
sarvāṇīndriyakarmāṇi prāṇakarmāṇi cāparē.
ātmasaṅyamayōgāgnau juhvati jñānadīpitē||4:27||
भावार्थ: कुछ योगी सभी इंद्रिय और प्राण क्रियाओं को आत्मसंयम रूपी योग की अग्नि में अर्पित करते हैं, जो ज्ञान से प्रकाशित होती है।
🌼 यह श्लोक बताता है कि जब साधक ज्ञान और संयम से युक्त होता है, तब उसका हर कर्म यज्ञ बन जाता है। ||4:27||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को प्राणायाम, तप, स्वाध्याय और ज्ञान के उन यज्ञों की ओर ले जा रहे हैं जो भीतर की अग्नि को प्रज्वलित करते हैं। अब गीता आत्मशुद्धि और ज्ञानयज्ञ की ओर प्रवाहित होने वाली है। 📿✨
शलोक # 28
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ||
dravyayajñāstapōyajñā yōgayajñāstathāparē.
svādhyāyajñānayajñāśca yatayaḥ saṅśitavratāḥ||4:28||
भावार्थ: कुछ योगी द्रव्य (संपत्ति) का यज्ञ करते हैं, कुछ तपस्या का, कुछ योग का, और कुछ स्वाध्याय (शास्त्रों के अध्ययन) और ज्ञान का यज्ञ करते हैं-ये सभी संयमित व्रतों वाले साधक होते हैं।
🌿 यह श्लोक दर्शाता है कि यज्ञ केवल अग्नि में आहुति नहीं-बल्कि हर वह साधना है जो समर्पण और संयम से की जाए। ||4:28||
शलोक # 29
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ||
apānē juhvati prāṇa prāṇē.pānaṅ tathā.parē.
prāṇāpānagatī ruddhvā prāṇāyāmaparāyaṇāḥ||4:29||
भावार्थ: कुछ योगी अपान में प्राण और प्राण में अपान की आहुति देते हैं, और कुछ प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणायाम में लीन रहते हैं।
🌺 यह श्लोक प्राणायाम को यज्ञ के रूप में प्रस्तुत करता है-जहाँ श्वास भी साधना बन जाती है। ||4:29||
शलोक # 30
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ||
aparē niyatāhārāḥ prāṇānprāṇēṣu juhvati.
sarvē.pyētē yajñavidō yajñakṣapitakalmaṣāḥ||4:30||
भावार्थ: कुछ योगी नियत आहार के द्वारा प्राणों को प्राणों में ही अर्पित करते हैं। ये सभी यज्ञ को जानने वाले हैं और यज्ञ के द्वारा उनके पाप नष्ट हो जाते हैं।
🌼 यह श्लोक बताता है कि संयमित जीवन ही यज्ञमय जीवन है-जहाँ हर श्वास, हर आहार, हर विचार पवित्र हो जाता है। ||4:30||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को यज्ञ के अमृतफल और ज्ञान की महिमा की ओर ले जा रहे हैं-जहाँ साधक अज्ञान के अंधकार से निकलकर आत्मप्रकाश में प्रवेश करता है। अब गीता ज्ञानयज्ञ और आत्मशुद्धि की दिव्यता को प्रकट करने वाली है। 📿✨
शलोक # 31
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ||
yajñaśiṣṭāmṛtabhujō yānti brahma sanātanam.
nāyaṅ lōkō.styayajñasya kutō.nyaḥ kurusattama||4:31||
भावार्थ: जो यज्ञ के अवशेष रूपी अमृत का पान करते हैं, वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ! जो यज्ञ नहीं करता, उसके लिए न तो यह लोक है और न ही परलोक।
🌿 यह श्लोक बताता है कि यज्ञमय जीवन ही सच्चा जीवन है-जहाँ हर कर्म समर्पण बन जाए। ||4:31||
शलोक # 32
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ||
ēvaṅ bahuvidhā yajñā vitatā brahmaṇō mukhē.
karmajānviddhi tānsarvānēvaṅ jñātvā vimōkṣyasē||4:32||
भावार्थ: इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ ब्रह्म के मुख से प्रकट हुए हैं। इन सभी को कर्मजन्य जानो, और इस ज्ञान से तुम बंधनों से मुक्त हो जाओगे।
🌺 यह श्लोक दर्शाता है कि हर साधना-यदि समर्पण से की जाए-तो वह यज्ञ बन जाती है। ||4:32||
शलोक # 33
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ||
śrēyāndravyamayādyajñājjñānayajñaḥ parantapa.
