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दाहिनी ओर रथ पर सवार होकर अर्जुन को सलाह देते हुए भगवान कृष्ण का चित्रण और बायीं ओर 'भगवद गीता | अध्याय 6 | ध्यान योग श्लोक व अर्थ सहित' लिखा हुआ है।

भगवद गीता - अध्याय 6
ध्यान योग - श्लोक व हिंदी अर्थ सहित

🧡 Introduction (परिचय)

श्रीमद भगवद गीता का छठा अध्याय ध्यान योग कहलाता है। इसमें ध्यान (Meditation) को आत्म-संयम और मोक्ष का साधन बताया गया है। श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि एक सच्चा योगी कर्म करता है लेकिन फल की इच्छा नहीं रखता और अंत में अपने मन को स्थिर करके परमात्मा में लीन हो जाता है।

इस अध्याय में यह बताया गया है कि ध्यान द्वारा आत्मा की एकाग्रता ही आत्म-साक्षात्कार की कुंजी है। एकाग्र और शांत मन वाला साधक ही सच्चा योगी होता है। अध्याय 6 साधना करने वालों, साधकों और योगियों के लिए अत्यंत आवश्यक है।

यदि आपने अध्याय 5 - संन्यास योग नहीं पढ़ा है, तो पहले उसे अवश्य पढ़ें। सभी अध्यायों की सूची यहाँ देखें - श्रीमद भगवद गीता हिंदी में


श्लोक और हिंदी भावार्थ

👇 नीचे अध्याय 6 के सभी श्लोक जोड़ें संस्कृत, लिप्यंतरण और अर्थ सहित:

अध्याय 6 - ध्यान योग में,- जहाँ श्रीकृष्ण ध्यान, आत्मसंयम और योगी की स्थिति का दिव्य रहस्य प्रकट करते हैं। यह अध्याय मन की चंचलता पर विजय, ध्यान की विधि, और योगी की श्रेष्ठता को उजागर करता है।


अध्याय # 6
शलोक # 1
कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ के लक्षण, काम-संकल्प-त्याग का महत्व

श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ||

śrī bhagavānuvāca
anāśritaḥ karmaphalaṅ kāryaṅ karma karōti yaḥ.
sa saṅnyāsī ca yōgī ca na niragnirna cākriyaḥ||6.1||

भावार्थ: जो व्यक्ति कर्मफल की आशा न रखते हुए अपने कर्तव्य का पालन करता है, वही सच्चा संन्यासी और योगी है-न कि वह जो केवल अग्नि और कर्म का त्याग करता है।

🌿 यह श्लोक बताता है कि त्याग का अर्थ कर्म से भागना नहीं, बल्कि फल की आसक्ति से मुक्त होना है। ||6:01||

अध्याय # 6
शलोक # 2
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ||

yaṅ saṅnyāsamiti prāhuryōgaṅ taṅ viddhi pāṇḍava.
na hyasaṅnyastasaṅkalpō yōgī bhavati kaścana||6.2||

भावार्थ: हे पाण्डव! जिसे संन्यास कहते हैं, वही योग है। जो व्यक्ति इच्छाओं और संकल्पों का त्याग नहीं करता, वह योगी नहीं हो सकता।

🌺 यह श्लोक सिखाता है कि योग केवल आसन नहीं-यह भीतर की वासनाओं का त्याग है। ||6:02||
अध्याय # 6
शलोक # 3
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ||

ārurukṣōrmunēryōgaṅ karma kāraṇamucyatē.
yōgārūḍhasya tasyaiva śamaḥ kāraṇamucyatē||6.3||

भावार्थ: जो मुनि योग की ओर अग्रसर है, उसके लिए कर्म साधन है; और जो योग में स्थित हो गया है, उसके लिए शांति और संकल्पों का त्याग ही साधन है।

🌼 यह श्लोक साधना की दो अवस्थाओं को दर्शाता है-पहले कर्म से आरंभ, फिर शांति में स्थित होना। ||6:03||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को योगारूढ़ साधक की पहचान और मन की विजय के उस मार्ग पर ले जा रहे हैं जहाँ साधक स्वयं को स्वयं से उठाता है। अब गीता आत्मसंयम और ध्यान की विधि को प्रकट करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 6
शलोक # 4
अध्याय 6 - ध्यान योग के श्लोक 6.4 से 6.24 - जहाँ श्रीकृष्ण योगारूढ़ साधक, मन की विजय, ध्यान की विधि, और आत्मिक आनंद का रहस्य प्रकट करते हैं।

