भगवद गीता - अध्याय 18
मोक्ष संन्यास योग - श्लोक व हिंदी अर्थ सहित
🧡 Introduction (परिचय)
अर्जुन द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में श्रीकृष्ण इस अंतिम अध्याय में त्याग और संन्यास का विस्तृत वर्णन करते हैं। यह अध्याय न केवल कर्म योग और संन्यास योग का सार प्रस्तुत करता है, बल्कि गीता के समस्त ज्ञान को एक सूत्र में बाँधता है।
भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि कौन-सा कर्म त्याग करने योग्य है, किस प्रकार का त्याग सात्विक होता है और कैसे संन्यास से मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह अध्याय निष्काम कर्म, तीन प्रकार के कर्म, ज्ञान, बुद्धि, और संकल्प की गहराई से विवेचना करता है।
श्लोक और हिंदी अर्थ
👉 नीचे आप अध्याय 18 के सभी श्लोकों के सरल हिंदी भावार्थ पाएँगे।
श्रीमद्भगवद्गीता के अंतिम और गूढ़तम अध्याय-अध्याय 18: मोक्ष-संन्यास योग। इसमें श्रीकृष्ण जीवन के अंतिम सत्य और आत्मा की मुक्ति के मार्ग को उजागर करते हैं।
शलोक # 1
अर्जुन उवाच
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ||18:1||
arjuna uvāca
saṅnyāsasya mahābāhō tattvamicchāmi vēditum.
tyāgasya ca hṛṣīkēśa pṛthakkēśiniṣūdana||18:1||
भावार्थ : अर्जुन पूछते हैं-हे केशिनिषूदन! मैं संन्यास और त्याग के स्वरूप को भली-भाँति जानना चाहता हूँ।
🧭 यह हमारे प्रश्नों की शुरुआत है-क्या त्याग मतलब सब छोड़ देना है, या अंदर के मोह का त्याग है? ||18:01||
शलोक # 2
काम्यानां कर्मणा न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ||18:1||
śrī bhagavānuvāca
kāmyānāṅ karmaṇāṅ nyāsaṅ saṅnyāsaṅ kavayō viduḥ.
sarvakarmaphalatyāgaṅ prāhustyāgaṅ vicakṣaṇāḥ||18:2||
भावार्थ : श्रीकृष्ण कहते हैं-इच्छा-जन्य कर्मों का परित्याग संन्यास है; जबकि कर्मों के फलों के त्याग को ज्ञानी लोग त्याग कहते हैं।
🔍 संन्यास है "क्या किया जाए" का त्याग। त्याग है "क्यों किया जाए" की अपेक्षा का त्याग। ||18:02||
शलोक # 3
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ||18:2||
tyājyaṅ dōṣavadityēkē karma prāhurmanīṣiṇaḥ.
yajñadānatapaḥkarma na tyājyamiti cāparē||18:3||
भावार्थ : कुछ लोग कहते हैं कि सभी कर्म दोषयुक्त हैं, इसलिए त्याज्य हैं; जबकि अन्य कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप जैसे कर्म कभी भी त्यागने योग्य नहीं हैं।
⚖️ कर्मों का त्याग नहीं-भावों की शुद्धि ही असली मोक्ष की ओर ले जाती है। ||18:03||
शलोक # 4
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ||18:4||
niścayaṅ śrṛṇu mē tatra tyāgē bharatasattama.
tyāgō hi puruṣavyāghra trividhaḥ saṅprakīrtitaḥ||18:4||
भावार्थ : हे अर्जुन! त्याग के विषय में मेरा निर्णय सुनो-त्याग भी तीन प्रकार का होता है।
📚 कर्म का नितांत त्याग नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण चयन-यही गीता की सीख है। ||18:04||
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शलोक # 5
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ||18:5||
yajñadānatapaḥkarma na tyājyaṅ kāryamēva tat.
yajñō dānaṅ tapaścaiva pāvanāni manīṣiṇām||18:5||
भावार्थ : यज्ञ, दान और तप-ये त्यागने योग्य नहीं हैं; बल्कि जरूर किए जाने वाले कर्म हैं क्योंकि ये आत्मा को पवित्र करते हैं।
🕯 अग्नि की तरह ये कर्म आत्मा को शुद्ध करते हैं-जब श्रद्धा से किए जाएँ। ||18:05||
शलोक # 6
कर्तव्यानीति में पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ||18:6||
ētānyapi tu karmāṇi saṅgaṅ tyaktvā phalāni ca.
kartavyānīti mē pārtha niśicataṅ matamuttamam||18:6||
भावार्थ : इन कर्मों को भी लगाव और फल की आशा त्याग कर करना चाहिए-यही मेरा सर्वोत्तम मत है।
🌼 कर्म वही श्रेष्ठ है जिसमें "मैं" का मोह नहीं और फल की अपेक्षा भी नहीं। ||18:06||
शलोक # 7
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ||18:7||
niyatasya tu saṅnyāsaḥ karmaṇō nōpapadyatē.
mōhāttasya parityāgastāmasaḥ parikīrtitaḥ||18:7||
भावार्थ : नियत (कर्तव्य) कर्म का त्याग उचित नहीं है। मूढ़ता या अज्ञान से किया गया त्याग तामसिक कहलाता है।
💤 कर्तव्य से पलायन त्याग नहीं-वह भ्रम है, आत्मवंचना है। ||18:07||
शलोक # 8
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ||18:8||
duḥkhamityēva yatkarma kāyaklēśabhayāttyajēt.
sa kṛtvā rājasaṅ tyāgaṅ naiva tyāgaphalaṅ labhēt||18:8||
भावार्थ : जो कर्म को केवल दुःख या शरीर की पीड़ा के कारण त्यागे-वह राजसिक त्याग है, और उससे कोई फल नहीं मिलता।
🔥 त्याग यदि आराम की खोज बन जाए, तो वह आत्मविकास नहीं लाता। ||18:08||
शलोक # 9
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ||18:9||
kāryamityēva yatkarma niyataṅ kriyatē.rjuna.
saṅgaṅ tyaktvā phalaṅ caiva sa tyāgaḥ sāttvikō mataḥ||18:9||
भावार्थ : जो नियत (कर्तव्य) कर्म को किया जाना चाहिए यह समझकर किया जाता है-लगाव और फल की आशा के बिना-वह सात्त्विक त्याग कहलाता है।
🌺 कर्म में समर्पण हो और फल में विरक्ति-यही सात्त्विक भाव है। ||18:09||
शलोक # 10
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ||18:10||
na dvēṣṭyakuśalaṅ karma kuśalē nānuṣajjatē.