sarvaṅ karmākhilaṅ pārtha jñānē parisamāpyatē||4:33||
भावार्थ: हे परन्तप! द्रव्य से किए गए यज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि हे पार्थ! सभी कर्म अंततः ज्ञान में ही समाप्त हो जाते हैं।
🌼 यह श्लोक ज्ञान की सर्वोच्चता को दर्शाता है-जहाँ ज्ञान ही अंतिम मुक्ति का द्वार है। ||4:33||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को सच्चे गुरु से ज्ञान प्राप्त करने और संदेह रूपी अंधकार को काटने की प्रेरणा देने वाले हैं। अब गीता श्रद्धा, सेवा और आत्मप्रकाश की ओर प्रवाहित होने वाली है। 📿✨
शलोक # 34
ज्ञान की महिमा तथा अर्जुन को कर्म करने की प्रेरणा
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः ||
tadviddhi praṇipātēna paripraśnēna sēvayā.
upadēkṣyanti tē jñānaṅ jñāninastattvadarśinaḥ||4:34||
भावार्थ: उस ज्ञान को तू विनम्रता, जिज्ञासा और सेवा के द्वारा जान। जो तत्वदर्शी ज्ञानीजन हैं, वे तुझे वह ज्ञान प्रदान करेंगे।
🌿 यह श्लोक गुरु-शिष्य परंपरा की आत्मा है-जहाँ श्रद्धा और सेवा से ही सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है। ||4:34||
शलोक # 35
येन भुतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ||
yajjñātvā na punarmōhamēvaṅ yāsyasi pāṇḍava.
yēna bhūtānyaśēṣēṇa drakṣyasyātmanyathō mayi||4:35||
भावार्थ: उस ज्ञान को जानकर, हे पाण्डव! तू फिर कभी मोह को प्राप्त नहीं होगा, और तू सभी प्राणियों को अपने और मुझमें स्थित देखेगा।
🌺 यह श्लोक आत्मदर्शन की पराकाष्ठा है-जहाँ साधक को सबमें ईश्वर और स्वयं में ब्रह्म का अनुभव होता है। ||4:35||
शलोक # 36
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ||
api cēdasi pāpēbhyaḥ sarvēbhyaḥ pāpakṛttamaḥ.
sarvaṅ jñānaplavēnaiva vṛjinaṅ santariṣyasi||4:36||
भावार्थ: यदि तू सबसे बड़ा पापी भी हो, तो भी ज्ञान रूपी नौका से तू सभी पापों के समुद्र को पार कर जाएगा।
🌼 यह श्लोक श्रीकृष्ण की करुणा का प्रतीक है-ज्ञान से कोई भी साधक मुक्त हो सकता है, चाहे वह कितना भी गिरा हुआ क्यों न हो। ||4:36||
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञान की अग्नि, श्रद्धा की शक्ति और संदेह के विनाश की ओर ले जा रहे हैं-जहाँ साधक पूर्ण आत्मप्रकाश में स्थित हो जाता है। अब गीता ज्ञान की अग्नि से कर्मों के दहन और कर्तव्य में स्थित होने की अंतिम प्रेरणा देने वाली है। 📿✨
शलोक # 37
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ||
yathaidhāṅsi samiddhō.gnirbhasmasātkurutē.rjuna.
jñānāgniḥ sarvakarmāṇi bhasmasātkurutē tathā||4:37||
भावार्थ: जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान रूपी अग्नि सभी कर्मों को भस्म कर देती है।
🌿 यह श्लोक ज्ञान की शक्ति को दर्शाता है-जहाँ सच्चा ज्ञान कर्मों के बंधन को जला देता है। ||4:37||
शलोक # 38
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ||
na hi jñānēna sadṛśaṅ pavitramiha vidyatē.
tatsvayaṅ yōgasaṅsiddhaḥ kālēnātmani vindati||4:38||
भावार्थ: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है। जो योग में सिद्ध होता है, वह समय के साथ उस ज्ञान को अपने भीतर स्वयं प्राप्त करता है।
🌺 यह श्लोक बताता है कि ज्ञान कोई बाहरी वस्तु नहीं-वह भीतर से प्रकट होता है, साधना से। ||4:38||
शलोक # 39
ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ||
śraddhāvāōllabhatē jñānaṅ tatparaḥ saṅyatēndriyaḥ.