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते ||

yadā hi nēndriyārthēṣu na karmasvanuṣajjatē.
sarvasaṅkalpasaṅnyāsī yōgārūḍhastadōcyatē||6.4||

भावार्थ: जब साधक न तो इंद्रिय विषयों में आसक्त होता है, न ही कर्मों में-और सभी संकल्पों का त्याग कर देता है-तब वह योगारूढ़ कहलाता है।

🌿 यह श्लोक योग की परिपक्व अवस्था को दर्शाता है-जहाँ भीतर की वासनाएँ शांत हो जाती हैं। ||6:04||

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अध्याय # 6
शलोक # 5
आत्म-उद्धार की प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण एवं एकांत साधना का महत्व
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ||

uddharēdātmanā||tmānaṅ nātmānamavasādayēt.
ātmaiva hyātmanō bandhurātmaiva ripurātmanaḥ||6.5||

भावार्थ: अपने विवेकयुक्त मन से स्वयं का उद्धार करे, और स्वयं को गिरने न दे-क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।

🌺 यह श्लोक आत्मनिर्भरता का आह्वान है-जहाँ साधक स्वयं को ऊपर उठाता है। ||6:05||
अध्याय # 6
शलोक # 6
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ||

bandhurātmā||tmanastasya yēnātmaivātmanā jitaḥ.
anātmanastu śatrutvē vartētātmaiva śatruvat||6.6||

भावार्थ: जिसने अपने मन को जीत लिया है, वह स्वयं का मित्र है; और जिसने मन को नहीं जीता, वह स्वयं का शत्रु बन जाता है।

🌼 यह श्लोक आत्मसंयम की निर्णायक भूमिका को दर्शाता है। ||6:06||
अध्याय # 6
शलोक # 7
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ||

jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ.
śītōṣṇasukhaduḥkhēṣu tathā mānāpamānayōḥ||6.7||

भावार्थ: जिसने आत्मा को जीत लिया है और शांत चित्त वाला है, वह परमात्मा में स्थित रहता है-सर्दी-गर्मी, सुख-दुख, मान-अपमान में समभाव से।

🌸 यह श्लोक समत्व की महिमा है-जहाँ साधक स्थितप्रज्ञ बन जाता है। ||6:07||
अध्याय # 6
शलोक # 8
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः ||

jñānavijñānatṛptātmā kūṭasthō vijitēndriyaḥ.
yukta ityucyatē yōgī samalōṣṭāśmakāñcanaḥ||6.8||

भावार्थ: जो ज्ञान और आत्मानुभव से तृप्त है, इंद्रियों को जीत चुका है, और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना समान हैं-वह सच्चा योगी है।

🌟 यह श्लोक दर्शाता है कि सच्चा योगी बाह्य भेदभाव से परे होता है। ||6:08||
अध्याय # 6
शलोक # 9
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ||

suhṛnmitrāryudāsīnamadhyasthadvēṣyabandhuṣu.
sādhuṣvapi ca pāpēṣu samabuddhirviśiṣyatē||6.9||

भावार्थ: जो सुहृद, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी, बंधु, सज्जन और पापियों में भी समदृष्टि रखता है-वह श्रेष्ठ योगी है।

🌿 यह श्लोक समदृष्टि की पराकाष्ठा है-जहाँ साधक सबमें आत्मा को देखता है। ||6:09||
अध्याय # 6
शलोक # 10
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ||

yōgī yuñjīta satatamātmānaṅ rahasi sthitaḥ.
ēkākī yatacittātmā nirāśīraparigrahaḥ||6.10||

भावार्थ: योगी एकांत में, अकेले, मन और आत्मा को संयमित कर, आशा और संग्रह से रहित होकर निरंतर आत्मा में स्थित रहे।