tyāgī sattvasamāviṣṭō mēdhāvī chinnasaṅśayaḥ||18:10||
भावार्थ : जो व्यक्ति अकुशल (कठिन) कर्म से घृणा नहीं करता, और सुकर कर्म से आसक्त नहीं होता-वह सच्चा त्यागी है, और उसके सभी संशय नष्ट हो जाते हैं।
🕊 सच्चा त्यागी कर्म में रमता है-पर कर्म उसे बाँधता नहीं। ||18:10||
🌿 अब हम इस अध्याय के मूल में प्रवेश कर चुके हैं-जहाँ संन्यास केवल वस्त्र या वनवास नहीं, बल्कि मनोवृत्ति है। अगले श्लोकों में श्रीकृष्ण कर्तृत्व, बुद्धि, संकल्प और त्रिविध बल-बुद्धि-संतोष की व्याख्या करेंगे।
शलोक # 11
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ||18:11||
na hi dēhabhṛtā śakyaṅ tyaktuṅ karmāṇyaśēṣataḥ.
yastu karmaphalatyāgī sa tyāgītyabhidhīyatē||18:11||
भावार्थ : शरीरधारी जीव पूर्ण रूप से कर्म का त्याग नहीं कर सकता। लेकिन जो कर्म के फल का त्याग करता है, वही सच्चा त्यागी कहलाता है।
🧘 त्याग वस्त्रों का नहीं, आशाओं का हो-तो जीवन हल्का और निर्मल हो जाता है। ||18:11||
शलोक # 12
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित् ||18:12||
aniṣṭamiṣṭaṅ miśraṅ ca trividhaṅ karmaṇaḥ phalam.
bhavatyatyāgināṅ prētya na tu saṅnyāsināṅ kvacit||18:12||
भावार्थ : कर्म के तीन प्रकार के फल होते हैं-अप्रिय, प्रिय और मिश्रित। ये त्याग न करने वालों को मिलते हैं, लेकिन त्यागियों को नहीं बाँधते।
🌾 जब हम फल की चिंता छोड़ते हैं, तभी कर्म अपना बोझ नहीं बनता। ||18:12||
शलोक # 13
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ||18:13||
pañcaitāni mahābāhō kāraṇāni nibōdha mē.
sāṅkhyē kṛtāntē prōktāni siddhayē sarvakarmaṇām||18:13||
भावार्थ : हे महाबाहो! सभी कर्मों की सिद्धि के लिए पाँच कारण माने गए हैं-जिन्हें अब मैं बताता हूँ।
🔎 कर्म का फल केवल "मैंने किया" से नहीं आता-सृष्टि की पाँच शक्तियाँ उसमें कार्य करती हैं। ||18:13||
शलोक # 14
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ||18:14||
adhiṣṭhānaṅ tathā kartā karaṇaṅ ca pṛthagvidham.
vividhāśca pṛthakcēṣṭā daivaṅ caivātra pañcamam||18:14||
भावार्थ : कर्म के पाँच कारण हैं-(1) अधिष्ठान (शरीर), (2) कर्ता (कर्तृत्ववृत्ति), (3) इन्द्रियाँ, (4) उनके विविध प्रयास, और (5) दैव (ईश्वर की व्यवस्था/भाग्य)।
⚙️ कर्म अकेले मेरा नहीं-यह एक साझा तंत्र है; अहं को नम्रता की दिशा में मोड़ने वाली सीख। ||18:14||
शलोक # 15
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः||18:15||
śarīravāṅmanōbhiryatkarma prārabhatē naraḥ.
nyāyyaṅ vā viparītaṅ vā pañcaitē tasya hētavaḥ||18:15||
भावार्थ : मनुष्य जो भी कर्म शरीर, वाणी और मन से करता है-चाहे वह धर्मयुक्त हो या विपरीत-उसके भी यही पाँच कारण होते हैं।
🪞 स्वतंत्र इच्छा के साथ हम कर्म कर सकते हैं, लेकिन पूर्ण नियंत्रण हमारा नहीं है। ||18:15||
शलोक # 16
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ||18:16||
tatraivaṅ sati kartāramātmānaṅ kēvalaṅ tu yaḥ.
paśyatyakṛtabuddhitvānna sa paśyati durmatiḥ||18:16||
भावार्थ : जो यह नहीं समझता कि कर्म में अनेक कारण हैं, और केवल "मैं ही करता हूँ" ऐसा मानता है-वह अज्ञानी है, और सत्य को नहीं देखता।
🥀 अहंकार कर्म को बोझ बनाता है-ज्ञान उसे सेवा में रूपांतरित करता है। ||18:16||
शलोक # 17
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ||18:17||
yasya nāhaṅkṛtō bhāvō buddhiryasya na lipyatē.
hatvāpi sa imāōllōkānna hanti na nibadhyatē||18:17||
भावार्थ : जिसकी बुद्धि शुद्ध है, जिसमें अहंभाव नहीं है और वह कर्म के फल में नहीं उलझता-वह हत्या जैसे कर्म करते हुए भी बांधा नहीं जाता।
🕊 जब कर्ता भाव मिटता है और कर्म सेवा बनता है, तब कर्म बंधन नहीं बनता। ||18:17||
शलोक # 18
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ||18:18||
jñānaṅ jñēyaṅ parijñātā trividhā karmacōdanā.
karaṇaṅ karma kartēti trividhaḥ karmasaṅgrahaḥ||18:18||
भावार्थ : ज्ञान, ज्ञेय (जिसे जाना जाए) और ज्ञाता (जानने वाला)-ये तीनों कर्म को उत्पन्न करते हैं।
साथ ही करण (उपकरण), कर्म और कर्ता -ये कर्म के तीन आधार हैं।
🔁 यह त्रिवेणी कर्म-चेतना की गहराई को दर्शाती है-सोच, साधन और संचालक सभी आवश्यक हैं। ||18:18||
शलोक # 19
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छ्णु तान्यपि ||18:19||
jñānaṅ karma ca kartā ca tridhaiva guṇabhēdataḥ.