jñānaṅ labdhvā parāṅ śāntimacirēṇādhigacchati||4:39||
भावार्थ: श्रद्धावान, इंद्रियों को वश में रखने वाला और साधना में तत्पर व्यक्ति ज्ञान को प्राप्त करता है। और ज्ञान प्राप्त कर वह शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त करता है।
🌼 यह श्लोक श्रद्धा, संयम और समर्पण की त्रिवेणी है-जो साधक को आत्मशांति की ओर ले जाती है। ||4:39||
शलोक # 40
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ||
ajñaścāśraddadhānaśca saṅśayātmā vinaśyati.
nāyaṅ lōkō.sti na parō na sukhaṅ saṅśayātmanaḥ||4:40||
भावार्थ: जो अज्ञानी है, जिसमें श्रद्धा नहीं है और जो संदेह से भरा है-वह न इस लोक में सुख पाता है, न परलोक में।
🌸 यह श्लोक चेतावनी है-संदेह आत्मा का शत्रु है, श्रद्धा ही उसका प्रकाश है। ||4:40||
शलोक # 41
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ||
yōgasaṅnyastakarmāṇaṅ jñānasaṅchinnasaṅśayam.
ātmavantaṅ na karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya||4:41||
भावार्थ: हे धनंजय! जिसने योग के द्वारा कर्मों का त्याग किया है, और ज्ञान से संदेह को काट दिया है-ऐसे आत्मस्थित पुरुष को कर्म बाँध नहीं सकते।
🌟 यह श्लोक आत्मविजयी साधक की महिमा है-जो कर्म करता है, पर बंधता नहीं। ||4:41||
शलोक # 42
छित्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ||
tasmādajñānasaṅbhūtaṅ hṛtsthaṅ jñānāsinā||tmanaḥ.
chittvainaṅ saṅśayaṅ yōgamātiṣṭhōttiṣṭha bhārata||4:42||
भावार्थ: इसलिए, हे भारत! अपने हृदय में स्थित अज्ञान से उत्पन्न संदेह को ज्ञान रूपी तलवार से काट डाल और योग में स्थित होकर उठ-कर्तव्य के लिए।
🗡️ यह श्लोक गीता का आह्वान है-उठो, जागो, और कर्म में स्थित हो जाओ। ||4:42||
🌺 इस प्रकार अध्याय 4 - "ज्ञान कर्म संन्यास योग" पूर्ण होता है। यह केवल ज्ञान का उपदेश नहीं, बल्कि कर्तव्य, समर्पण और आत्मप्रकाश का दिव्य संगम है।
🧘 Conclusion (निष्कर्ष)
अध्याय 4 हमें यह सिखाता है कि ज्ञान और कर्म दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। ईश्वर में आस्था, गुरु से ज्ञान प्राप्ति और निःस्वार्थ कर्म - यह तीनों मिलकर मोक्ष की दिशा में हमें अग्रसर करते हैं।
इस अध्याय की गहराई हमें जीवन, आत्मा और ब्रह्मज्ञान को समझने का सशक्त माध्यम देती है। भगवद गीता का यह अध्याय भक्त, साधक और सामान्य पाठक - सभी के लिए उतना ही उपयोगी है।
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❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
भगवद गीता अध्याय 4 को क्या कहा जाता है?
इस अध्याय को ज्ञान कर्म संन्यास योग कहा जाता है, जिसमें ज्ञान, कर्म और त्याग का समन्वय बताया गया है।
इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य है - दिव्य ज्ञान द्वारा आत्मा की पहचान करना और कर्म को ईश्वर को समर्पित करना।
क्या केवल ज्ञान से मोक्ष संभव है?
ज्ञान आवश्यक है, लेकिन निःस्वार्थ कर्म और भक्ति के साथ मिलकर ही पूर्णता प्राप्त होती है।
इस अध्याय में श्रीकृष्ण कौन-सा रहस्य प्रकट करते हैं?
श्रीकृष्ण बताते हैं कि उन्होंने यह ज्ञान सूर्यदेव को दिया था और वे स्वयं हर युग में धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं।
क्या मैं सभी अध्याय एक ही स्थान पर देख सकता हूँ?
हाँ, सभी अध्याय यहाँ एकत्रित हैं, जहाँ से आप एक-एक अध्याय पढ़ सकते हैं।