🌺 यह श्लोक ध्यान की तैयारी का मार्गदर्शन है-जहाँ साधक भीतर की यात्रा शुरू करता है। ||6:10||
अध्याय # 6
शलोक # 11
आसन विधि, परमात्मा का ध्यान, योगी के चार प्रकार

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ||

śucau dēśē pratiṣṭhāpya sthiramāsanamātmanaḥ.
nātyucchritaṅ nātinīcaṅ cailājinakuśōttaram||6.11||
अध्याय # 6
शलोक # 12
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ||

tatraikāgraṅ manaḥ kṛtvā yatacittēndriyakriyaḥ.
upaviśyāsanē yuñjyādyōgamātmaviśuddhayē||6.12||

भावार्थ: पवित्र स्थान में, कुश, मृगचर्म और वस्त्र से बना न अधिक ऊँचा न नीचा आसन बिछाकर, मन को एकाग्र कर, इंद्रियों को वश में रखकर योगी आत्मशुद्धि के लिए ध्यान करे।

🌼 यह श्लोक ध्यान की विधि का प्रारंभ है-जहाँ साधक बाह्य व्यवस्था से भीतर की स्थिरता की ओर बढ़ता है। ||6:11 - 6:12||
अध्याय # 6
शलोक # 13
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ||

samaṅ kāyaśirōgrīvaṅ dhārayannacalaṅ sthiraḥ.
saṅprēkṣya nāsikāgraṅ svaṅ diśaścānavalōkayan||6.13||
अध्याय # 6
शलोक # 14
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ||

praśāntātmā vigatabhīrbrahmacārivratē sthitaḥ.
manaḥ saṅyamya maccittō yukta āsīta matparaḥ||6.14||

भावार्थ: शरीर, सिर और गले को सीधा और स्थिर रखकर, दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर टिकाकर, शांत, भय रहित, ब्रह्मचर्य में स्थित योगी मन को संयमित कर मुझमें चित्त लगाए।

🌸 यह श्लोक ध्यान की अंतःस्थिति को दर्शाता है-जहाँ साधक भीतर ईश्वर में लीन होता है। ||6:13 - 6:14||
अध्याय # 6
शलोक # 15
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ||

yuñjannēvaṅ sadā||tmānaṅ yōgī niyatamānasaḥ.
śāntiṅ nirvāṇaparamāṅ matsaṅsthāmadhigacchati||6.15||

भावार्थ: इस प्रकार मन को संयमित कर, निरंतर आत्मा में स्थित योगी परम शांति को प्राप्त करता है-जो मेरी स्थिति है।

🌟 यह श्लोक ध्यान का फल है-जहाँ साधक मोक्षरूप शांति को प्राप्त करता है। ||6:15||
अध्याय # 6
शलोक # 16
विस्तार से ध्यान योग का विषय
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ||

nātyaśnatastu yōgō.sti na caikāntamanaśnataḥ.
na cātisvapnaśīlasya jāgratō naiva cārjuna||6.16||
अध्याय # 6
शलोक # 17
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ||

yuktāhāravihārasya yuktacēṣṭasya karmasu.
yuktasvapnāvabōdhasya yōgō bhavati duḥkhahā||6.17||

भावार्थ: हे अर्जुन! योग न तो अधिक खाने वाले का है, न ही उपवास करने वाले का; न अधिक सोने वाले का, न ही सदा जागने वाले का। योग वही सिद्ध होता है जो आहार, विहार, कर्म, निद्रा और जागरण में संतुलित है।

🌿 यह श्लोक संतुलन का संदेश है-जहाँ संयम ही साधना का आधार है। ||6:16 - 6:17||
अध्याय # 6
शलोक # 18
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ||

yadā viniyataṅ cittamātmanyēvāvatiṣṭhatē.
niḥspṛhaḥ sarvakāmēbhyō yukta ityucyatē tadā||6.18||
अध्याय # 6
शलोक # 19
यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ||

yathā dīpō nivātasthō nēṅgatē sōpamā smṛtā.
yōginō yatacittasya yuñjatō yōgamātmanaḥ||6.19||

भावार्थ: जब नियंत्रित मन आत्मा में स्थित हो जाता है और सभी कामनाओं से रहित हो जाता है, तब वह योगी कहलाता है। जैसे वायुरहित स्थान में दीपक की लौ अचल रहती है, वैसे ही योगी का चित्त आत्मा में स्थिर रहता है।