prōcyatē guṇasaṅkhyānē yathāvacchṛṇu tānyapi||18:19||
भावार्थ : अब मैं बताता हूँ कि ज्ञान, कर्म और कर्ता भी सात्त्विक, राजसिक और तामसिक तीन प्रकार के होते हैं-ध्यान से सुनो।
🌀 गुणों के अनुसार हमारा कर्म भी रंग बदलता है-सत्य का स्वरूप गुणसंश्रय है। ||18:19||
शलोक # 20
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ||18:20||
sarvabhūtēṣu yēnaikaṅ bhāvamavyayamīkṣatē.
avibhaktaṅ vibhaktēṣu tajjñānaṅ viddhi sāttvikam||18:20||
भावार्थ : जो ज्ञान सभी प्राणियों में एक ही अविनाशी आत्मा को देखता है, विभक्त प्राणियों में अविभक्त सत्ता को अनुभव करता है-वह सात्त्विक ज्ञान कहलाता है।
🌞 यह दृष्टि जब विकसित होती है, तब हर जीव में परमात्मा के दर्शन होने लगते हैं-वही सच्चा योग है। ||18:20||
🌼 इन श्लोकों में श्रीकृष्ण कर्म के रहस्य को खोलते हैं-कि कर्म न तो केवल बाहर का क्रियाकलाप है, और न ही इसका अर्थ केवल प्रयत्न है। उसमें ज्ञान, दृष्टि, भाव और नियति-all combine.
शलोक # 21
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ||18:21||
pṛthaktvēna tu yajjñānaṅ nānābhāvānpṛthagvidhān.
vētti sarvēṣu bhūtēṣu tajjñānaṅ viddhi rājasam||18:21||
भावार्थ : जो ज्ञान सब प्राणियों को भिन्न-भिन्न रूपों में और पृथक समझता है-वह राजसिक ज्ञान कहलाता है।
🔍 यह दृष्टि बाह्य भेदों में उलझती है-एकत्व की चेतना नहीं देखती। ||18:21||
अध्याय 18.21 से 18.30-जहाँ श्रीकृष्ण राजसिक और तामसिक ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि और धैर्य की विवेचना करते हैं। अध्याय 18 के श्लोक 21 से 30 की ओर-जहाँ श्रीकृष्ण ज्ञान, कर्म, और कर्ता की राजसिक और तामसिक प्रकृतियों के साथ, बुद्धि और धैर्य के तीनों गुणों की विशद व्याख्या करते हैं। ✨
शलोक # 22
अतत्त्वार्थवदल्पंच तत्तामसमुदाहृतम्||18:22||
yattu kṛtsnavadēkasminkāryē saktamahaitukam.
atattvārthavadalpaṅ ca tattāmasamudāhṛtam||18:22||
भावार्थ : जो ज्ञान किसी एक विषय में अति आसक्त होकर, बिना कारण और बिना तत्त्वज्ञान के सीमित दृष्टि रखता है-वह तामसिक ज्ञान है।
🌫 यह दृष्टि सीमित है, जड़ है-जो न तो सत्य देखती है, न व्यापकता। ||18:22||
शलोक # 23
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते||18:23||
niyataṅ saṅgarahitamarāgadvēṣataḥ kṛtam.
aphalaprēpsunā karma yattatsāttvikamucyatē||18:23||
भावार्थ : जो कर्म कर्तव्य समझकर, संयोग और द्वेष से रहित, और फल की इच्छा बिना किया जाए-वह सात्त्विक कर्म है।
🌱 ऐसा कर्म स्वयं को भी उन्नत करता है, और संसार को भी। ||18:23||
शलोक # 24
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्||18:24||
yattu kāmēpsunā karma sāhaṅkārēṇa vā punaḥ.
kriyatē bahulāyāsaṅ tadrājasamudāhṛtam||18:24||
भावार्थ : जो कर्म बिना सोचे-समझे, अज्ञान से, बिना परिणाम की चिंता किए किया जाए-वह तामसिक कर्म है।
⚠️ यह कर्म गति देता है, पर दिशा नहीं-परिणाम में उलझन ही मिलती है। ||18:24||
शलोक # 25
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते||18:25||
anubandhaṅ kṣayaṅ hiṅsāmanapēkṣya ca pauruṣam.
mōhādārabhyatē karma yattattāmasamucyatē||18:25||
भावार्थ : जो कर्म इच्छा पूर्ति या अहंकार से किया जाता है, जिसमें अत्यधिक परिश्रम और चिंता होती है-वह राजसिक कर्म है।
🔥 यह कर्म बाह्य सफलता के पीछे भागता है-भीतर की शांति खो देता है। ||18:25||
शलोक # 26
सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते||18:26||
muktasaṅgō.nahaṅvādī dhṛtyutsāhasamanvitaḥ.
siddhyasiddhyōrnirvikāraḥ kartā sāttvika ucyatē||18:26||
भावार्थ : जो कर्ता आसक्ति और अहंकार से मुक्त होता है, धैर्य और उत्साह से युक्त होता है, और सफलता-असफलता में समान रहता है-वह सात्त्विक कर्ता है।
🕊 ऐसा कर्ता कर्म में तल्लीन होता है-पर कर्म में नहीं अटकता। ||18:26||
शलोक # 27
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः||18:27||
rāgī karmaphalaprēpsurlubdhō hiṅsātmakō.śuciḥ.
harṣaśōkānvitaḥ kartā rājasaḥ parikīrtitaḥ||18:27||
भावार्थ : जो कर्ता आसक्त, फल-लोभी, लालची, हिंसक और अशांत हो, और हर्ष तथा शोक से प्रभावित होता हो-वह राजसिक कर्ता है।
🎭 यह कर्ता कर्म नहीं करता-बल्कि कर्म उसे चलाता है। ||18:27||
शलोक # 28
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते||18:28||
ayuktaḥ prākṛtaḥ stabdhaḥ śaṭhō naiṣkṛtikō.lasaḥ.
viṣādī dīrghasūtrī ca kartā tāmasa ucyatē||18:28||
भावार्थ : जो कर्ता अनुशासनहीन, जड़बुद्धि, अहंकारी, कपटी, आलसी, विषादग्रस्त और निर्णयहीन होता है-वह तामसिक कर्ता है।
🌑 यह कर्ता कर्म को बोझ समझता है-और अपने ही भ्रम में उलझा रहता है। ||18:28||
शलोक # 29
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ||18:29||
buddhērbhēdaṅ dhṛtēścaiva guṇatastrividhaṅ śrṛṇu.
prōcyamānamaśēṣēṇa pṛthaktvēna dhanañjaya||18:29||
भावार्थ : हे अर्जुन! अब मैं बुद्धि और धैर्य के तीनों गुणानुसार भेद को विस्तार से बताता हूँ।
📜 अब विवेक और दृढ़ता की गुणवत्ता पर प्रकाश डाला जाएगा-जो जीवन की दिशा तय करते हैं। ||18:29||
शलोक # 30
बन्धं मोक्षं च या वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ||18:30||
pravṛttiṅ ca nivṛttiṅ ca kāryākāryē bhayābhayē.
bandhaṅ mōkṣaṅ ca yā vētti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī||18:30||
भावार्थ : जो बुद्धि क्या करना है, क्या नहीं करना है, भय और अभय, बंधन और मुक्ति में स्पष्ट निर्णय कर सके-वह सात्त्विक बुद्धि है।
🌟 यह विवेक की वह ज्योति है, जो जीवन को प्रकाशमान करती है-और आत्मा को दिशा देती है। ||18:30||
💫 इन श्लोकों में श्रीकृष्ण ने कर्म, कर्ता, ज्ञान और बुद्धि के सूक्ष्मतम भेद उजागर किए हैं-यह दिखाने के लिए कि कर्म से बंधना नहीं होता, जब विवेक और भाव शुद्ध हों।
शलोक # 31
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी||18:31||
yayā dharmamadharmaṅ ca kāryaṅ cākāryamēva ca.
ayathāvatprajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī||18:31||
भावार्थ : जो बुद्धि धर्म और अधर्म, क्या करना चाहिए और क्या नहीं-इनका सही निर्णय नहीं कर पाती, वह राजसिक बुद्धि है।
🎭 यह बुद्धि भावनाओं में बहकर निर्णय करती है-न कि सत्य को जानकर। ||18:31||
शलोक # 32
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी||18:32||
adharmaṅ dharmamiti yā manyatē tamasā||vṛtā.
sarvārthānviparītāṅśca buddhiḥ sā pārtha tāmasī||18:32||
भावार्थ : जो बुद्धि अधर्म को धर्म समझती है, और सत्य को असत्य-वह तामसिक बुद्धि है, जो अज्ञान से आवृत होती है।
🌑 यह बुद्धि सत्य को उल्टा देखती है-और आत्मा को भ्रम में डुबो देती है। ||18:32||
शलोक # 33
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ||18:33||
dhṛtyā yayā dhārayatē manaḥprāṇēndriyakriyāḥ.
yōgēnāvyabhicāriṇyā dhṛtiḥ sā pārtha sāttvikī||18:33||
भावार्थ : जो धैर्य योगपूर्वक मन, प्राण और इन्द्रियों को दृढ़ता से नियंत्रित करता है-वह सात्त्विक धृति है।
🧘 यह वह धैर्य है जो तप से पैदा होता है और आत्मा को स्थिर करता है। ||18:33||
शलोक # 34
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी||18:34||
yayā tu dharmakāmārthān dhṛtyā dhārayatē.rjuna.
prasaṅgēna phalākāṅkṣī dhṛtiḥ sā pārtha rājasī||18:34||
भावार्थ : जो धैर्य धर्म, काम और अर्थ की पूर्ति के लिए किया जाता है, और फल की लालसा से जुड़ा होता है-वह राजसिक धृति है।
🔥 यह धैर्य टिकता है-पर स्वार्थ से प्रेरित होता है। ||18:34||
शलोक # 35
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी||18:35||
yayā svapnaṅ bhayaṅ śōkaṅ viṣādaṅ madamēva ca.
na vimuñcati durmēdhā dhṛtiḥ sā pārtha tāmasī||18:35||
भावार्थ : जो धैर्य नींद, भय, शोक, उदासी और अहं को नहीं छोड़ता-वह तामसिक धृति है।
🌫 यह धैर्य नहीं, एक जड़ता है-जो आत्मा को बाँधकर रखती है। ||18:35||
शलोक # 36
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति||18:36||
sukhaṅ tvidānīṅ trividhaṅ śrṛṇu mē bharatarṣabha.
abhyāsādramatē yatra duḥkhāntaṅ ca nigacchati||18:36||
भावार्थ : अब मैं तुम्हें तीन प्रकार के सुख के बारे में बताता हूँ-जो अभ्यास से प्राप्त होता है और अंत में दुःख का अंत करता है।
🌺 सुख भी गुणों के अनुसार भिन्न होता है-सच्चा सुख भीतर से उपजता है। ||18:36||
शलोक # 37
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्||18:37||
yattadagrē viṣamiva pariṇāmē.mṛtōpamam.
tatsukhaṅ sāttvikaṅ prōktamātmabuddhiprasādajam||18:37||
भावार्थ : जो सुख प्रारंभ में कठिन (विष-जैसा) होता है, पर अंत में अमृत-समान होता है-वह सात्त्विक सुख है। यह आत्मा और बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है।
🕊 यह सुख साधना से आता है-धीरे-धीरे, पर स्थायी रूप से प्रसन्न करता है। ||18:37||
शलोक # 38
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्||18:38||
viṣayēndriyasaṅyōgādyattadagrē.mṛtōpamam.
pariṇāmē viṣamiva tatsukhaṅ rājasaṅ smṛtam||18:38||
भावार्थ : जो सुख इन्द्रियों और विषयों के संपर्क से होता है-प्रारंभ में मधुर, पर अंत में विष के समान-वह राजसिक सुख है।
🎭 यह सुख क्षणिक है-पर पश्चाताप लंबा खिंचता है। ||18:38||
शलोक # 39
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्||18:39||
yadagrē cānubandhē ca sukhaṅ mōhanamātmanaḥ.
nidrālasyapramādōtthaṅ tattāmasamudāhṛtam||18:39||
भावार्थ : जो सुख प्रारंभ और अंत में अविवेक, प्रमाद, आलस्य और मोह से भरा हो-वह तामसिक सुख है।
⚠️ यह सुख भ्रम देता है, लेकिन आत्मा को अंधकार की ओर ले जाता है। ||18:39||
शलोक # 40
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिःस्यात्त्रिभिर्गुणैः||18:40||
na tadasti pṛthivyāṅ vā divi dēvēṣu vā punaḥ.