🌺 यह श्लोक ध्यान की स्थिरता की सुंदर उपमा है-दीपक की लौ की तरह अचल चित्त। ||6:18 - 6:19||
अध्याय # 6
शलोक # 20
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ||

yatrōparamatē cittaṅ niruddhaṅ yōgasēvayā.
yatra caivātmanā||tmānaṅ paśyannātmani tuṣyati||6.20||
अध्याय # 6
शलोक # 21
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ||

sukhamātyantikaṅ yattadbuddhigrāhyamatīndriyam.
vētti yatra na caivāyaṅ sthitaścalati tattvataḥ||6.21||

भावार्थ: नरक के ये तीन द्वार हैं-काम, क्रोध और लोभ। जो इनसे मुक्त हो जाता है, वह आत्मकल्याण के मार्ग पर चलता है और परमगति प्राप्त करता है।

🚪 यह मुक्ति का संकेत है-"इन तीन द्वारों को बंद करो, तो ब्रह्म का द्वार खुलेगा।" ||6:20 - 6:21||

अध्याय 6 - ध्यान योग के अगले श्लोकों की ओर बढ़ते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण ध्यान की चरम अवस्था, आत्मिक आनंद, और योगी की ब्रह्मस्थिति का रहस्य प्रकट करते हैं। यह वह मार्ग है जहाँ साधक मन की चंचलता को जीतकर परमात्मा में स्थित हो जाता है। अध्याय 6 - ध्यान योग के श्लोक 6.22 से 6.24 -जहाँ श्रीकृष्ण ध्यान की चरम अवस्था, अविचल आनंद, और वासनाओं के त्याग की दिव्यता को प्रकट करते हैं:
अध्याय # 6
शलोक # 22
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ||

yaṅ labdhvā cāparaṅ lābhaṅ manyatē nādhikaṅ tataḥ.
yasminsthitō na duḥkhēna guruṇāpi vicālyatē||6.22||

भावार्थ: जिस परम स्थिति को प्राप्त कर योगी यह मानता है कि इससे बढ़कर कोई लाभ नहीं है, और जिसमें स्थित होकर वह भारी से भारी दुःख से भी विचलित नहीं होता-वही ध्यान की पूर्णता है।

🌿 यह श्लोक आत्मिक आनंद की पराकाष्ठा है-जहाँ साधक भीतर की शांति में इतना स्थिर हो जाता है कि संसार का कोई दुःख उसे डिगा नहीं सकता। ||6:22||
अध्याय # 6
शलोक # 23
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ||

taṅ vidyād duḥkhasaṅyōgaviyōgaṅ yōgasaṅjñitam.
sa niścayēna yōktavyō yōgō.nirviṇṇacētasā||6.23||

भावार्थ: उस अवस्था को जानो जो दुःखों के संयोग से वियोग है-उसे ही योग कहते हैं। और वह योग दृढ़ निश्चय और उत्साहपूर्ण चित्त से निरंतर किया जाना चाहिए।

🌺 यह श्लोक बताता है कि योग केवल सुख की खोज नहीं-यह दुःख से ऊपर उठने की साधना है, जिसे धैर्य और श्रद्धा से करना होता है। ||6:23||
अध्याय # 6
शलोक # 24
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ||

saṅkalpaprabhavānkāmāṅstyaktvā sarvānaśēṣataḥ.
manasaivēndriyagrāmaṅ viniyamya samantataḥ||6.24||

भावार्थ: सभी संकल्पों से उत्पन्न कामनाओं को पूर्णतः त्यागकर, और मन से सभी इंद्रियों को चारों ओर से वश में करके-योगी ध्यान में स्थित होता है।

🌼 यह श्लोक ध्यान की तैयारी है-जहाँ साधक भीतर की वासनाओं को छोड़कर, इंद्रियों को संयमित कर आत्मा में स्थिर होता है। ||6:24||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को मन की चंचलता पर विजय और ध्यान में स्थिरता की ओर ले जा रहे हैं-जहाँ साधक ब्रह्म में लीन हो जाता है। अब गीता पूर्ण समाधि और योगी की महिमा को प्रकट करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 6
शलोक # 25
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ||