sattvaṅ prakṛtijairmuktaṅ yadēbhiḥ syātitrabhirguṇaiḥ||18:40||
भावार्थ : न पृथ्वी पर, न स्वर्ग में, और न ही किसी अन्य लोक में कोई प्राणी ऐसा है जो इन तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) से रहित हो।
🌌 गुण प्रकृति का हिस्सा हैं-मोक्ष उन्हें समझकर, और पार करके पाया जाता है। ||18:40||
🌼 इन श्लोकों में श्रीकृष्ण हमें यह सिखाते हैं कि बुद्धि, धैर्य और सुख सबकी गुणवत्ता हमारे आंतरिक गुणों पर निर्भर करती है। जो सत्त्वगुण की ओर बढ़ता है-वही शुद्ध कर्म, विवेक और मोक्ष के मार्ग का अधिकारी बनता है। श्लोक 18.41 से 18.50-जहाँ वर्णधर्म, स्वधर्म और परम कर्तव्य की गहराई से व्याख्या की गई है। आत्मा की अंतिम भूमिका अब और स्पष्ट होने को है 🌄📘?
शलोक # 41
फल सहित वर्ण धर्म का विषय
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः||18:41||
brāhmaṇakṣatriyaviśāṅ śūdrāṇāṅ ca paraṅtapa.
karmāṇi pravibhaktāni svabhāvaprabhavairguṇaiḥ||18:41||
भावार्थ : हे अर्जुन! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कार्य प्रकृति से उत्पन्न गुणों के अनुसार निर्धारित होते हैं।
🧬 वर्ण जन्म नहीं, स्वभाव और गुण के आधार पर होता है-यह कर्म-प्रधान दृष्टि है। ||18:41||
शलोक # 42
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ||18:42||
śamō damastapaḥ śaucaṅ kṣāntirārjavamēva ca.
jñānaṅ vijñānamāstikyaṅ brahmakarma svabhāvajam||18:42||
भावार्थ : शांत चित्त, इन्द्रिय-निग्रह, तप, शुद्धता, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और श्रद्धा-ये ब्राह्मण स्वभाव के कर्म हैं।
📖 इन गुणों में जीवन की आंतरिक ज्योति जलती है-ज्ञानी के रूप में सेवा। ||18:42||
शलोक # 43
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्||18:43||
śauryaṅ tējō dhṛtirdākṣyaṅ yuddhē cāpyapalāyanam.
dānamīśvarabhāvaśca kṣātraṅ karma svabhāvajam||18:43||
भावार्थ : शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध में न भागना, दान, और नेतृत्वशीलता-ये क्षत्रिय कर्म हैं।
🛡 रक्षा और समर्पण-जब शक्ति करुणा से बंधी हो, तभी वह धर्म की रक्षक बनती है। ||18:43||
शलोक # 44
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्||18:44||
kṛṣigaurakṣyavāṇijyaṅ vaiśyakarma svabhāvajam.
paricaryātmakaṅ karma śūdrasyāpi svabhāvajam||18:44||
भावार्थ : कृषि, पशुपालन और व्यापार-ये वैश्य के कर्म हैं, और सेवा (परिचर्या) करना शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।
🌾 हर कर्म महान है, जब वह श्रद्धा और सेवा-भाव से किया जाए। ||18:44||
शलोक # 45
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु||18:45||
svē svē karmaṇyabhirataḥ saṅsiddhiṅ labhatē naraḥ.
svakarmanirataḥ siddhiṅ yathā vindati tacchṛṇu||18:45||
भावार्थ : हर मनुष्य अपने स्वधर्म का पालन करके सिद्धि को प्राप्त करता है। अब मैं बताता हूँ कि कैसे यह सिद्धि मिलती है।
🔧 अपने कर्तव्य में रमना ही सच्ची साधना बन सकती है-जब वह समर्पण से किया जाए। ||18:45||
शलोक # 46
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः||18:46||
yataḥ pravṛttirbhūtānāṅ yēna sarvamidaṅ tatam.
svakarmaṇā tamabhyarcya siddhiṅ vindati mānavaḥ||18:46||
भावार्थ : जिस परमात्मा से सब प्राणी उत्पन्न होते हैं और जो इस सृष्टि में व्याप्त है, उसकी पूजा अपने कर्म द्वारा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त करता है।
🪔 कर्म ही पूजा है-जब वह ईश्वर को समर्पित होकर किया जाए। ||18:46||
शलोक # 47
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्||18:47||
śrēyānsvadharmō viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt.
svabhāvaniyataṅ karma kurvannāpnōti kilbiṣam||18:47||
भावार्थ : भले ही दोषयुक्त हो, फिर भी स्वधर्म (अपना कार्य) अच्छी तरह निभाए गए परधर्म से श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म करते हुए पाप नहीं लगता।
🌿 अपने रास्ते की धूल भी चाँदी है-दूसरों की चमक आत्मा को भ्रमित करती है। ||18:47||
शलोक # 48
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः||18:48||
sahajaṅ karma kauntēya sadōṣamapi na tyajēt.
sarvārambhā hi dōṣēṇa dhūmēnāgnirivāvṛtāḥ||18:48||
भावार्थ : हे अर्जुन! स्वधर्म को, चाहे वह दोषयुक्त ही क्यों न हो, नहीं छोड़ना चाहिए-क्योंकि सभी आरंभ किसी न किसी दोष से ढँके होते हैं, जैसे आग धुएँ से।
🔥 कोई भी कार्य पूर्ण नहीं होता-परंतु श्रद्धा उसे शुभ बनाती है। ||18:48||
शलोक # 49
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति||18:49||
asaktabuddhiḥ sarvatra jitātmā vigataspṛhaḥ.
naiṣkarmyasiddhiṅ paramāṅ saṅnyāsēnādhigacchati||18:49||
भावार्थ : जिस व्यक्ति की बुद्धि आसक्त नहीं है, जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है, और इच्छाओं को त्याग दिया है-वह संन्यास द्वारा परम नैष्कर्म्य सिद्धि को प्राप्त करता है।
🕊 त्याग के भीतर एक ऐसी शांति है जो कर्म की पार लगाकर आत्मा को ईश्वर के निकट पहुँचा देती है। ||18:49||
शलोक # 50
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा||18:50||
siddhiṅ prāptō yathā brahma tathāpnōti nibōdha mē.
samāsēnaiva kauntēya niṣṭhā jñānasya yā parā||18:50||
भावार्थ : अब अर्जुन! मैं संक्षेप में बताता हूँ कि सिद्धि प्राप्त मनुष्य कैसे ब्रह्म को प्राप्त करता है-यह ज्ञान की परम स्थिति है।
🌌 यह अंतिम मार्ग है-जहाँ आत्मा ब्रह्म में लीन होकर पूर्णता को प्राप्त करती है। ||18:50||
💫 यहाँ श्रीकृष्ण हमें यह सिखाते हैं कि स्वधर्म का समर्पण भाव से पालन ही ईश्वर की प्राप्ति का सबसे सीधा मार्ग है। त्याग, शुद्ध बुद्धि और एकाग्रता से किया गया कर्म-एक साधक को मोक्ष का अधिकारी बनाता है। अब अंतिम चरण शेष है-श्लोक 18.51 से 18.66, जहाँ श्रीकृष्ण मोक्ष के अत्यंत गूढ़ रहस्य को उजागर करते हैं, culminating in the iconic shloka "सर्वधर्मान्परित्यज्य…"
शलोक # 51
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च||18:51||
buddhyā viśuddhayā yuktō dhṛtyā||tmānaṅ niyamya ca.
śabdādīn viṣayāṅstyaktvā rāgadvēṣau vyudasya ca||18:51||
शलोक # 52
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः||18:52||
viviktasēvī laghvāśī yatavākkāyamānasaḥ.
dhyānayōgaparō nityaṅ vairāgyaṅ samupāśritaḥ||18:52||
भावार्थ : जिसकी बुद्धि शुद्ध हो, मन संयमित हो, इन्द्रियाँ वश में हों, जो न इच्छा करता हो, न द्वेष-वह साधक शांति, वैराग्य और ध्यान के द्वारा परम ज्ञान की अवस्था में पहुँचता है।
🧘♂️ यह वह साधक है जिसने संसार के स्वरूप को समझा-अब वह स्थिरता और आत्मज्ञान की ओर रमा है। ||18:51 - 18:52||
शलोक # 53
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते||18:53||
ahaṅkāraṅ balaṅ darpaṅ kāmaṅ krōdhaṅ parigraham.
vimucya nirmamaḥ śāntō brahmabhūyāya kalpatē||18:53||
भावार्थ : जिसने अहंकार, बल, क्रोध, आसक्ति और संपत्ति की भावना का त्याग किया है, वह "माम् शान्तिमधिगच्छति"-मेरे स्वरूप में पूर्ण शांति को प्राप्त करता है। ||18:53||
शलोक # 54
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्||18:54||
brahmabhūtaḥ prasannātmā na śōcati na kāṅkṣati.
samaḥ sarvēṣu bhūtēṣu madbhaktiṅ labhatē parām||18:54||
भावार्थ : जो ब्रह्मभूत (ईश्वर में स्थित) हो गया है, वह प्रसन्नचित्त होता है-वह न किसी के लिए दुख करता है, न किसी से राग करता है।
🌿 त्याग केवल वस्तु का नहीं, अहंकार का हो-तो आत्मा शांत हो जाती है। ||18:54||
शलोक # 55
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्||18:55||
bhaktyā māmabhijānāti yāvānyaścāsmi tattvataḥ.
tatō māṅ tattvatō jñātvā viśatē tadanantaram||18:55||
भावार्थ : इस आत्मस्थित दशा के बाद, भक्तिभाव से मनुष्य मुझे जैसे मैं हूँ वैसे जान सकता है, और फिर मेरे स्वरूप में प्रवेश कर जाता है।
🌞 यह वह स्थिति है जहाँ आत्मा मुक्त है-बिना द्वंद्व के, पूर्ण संतोष में। ||18:55||
शलोक # 56
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्||18:56||
sarvakarmāṇyapi sadā kurvāṇō madvyapāśrayaḥ.
matprasādādavāpnōti śāśvataṅ padamavyayam||18:56||
🔱 ज्ञान से दर्शन होता है, पर भक्ति से मिलन होता है।
शलोक # 57
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव||18:57||
cētasā sarvakarmāṇi mayi saṅnyasya matparaḥ.
buddhiyōgamupāśritya maccittaḥ satataṅ bhava||18:57||
भावार्थ : जो सभी कर्मों को मेरे पर छोड़ देता है, मेरी शरण में आता है, और मेरी कृपा से सब बाधाएँ पार करता है-वह मोक्ष का अधिकारी बनता है। ||18:56 - 18:57||
शलोक # 58
अथ चेत्वमहाङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि||18:58||
maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāttariṣyasi.
atha cēttvamahaṅkārānna śrōṣyasi vinaṅkṣyasi||18:58||
🙌 जब कर्मों का भार भगवान को सौंप दिया जाता है-तभी साधक मुक्त होकर उड़ता है।
शलोक # 59
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ||18:59||
yadahaṅkāramāśritya na yōtsya iti manyasē.
mithyaiṣa vyavasāyastē prakṛtistvāṅ niyōkṣyati||18:59||
शलोक # 60
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ||18:60||
svabhāvajēna kauntēya nibaddhaḥ svēna karmaṇā.
kartuṅ nēcchasi yanmōhātkariṣyasyavaśō.pi tat||18:60||
भावार्थ : यदि तुम मन लगाकर मेरा स्मरण करते हो, तो मेरी कृपा से सभी कठिनाइयों को पार कर जाओगे। यदि अहंकार से काम करोगे, तो पतन होगा-क्योंकि प्रकृति तुम्हें अपने स्वभाव के अनुसार ही चलाएगी। ||18:58 - 18:60||
शलोक # 61
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया||18:61||
īśvaraḥ sarvabhūtānāṅ hṛddēśē.rjuna tiṣṭhati.
bhrāmayansarvabhūtāni yantrārūḍhāni māyayā||18:61||
भावार्थ : भगवान प्रत्येक प्राणी के हृदय में निवास करते हैं, और उसके कर्मों के अनुसार उसे नियमानुसार मार्ग देते हैं।
⚠️ स्वतंत्रता तभी मिलती है जब हम स्वभाव और अहंकार से ऊपर उठते हैं। ||18:61||
शलोक # 62
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्||18:62||
tamēva śaraṇaṅ gaccha sarvabhāvēna bhārata.