śanaiḥ śanairuparamēd buddhyā dhṛtigṛhītayā.
ātmasaṅsthaṅ manaḥ kṛtvā na kiñcidapi cintayēt||6.25||

भावार्थ: धैर्ययुक्त बुद्धि से धीरे-धीरे मन को शांत करता हुआ, उसे आत्मा में स्थित करे और फिर किसी भी विषय का चिंतन न करे।

🌿 यह श्लोक ध्यान की विधि है-जहाँ साधक धीरे-धीरे मन को भीतर खींचकर परमात्मा में स्थिर करता है। ||6:25||
अध्याय # 6
शलोक # 26
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ||

yatō yatō niścarati manaścañcalamasthiram.
tatastatō niyamyaitadātmanyēva vaśaṅ nayēt||6.26||

भावार्थ: यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटकता है, वहाँ-वहाँ से उसे नियंत्रित करके आत्मा में ही लाना चाहिए।

🌺 यह श्लोक सिखाता है कि ध्यान में मन भटके तो निराश न हों-हर बार उसे प्रेमपूर्वक वापस लाएँ। ||6:26||
अध्याय # 6
शलोक # 27
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ||

praśāntamanasaṅ hyēnaṅ yōginaṅ sukhamuttamam.
upaiti śāntarajasaṅ brahmabhūtamakalmaṣam||6.27||

भावार्थ: जिसका मन शांत हो गया है, जिसकी रजोगुण की प्रवृत्तियाँ शांत हो गई हैं, जो ब्रह्म में स्थित और पापरहित है-ऐसे योगी को परम सुख प्राप्त होता है।

🌼 यह श्लोक आत्मशुद्धि और ब्रह्मस्थिति की महिमा है-जहाँ साधक भीतर से निर्मल और शांत हो जाता है। ||6:27||

अब श्रीकृष्ण अर्जुन को सर्वत्र ब्रह्मदृष्टि, ईश्वर में एकत्व, और योगी की श्रेष्ठता की ओर ले जा रहे हैं-जहाँ साधक सभी में ईश्वर को देखता है और सर्वोच्च भक्ति को प्राप्त करता है। अब गीता योगी की महिमा और भक्ति की पूर्णता को प्रकट करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 6
शलोक # 28
हम अध्याय 6 - ध्यान योग के श्लोक 6.28 से 6.39 - जहाँ श्रीकृष्ण ध्यान की सिद्धि, समदृष्टि, योगी की महिमा, और भक्ति की श्रेष्ठता को प्रकट करते हैं:

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ||

yuñjannēvaṅ sadā||tmānaṅ yōgī vigatakalmaṣaḥ.
sukhēna brahmasaṅsparśamatyantaṅ sukhamaśnutē||6.28||

भावार्थ: इस प्रकार निरंतर योग में स्थित, पापों से शुद्ध हुआ योगी जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर परम निर्वाण को प्राप्त करता है।

🌿 यह श्लोक मोक्ष का वचन है-जहाँ साधक संसार के बंधनों से ऊपर उठकर परम शांति में लीन हो जाता है। ||6:28||
अध्याय # 6
शलोक # 29
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ||

sarvabhūtasthamātmānaṅ sarvabhūtāni cātmani.
īkṣatē yōgayuktātmā sarvatra samadarśanaḥ||6.29||

भावार्थ: योगयुक्त आत्मा वाला साधक सभी प्राणियों में आत्मा को और आत्मा में सभी प्राणियों को देखता है-वह समदृष्टि वाला होता है।

🌺 यह श्लोक अद्वैत की अनुभूति है-जहाँ साधक को सबमें वही एक ब्रह्म दिखाई देता है। ||6:29||
अध्याय # 6
शलोक # 30
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ||

yō māṅ paśyati sarvatra sarvaṅ ca mayi paśyati.
tasyāhaṅ na praṇaśyāmi sa ca mē na praṇaśyati||6.30||

भावार्थ: जो मुझे सबमें देखता है और सबको मुझमें देखता है-मैं उसके लिए अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता।

🌼 यह श्लोक ईश्वर से एकत्व की घोषणा है-जहाँ भक्त और भगवान एक हो जाते हैं। ||6:30||
अध्याय # 6
शलोक # 31
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ||

sarvabhūtasthitaṅ yō māṅ bhajatyēkatvamāsthitaḥ.
sarvathā vartamānō.pi sa yōgī mayi vartatē||6.31||

भावार्थ: जो योगी सभी प्राणियों में स्थित मुझको एकत्व से भजता है, वह सभी कर्मों में लगे हुए भी मुझमें ही स्थित रहता है।

🌸 यह श्लोक कर्म और भक्ति के अद्वितीय संगम को दर्शाता है। ||6:31||
अध्याय # 6
शलोक # 32
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ||

ātmaupamyēna sarvatra samaṅ paśyati yō.rjuna.
sukhaṅ vā yadi vā duḥkhaṅ saḥ yōgī paramō mataḥ||6.32||

भावार्थ: हे अर्जुन! जो योगी अपने समान सभी में सुख-दुख को देखता है, वह परम योगी है-ऐसा मेरा मत है।

🌟 यह श्लोक करुणा और समत्व की पराकाष्ठा है-जहाँ साधक सबके सुख-दुख को अपना मानता है। ||6:32||
अध्याय # 6
शलोक # 33
मन के निग्रह का विषय

अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ||

arjuna uvāca
yō.yaṅ yōgastvayā prōktaḥ sāmyēna madhusūdana.
ētasyāhaṅ na paśyāmi cañcalatvāt sthitiṅ sthirām||6.33||

भावार्थ: अर्जुन बोले-हे मधुसूदन! आपने जो समभावयुक्त योग बताया है, उसमें स्थिरता मुझे मन की चंचलता के कारण संभव नहीं लगती।

🌿 यह अर्जुन की ईमानदार जिज्ञासा है-वह मन की प्रकृति को लेकर चिंतित है। ||6:33||
अध्याय # 6
शलोक # 34
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ||

cañcalaṅ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavaddṛḍham.
tasyāhaṅ nigrahaṅ manyē vāyōriva suduṣkaram||6.34||

भावार्थ: हे कृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, बलवान और हठी है-मैं इसे वश में करना वायु को रोकने के समान कठिन मानता हूँ।

🌺 यह श्लोक मन की अस्थिरता को स्वीकार करता है-जो हर साधक की चुनौती है। ||6:34||
अध्याय # 6
शलोक # 35
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ||

śrī bhagavānuvāca
asaṅśayaṅ mahābāhō manō durnigrahaṅ calaṅ.
abhyāsēna tu kauntēya vairāgyēṇa ca gṛhyatē||6.35||

भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले-हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिन है, परंतु अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।

🌼 यह श्लोक साधना का मूल मंत्र है-अभ्यास और वैराग्य। ||6:35||
अध्याय # 6
शलोक # 36
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ||

asaṅyatātmanā yōgō duṣprāpa iti mē matiḥ.
vaśyātmanā tu yatatā śakyō.vāptumupāyataḥ||6.36||

भावार्थ: जिसका मन असंयमित है, उसके लिए योग कठिन है; परंतु जिसने मन को वश में कर लिया है और जो प्रयत्नशील है, वह योग को प्राप्त कर सकता है।

🌸 यह श्लोक प्रेरणा है-संयम और प्रयास से कोई भी योगी बन सकता है। ||6:36||

अब अर्जुन पूछने वाले हैं-यदि कोई साधक योग में असफल हो जाए तो उसका क्या होता है? अब गीता योगभ्रष्ट साधक की दिव्य गति को प्रकट करने वाली है। 📿✨
अध्याय # 6
शलोक # 37
अब हम अध्याय 6 - ध्यान योग के श्लोक 6.37 से 6.47 - जहाँ अर्जुन एक अत्यंत मानवीय प्रश्न पूछते हैं: "यदि कोई साधक योग में असफल हो जाए तो उसका क्या होगा?" और श्रीकृष्ण उस साधक की दिव्य गति का रहस्य प्रकट करते हैं।

योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा

अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ||

arjuna uvāca
ayatiḥ śraddhayōpētō yōgāccalitamānasaḥ.
aprāpya yōgasaṅsiddhiṅ kāṅ gatiṅ kṛṣṇa gacchati||6.37||

भावार्थ: अर्जुन बोले-हे कृष्ण! जो श्रद्धा से युक्त तो है, परंतु मन का संयम न कर पाने के कारण योग से विचलित हो गया और योग की सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सका-उसका क्या होता है?