tatprasādātparāṅ śāntiṅ sthānaṅ prāpsyasi śāśvatam||18:62||
भावार्थ : उसी परमेश्वर की पूर्ण शरण में जाओ-तभी उसकी कृपा से परम शांति और सनातन स्थान की प्राप्ति होगी।
🌀 परमात्मा रथ के सारथी हैं-पर दिशा पकड़नी साधक को ही होती है। ||18:62||
शलोक # 63
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ||18:63||
iti tē jñānamākhyātaṅ guhyādguhyataraṅ mayā.
vimṛśyaitadaśēṣēṇa yathēcchasi tathā kuru||18:63||
भावार्थ : हे अर्जुन! मैंने तुम्हें गूढ़तम ज्ञान बता दिया है-अब तुम विचार कर अपने अनुसार निर्णय लो।
🕊 शरणागति केवल शब्द नहीं-यह आत्मा का पूर्ण समर्पण है। ||18:63||
शलोक # 64
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ||18:64||
sarvaguhyatamaṅ bhūyaḥ śrṛṇu mē paramaṅ vacaḥ.
iṣṭō.si mē dṛḍhamiti tatō vakṣyāmi tē hitam||18:64||
🧭 भगवान आदेश नहीं देते-वे मार्ग दिखाते हैं। चयन हमें करना होता है।
शलोक # 65
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ||18:65||
manmanā bhava madbhaktō madyājī māṅ namaskuru.
māmēvaiṣyasi satyaṅ tē pratijānē priyō.si mē||18:65||
भावार्थ : अब मैं तुम्हें सबसे गूढ़ रहस्य फिर से कहता हूँ-मेरा प्रिय बनो, मेरी भक्ति करो, मुझे नमस्कार करो-तब तुम निश्चित रूप से मुझे प्राप्त करोगे। ||18:64 - 18:65||
शलोक # 66
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ||18:66||
sarvadharmānparityajya māmēkaṅ śaraṇaṅ vraja.
ahaṅ tvā sarvapāpēbhyō mōkṣayiṣyāmi mā śucaḥ||18:66||
भावार्थ : सभी धर्मों को त्यागकर सिर्फ मेरी शरण में आओ-मैं तुम्हारे सारे पापों से तुम्हें मुक्त कर दूँगा, दुख मत करो।
💖 यह भक्ति, प्रेम, और समर्पण की अंतिम पुकार है-ईश्वर और आत्मा के मिलन की बात। ||18:66||
🌼 इस प्रकार श्लोक 51 से 66 तक श्रीकृष्ण हमें चेतना के उच्चतम शिखर तक ले जाते हैं-जहाँ कर्म के माध्यम से भक्ति, और भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्त होता है। यह आत्मसमर्पण का भाव-ही संपूर्ण गीता का सार है। अंतिम 9 श्लोक (18.67-75) में श्रीकृष्ण इस संवाद के महत्व और पूर्णता को स्पष्ट करते हैं।
शलोक # 67
श्रीगीताजी का माहात्म्य
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ||18:67||
idaṅ tē nātapaskāya nābhaktāya kadācana.
na cāśuśrūṣavē vācyaṅ na ca māṅ yō.bhyasūyati||18:67||
भावार्थ : इस गूढ़तम ज्ञान को न तो तपहीन, न अभक्त, न सुनने की इच्छा न रखने वाले, और न मेरी निंदा करने वाले को बताना चाहिए।
💫 यह शरणागति का घोष है-जहाँ स्वयं भगवान आत्मा को गोद में ले लेते हैं। ||18:67||
शलोक # 68
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ||18:68||
ya imaṅ paramaṅ guhyaṅ madbhaktēṣvabhidhāsyati.
bhakitaṅ mayi parāṅ kṛtvā māmēvaiṣyatyasaṅśayaḥ||18:68||
भावार्थ : जो इस परम रहस्य को मेरे भक्तों को बताता है, वह मुझमें अत्यंत प्रिय हो जाता है, और निश्चय ही मेरे पास आता है।
🔐 आध्यात्मिक ज्ञान को केवल पात्र को देना ही उसकी मर्यादा है-अन्यथा वह नष्ट हो जाता है। ||18:68||
शलोक # 69
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ||18:69||
na ca tasmānmanuṣyēṣu kaśicanmē priyakṛttamaḥ.
bhavitā na ca mē tasmādanyaḥ priyatarō bhuvi||18:69||
भावार्थ : संसार में ऐसा कोई मानव नहीं जो मुझसे अधिक प्रिय हो, जितना वह जो इस ज्ञान का प्रचार करता है।
🕊 जो गीता का संदेश फैलाता है-वह स्वयं कृष्ण का कार्य करता है। ||18:69||
शलोक # 70
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ||18:70||
adhyēṣyatē ca ya imaṅ dharmyaṅ saṅvādamāvayōḥ.
jñānayajñēna tēnāhamiṣṭaḥ syāmiti mē matiḥ||18:70||
भावार्थ : जो इस पवित्र संवाद का अध्ययन करेगा, वह मेरे लिए ज्ञान-यज्ञ के समान है-और मुझे अत्यंत प्रिय होगा।
💖 गीता के शिक्षक, वक्ता और साधक-कृष्ण के हृदय का अंश हैं। ||18:70||
शलोक # 71
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ||18:71||
śraddhāvānanasūyaśca śrṛṇuyādapi yō naraḥ.
sō.pi muktaḥ śubhāōllōkānprāpnuyātpuṇyakarmaṇām||18:71||
भावार्थ : जो श्रद्धा और निर्मलता से इस गीता को केवल सुनता भी है, वह भी पुण्य लोकों को प्राप्त करता है।
📖 गीता का श्रवण भी पूजा है-जब हृदय से सुनी जाए। ||18:71||
शलोक # 72
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ||18:72||
kaccidētacchrutaṅ pārtha tvayaikāgrēṇa cētasā.
kaccidajñānasaṅmōhaḥ pranaṣṭastē dhanañjaya||18:72||
भावार्थ : हे अर्जुन! क्या तुमने यह सब एकाग्रचित्त से सुना? क्या तुम्हारा मोह और अज्ञान नष्ट हो गया?
🪔 सच्चे मन से श्रवण भी साधना बन जाती है। ||18:72||
शलोक # 73
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ||18:73||
arjuna uvāca
naṣṭō mōhaḥ smṛtirlabdhā tvatprasādānmayācyuta.
sthitō.smi gatasandēhaḥ kariṣyē vacanaṅ tava||18:73||
भावार्थ : अर्जुन कहते हैं-अब मेरा मोह नष्ट हो गया है, मुझे स्मृति (ज्ञान) प्राप्त हो गया है; अब मैं स्थित और संदेह-मुक्त हूँ, और आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।
🌤 यह वह क्षण है जहाँ गुरु शिष्य से उत्तर की प्रतीक्षा करता है-प्रकाश की ओर अंतिम कदम। ||18:73||
शलोक # 74
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ||18:74||
sañjaya uvāca
ityahaṅ vāsudēvasya pārthasya ca mahātmanaḥ.
saṅvādamimamaśrauṣamadbhutaṅ rōmaharṣaṇam||18:74||
भावार्थ : संजय कहते हैं-मैंने वासुदेव और महात्मा पार्थ के इस आश्चर्यजनक और रोमांचकारी संवाद को सुना।
🌈 यह उत्तर केवल अर्जुन का नहीं-हर साधक का हो सकता है जो गीता को हृदय से सुनता है। ||18:74||
शलोक # 75
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्||18:75||
vyāsaprasādācchrutavānētadguhyamahaṅ param.
yōgaṅ yōgēśvarātkṛṣṇātsākṣātkathayataḥ svayam||18:75||
भावार्थ : व्यासजी की कृपा से मैंने यह गूढ़ योग सुना-जिसे स्वयं योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन को बताया।
🎥 यह संवाद केवल इतिहास नहीं-प्रत्येक आत्मा के भीतर चल रहा युगसंग्राम है। ||18:75||
शलोक # 76
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ||18:76||
rājansaṅsmṛtya saṅsmṛtya saṅvādamimamadbhutam.
kēśavārjunayōḥ puṇyaṅ hṛṣyāmi ca muhurmuhuḥ||18:76||
भावार्थ : हे राजन्! बार-बार जब मैं कृष्ण और अर्जुन के इस पुण्य संवाद को स्मरण करता हूँ, तब मैं हर बार हर्षित होता हूँ।
🙏 जब गुरु की कृपा और दिव्यता साथ हो-तब ही जीवन में गीता प्रकट होती है। ||18:76||
शलोक # 77
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ||18:77||
tacca saṅsmṛtya saṅsmṛtya rūpamatyadbhutaṅ harēḥ.
vismayō mē mahān rājan hṛṣyāmi ca punaḥ punaḥ||18:77||
भावार्थ : और जब मैं भगवान श्रीकृष्ण के अद्भुत विराट रूप को स्मरण करता हूँ, तब मैं विस्मय और आनंद से भर जाता हूँ।
💫 गीता केवल एक बार पढ़ने की वस्तु नहीं-हर स्मृति में वह नया प्रकाश देती है। ||18:77||
शलोक # 78
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ||18:78||
yatra yōgēśvaraḥ kṛṣṇō yatra pārthō dhanurdharaḥ.
tatra śrīrvijayō bhūtirdhruvā nītirmatirmama||18:78||
भावार्थ : जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन हैं-वहाँ निश्चित रूप से श्री (समृद्धि), विजय, यश और नीति होती है-यह मेरा मत है।
🌟 विराट दर्शन आत्मा को उसकी सीमाओं से पार ले जाता है। ||18:78||(अंतिम श्लोक)
🌺 इस प्रकार गीता समाप्त होती है-पर आत्मा की यात्रा आरंभ होती है। यह संवाद केवल अर्जुन के प्रश्नों का समाधान नहीं, बल्कि हर जिज्ञासु आत्मा के भीतर उठते संघर्षों का मार्गदर्शन है। श्रीकृष्ण की वाणी चिरंतन है-और जब हम इसे स्मरण करते हैं, तब ईश्वर स्वयं भीतर बोलते हैं।
🧘 Conclusion (निष्कर्ष)
मोक्ष संन्यास योग में श्रीकृष्ण हमें यह सिखाते हैं कि संन्यास केवल कर्म का त्याग नहीं, बल्कि फल की अपेक्षा से विरक्त होना है। कर्म योग, गुणत्रय विभाग और श्रद्धात्रय विभाग में दी गई शिक्षा इस अध्याय में समाहित होती है। यह अध्याय जीवन में धर्म, कर्तव्य, और मुक्ति की सही समझ प्रदान करता है।
अन्य उपयोगी लिंक
- अध्याय 1 - अर्जुन विषाद योग
- अध्याय 2 - निष्काम कर्म
- अध्याय 3 - कर्म योग
- अध्याय 5 - संन्यास योग
- अध्याय 14 - गुणत्रय विभाग योग
- अध्याय 17 - श्रद्धात्रय विभाग योग
❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
मोक्ष संन्यास योग का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है: त्याग और मोक्ष के मार्ग की व्याख्या। यह अध्याय यह बताता है कि संन्यास केवल कर्म से नहीं बल्कि फल की इच्छा से मुक्त होना है।
क्या कर्म त्यागना ही संन्यास है?
नहीं, श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि निष्काम भाव से कर्म करना ही श्रेष्ठ है। कर्म का त्याग नहीं, अपितु फल की अपेक्षा का त्याग संन्यास कहलाता है।
भगवद गीता का यह अंतिम अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है?
यह अध्याय पूरे ग्रंथ का सार है। इसमें सभी अध्यायों की शिक्षा को समाहित किया गया है और जीवन के अंतिम लक्ष्य - मोक्ष - की ओर मार्गदर्शन दिया गया है।
अध्याय 18 में कुल कितने श्लोक हैं?
अध्याय 18 - मोक्ष संन्यास योग में 78 श्लोक हैं। यह गीता का सबसे लंबा अध्याय है।
क्या इस अध्याय से जीवन में बदलाव आ सकता है?
बिलकुल, यदि आप निष्काम कर्म, त्याग, और कर्तव्य को समझते हैं, तो जीवन में शांति, संतुलन और आत्मज्ञान की प्राप्ति संभव है।