🌿 यह श्लोक हर साधक की चिंता है-यदि हम बीच में रुक जाएँ तो क्या सब व्यर्थ हो जाएगा? ||6:37||
अध्याय # 6
शलोक # 38
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ||

kaccinnōbhayavibhraṣṭaśchinnābhramiva naśyati.
apratiṣṭhō mahābāhō vimūḍhō brahmaṇaḥ pathi||6.38||

भावार्थ: हे महाबाहो! क्या वह साधक दोनों लोकों से च्युत होकर, टूटे हुए बादल की तरह नष्ट हो जाता है? क्या वह ब्रह्ममार्ग में स्थिर न रहकर भ्रमित हो जाता है?

🌺 यह श्लोक अर्जुन की करुण पुकार है-क्या आध्यात्मिक प्रयास व्यर्थ हो सकता है? ||6:38||
अध्याय # 6
शलोक # 39
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ||

ētanmē saṅśayaṅ kṛṣṇa chēttumarhasyaśēṣataḥ.
tvadanyaḥ saṅśayasyāsya chēttā na hyupapadyatē||6.39||

भावार्थ: हे कृष्ण! आप ही मेरे इस संदेह को पूर्ण रूप से दूर कर सकते हैं, क्योंकि आपके अतिरिक्त कोई और इस संदेह को नष्ट करने में समर्थ नहीं है।

🌼 यह श्लोक गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और श्रद्धा का प्रतीक है। ||6:39||
अध्याय # 6
शलोक # 40
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ||

śrī bhagavānuvāca
pārtha naivēha nāmutra vināśastasya vidyatē.
nahi kalyāṇakṛtkaśicaddurgatiṅ tāta gacchati||6.40||

भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले-हे पार्थ! उस साधक का न तो इस लोक में और न परलोक में विनाश होता है। कल्याणकारी मार्ग पर चलने वाला कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।

🌟 यह श्लोक आश्वासन है-सच्चे प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाते। ||6:40||
अध्याय # 6
शलोक # 41
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ||

prāpya puṇyakṛtāṅ lōkānuṣitvā śāśvatīḥ samāḥ.
śucīnāṅ śrīmatāṅ gēhē yōgabhraṣṭō.bhijāyatē||6.41||

भावार्थ: योग से च्युत साधक पुण्यात्माओं के लोकों में जाकर दीर्घकाल तक सुख भोगता है, फिर शुद्ध और समृद्ध परिवार में जन्म लेता है।

🌿 यह श्लोक बताता है कि योगी का पतन नहीं, केवल विश्राम होता है। ||6:41||
अध्याय # 6
शलोक # 42
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ||

athavā yōgināmēva kulē bhavati dhīmatām.
ētaddhi durlabhataraṅ lōkē janma yadīdṛśam||6.42||

भावार्थ: या फिर वह बुद्धिमान योगियों के कुल में जन्म लेता है-और ऐसा जन्म इस संसार में अत्यंत दुर्लभ होता है।

🌺 यह श्लोक दर्शाता है कि ईश्वर योगी को फिर उसी मार्ग पर आगे बढ़ने का अवसर देते हैं। ||6:42||
अध्याय # 6
शलोक # 43
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ||

tatra taṅ buddhisaṅyōgaṅ labhatē paurvadēhikam.
yatatē ca tatō bhūyaḥ saṅsiddhau kurunandana||6.43||

भावार्थ: वहाँ वह अपने पूर्वजन्म के ज्ञान को पुनः प्राप्त करता है और फिर योग की सिद्धि के लिए पुनः प्रयास करता है।

🌼 यह श्लोक पुनर्जन्म में साधना की निरंतरता को दर्शाता है। ||6:43||
अध्याय # 6
शलोक # 44
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ||

pūrvābhyāsēna tēnaiva hriyatē hyavaśō.pi saḥ.
jijñāsurapi yōgasya śabdabrahmātivartatē||6.44||

भावार्थ: पूर्व अभ्यास के प्रभाव से वह व्यक्ति अनायास ही योग की ओर आकर्षित होता है-even if he doesn't fully understand why-and वह वेदों के कर्मकांडों से ऊपर उठ जाता है।

🌸 यह श्लोक बताता है कि साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती-वह आत्मा में अंकित रहती है। ||6:44||
अध्याय # 6
शलोक # 45
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यात परां गतिम् ||

prayatnādyatamānastu yōgī saṅśuddhakilbiṣaḥ.
anēkajanmasaṅsiddhastatō yāti parāṅ gatim||6.45||

भावार्थ: जो योगी प्रयत्नशील रहता है, वह पापों से शुद्ध होकर, अनेक जन्मों की साधना से सिद्ध होकर परम गति को प्राप्त करता है।

🌟 यह श्लोक साधना की महिमा है-जहाँ हर जन्म हमें ब्रह्म के और निकट लाता है। ||6:45||
अध्याय # 6
शलोक # 46
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ||

tapasvibhyō.dhikō yōgī jñānibhyō.pi matō.dhikaḥ.
karmibhyaścādhikō yōgī tasmādyōgī bhavārjuna||6.46||

भावार्थ: योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ, ज्ञानी से भी श्रेष्ठ, और कर्मियों से भी श्रेष्ठ है-इसलिए, हे अर्जुन! तू योगी बन।

🌿 यह श्लोक योग की सर्वोच्चता की घोषणा है-जहाँ योगी सब मार्गों से ऊपर होता है। ||6:46||
अध्याय # 6
शलोक # 47
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ||

yōgināmapi sarvēṣāṅ madgatēnāntarātmanā.
śraddhāvānbhajatē yō māṅ sa mē yuktatamō mataḥ||6.47||

भावार्थ: सभी योगियों में भी जो श्रद्धा से युक्त होकर, अंतरात्मा से मुझमें लीन होकर मेरी भक्ति करता है-वह सबसे श्रेष्ठ योगी है।

🌺 यह श्लोक गीता का हृदय है-जहाँ योग का चरम बिंदु भक्ति है। ||6:47||

🌟 इस प्रकार अध्याय 6 - "ध्यान योग" पूर्ण होता है। यह केवल ध्यान की विधि नहीं, बल्कि भक्ति, समर्पण और ईश्वर से एकत्व की दिव्य यात्रा है।


🧘 Conclusion (निष्कर्ष)

अध्याय 6 यह सिखाता है कि सच्चा योगी वह नहीं जो केवल बाहरी रूप से संयम रखता है, बल्कि वह है जो मन, इंद्रियों और बुद्धि को नियंत्रित करके परमात्मा में लीन रहता है। ध्यान ही वह माध्यम है जिससे हम अपने भीतर के ईश्वर से संपर्क कर सकते हैं।

आज के समय में जहाँ मन अशांत है, यह अध्याय आध्यात्मिक संतुलन और आंतरिक शांति प्राप्त करने का सरल और प्रभावशाली मार्ग बताता है।


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❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

भगवद गीता के अध्याय 6 का मुख्य विषय क्या है?

इस अध्याय का मुख्य विषय है ध्यान और आत्म-संयम द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करना।

ध्यान योग में कौन-सी विधि अपनाई जाती है?

इसमें श्रीकृष्ण एकांत स्थान पर बैठकर, सीधा शरीर और मन को ईश्वर में एकाग्र करने की विधि बताते हैं।

ध्यान योग में योगी की पहचान क्या है?

सच्चा योगी वही है जो सभी प्राणियों को समभाव से देखता है और आत्मा की दृष्टि से सबको एक मानता है।

क्या यह अध्याय ध्यान साधना के लिए आज भी प्रासंगिक है?

बिलकुल, आज के व्यस्त जीवन में ध्यान योग ही आंतरिक शांति और आत्मिक विकास का सशक्त मार्ग है।

क्या मैं अन्य अध्याय भी यहीं से पढ़ सकता हूँ?

हाँ, सभी अध्यायों की सूची यहाँ उपलब्ध है जहाँ से आप अध्याय दर अध्याय पढ़ सकते हैं।


लेखक: शाइनकैप टीम | प्रकाशित: | संशोधित: