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भगवद गीता अध्याय 17 श्रद्धात्रय विभाग योग हिंदी - अर्जुन को उपदेश देते भगवान श्रीकृष्ण

भगवद गीता - अध्याय 17
श्रद्धात्रय विभाग योग - श्लोक व हिंदी अर्थ सहित

🧡 Introduction (परिचय)

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया यह सत्रहवाँ अध्याय - श्रद्धात्रय विभाग योग - श्रद्धा के तीन प्रकारों (सात्विक, राजसिक, तामसिक) पर आधारित है। इस अध्याय में यह बताया गया है कि श्रद्धा मनुष्य के स्वभाव और उसकी गुणों की प्रवृत्ति के अनुसार होती है और उसी के अनुसार उसका आचरण और फल भी होता है।

इस अध्याय में यह भी बताया गया है कि भोजन, यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं और इनका फल व्यक्ति की श्रद्धा से जुड़ा होता है।


श्लोक और हिंदी अर्थ

👉 इस अनुभाग में आप अध्याय 17 के सभी श्लोकों का हिंदी भावार्थ पाएँगे।

अध्याय 17 - "श्रद्धात्रय विभाग योग" - जहाँ श्रद्धा के तीन स्वरूपों और भोजन, तप और यज्ञ की शुद्धता की चर्चा होती है 📿✨ यहाँ श्रीकृष्ण यह बताते हैं कि हर व्यक्ति की श्रद्धा, भोजन, यज्ञ, तप और दान-सभी उनके गुणों (सत्त्व, रजस्, तमस्)के अनुसार होती है। यह अध्याय कर्म की गहराई में श्रद्धा के स्तर को उजागर करता है।


अध्याय # 17
शलोक # 1
श्रद्धा का और शास्त्रविपरीत घोर तप करने वालों का विषय

अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः||17:1||

arjuna uvāca
yē śāstravidhimutsṛjya yajantē śraddhayā.nvitāḥ.
tēṣāṅ niṣṭhā tu kā kṛṣṇa sattvamāhō rajastamaḥ||17:1||

भावार्थ : अर्जुन पूछते हैं-हे कृष्ण! जो लोग शास्त्रों का पालन किए बिना श्रद्धा से यज्ञ करते हैं, उनकी श्रद्धा सत्त्वगुणी है, रजोगुणी या तमोगुणी?

🪔 यह प्रश्न हर साधक का है-क्या केवल श्रद्धा पर्याप्त है या उसका स्वरूप भी मायने रखता है? ||17:01||

अध्याय # 17
शलोक # 2
श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु||17:2||

śrī bhagavānuvāca
trividhā bhavati śraddhā dēhināṅ sā svabhāvajā.
sāttvikī rājasī caiva tāmasī cēti tāṅ śrṛṇu||17:2||

भावार्थ : श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं-श्रद्धा तीन प्रकार की होती है: सत्त्वगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी। यह स्वभाव से उत्पन्न होती है।

🌱 श्रद्धा स्वयं में दिव्यता या विकृति का बीज होती है-जैसी श्रद्धा, वैसा जीवन। ||17:02||
अध्याय # 17
शलोक # 3
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः||17:3||

sattvānurūpā sarvasya śraddhā bhavati bhārata.
śraddhāmayō.yaṅ puruṣō yō yacchraddhaḥ sa ēva saḥ||17:3||

भावार्थ : प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुरूप होती है। मनुष्य श्रद्धा से ही बना है-जैसी उसकी श्रद्धा, वैसा ही वह स्वयं होता है।

🌼 यह श्रद्धा को आत्म-परिचय का दर्पण घोषित करता है। ||17:03||
अध्याय # 17
शलोक # 4
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये जयन्ते तामसा जनाः||17:4||

yajantē sāttvikā dēvānyakṣarakṣāṅsi rājasāḥ.
prētānbhūtagaṇāṅścānyē yajantē tāmasā janāḥ||17:4||

भावार्थ : सात्त्विक लोग देवताओं की उपासना करते हैं, राजसिक लोग यक्षों और राक्षसों की, और तामसिक लोग प्रेतों और भूतों की पूजा करते हैं।

🌓 पूजन की दिशा ही बताती है-हमारी चेतना ऊपर उठ रही है या नीचे गिर रही है। ||17:04||

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अध्याय # 17
शलोक # 5
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः||17:5||

aśāstravihitaṅ ghōraṅ tapyantē yē tapō janāḥ.
dambhāhaṅkārasaṅyuktāḥ kāmarāgabalānvitāḥ||17:5||
अध्याय # 17
शलोक # 6
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्||17:6||

karṣayantaḥ śarīrasthaṅ bhūtagrāmamacētasaḥ.
māṅ caivāntaḥśarīrasthaṅ tānviddhyāsuraniścayān||17:6||

भावार्थ : जो लोग शास्त्र-विरुद्ध, अत्यंत कठोर और दैहिक पीड़ा देने वाले तप करते हैं-वे राक्षसी प्रवृत्ति के होते हैं। वे आत्मा का विनाश करते हैं और प्रभु को अप्रिय होते हैं।

⚠️ यहाँ संकेत है: केवल तप नहीं, सही पथ पर किया गया तप ही कल्याणकारी होता है। ||17:05 - 17:06||
अध्याय # 17
शलोक # 7
आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक-पृथक भेद

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु||17:7||

āhārastvapi sarvasya trividhō bhavati priyaḥ.
yajñastapastathā dānaṅ tēṣāṅ bhēdamimaṅ śrṛṇu||17:7||

भावार्थ : भोजन भी तीन प्रकार का होता है, वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी सत्त्व, रजस् और तमस् के अनुसार भिन्न होते हैं। अब उन भेदों को सुनो।

🍽 हम जो खाते हैं, वह केवल शरीर नहीं बनाता-वह मन और चेतना को भी गढ़ता है। ||17:07||
अध्याय # 17
शलोक # 8
आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः||17:8||

āyuḥsattvabalārōgyasukhaprītivivardhanāḥ.
rasyāḥ snigdhāḥ sthirā hṛdyā āhārāḥ sāttvikapriyāḥ||17:8||

भावार्थ : जो आहार आयु, सत्त्व, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता को बढ़ाता है-स्वादिष्ट, चिकनापन लिए, पौष्टिक और हृदयप्रिय-ऐसा आहार सात्त्विक लोगों को प्रिय होता है।

🌿 भोजन जीवन है-और सात्त्विक भोजन चेतना में मधुरता भरता है। ||17:08||
अध्याय # 17
शलोक # 9
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः||17:9||

kaṭvamlalavaṇātyuṣṇatīkṣṇarūkṣavidāhinaḥ.
āhārā rājasasyēṣṭā duḥkhaśōkāmayapradāḥ||17:9||

भावार्थ : अधिक तीखा, खट्टा, नमकीन, गरम, रूखा और जलन पैदा करने वाला भोजन-राजसिकों को प्रिय होता है, पर यह दुःख, शोक और रोग देता है।

🔥 यह तृप्त करता है, पर शरीर और मन को असंतुलित भी करता है। ||17:09||
अध्याय # 17
शलोक # 10
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्||17:10||

yātayāmaṅ gatarasaṅ pūti paryuṣitaṅ ca yat.
ucchiṣṭamapi cāmēdhyaṅ bhōjanaṅ tāmasapriyam||17:10||

भावार्थ : बासी, स्वादहीन, सड़ा, पुराना, उच्छिष्ट (झूठन) और अशुद्ध भोजन-तामसिक लोगों को प्रिय होता है।

🌑 जो भोजन मृतप्राय है, वह जीवन की ऊर्जा को मंद कर देता है। ||17:10||

🌺 श्लोक 17.1-17.10 में श्रद्धा, तप और आहार की गहराई का भेद खुलता है। यहाँ श्रीकृष्ण बताते हैं कि सत्य केवल क्रिया में नहीं, भावना और दृष्टि में भी होता है-और श्रद्धा ही वह बीज है जिससे धर्म, भक्ति और मुक्ति की वृक्ष उत्पन्न होती है।
अध्याय # 17
शलोक # 11
अध्याय 17 - "श्रद्धात्रय विभाग योग"के श्लोक 11 से 20 - जहाँ श्रीकृष्ण यज्ञ, तप और दान के तीनों गुणात्मक स्वरूपोंको स्पष्ट करते हैं। यह मार्गदर्शन हमें सिखाता है कि कर्म तभी पवित्र होता है जब वह सत्वगुण से प्रेरित हो।

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः||17:11||

aphalākāṅkṣibhiryajñō vidhidṛṣṭō ya ijyatē.
yaṣṭavyamēvēti manaḥ samādhāya sa sāttvikaḥ||17:11||

भावार्थ : जो यज्ञ फल की इच्छा से रहित होकर, शास्त्रों के अनुसार और "यह करना ही चाहिए" इस भावना से किया जाता है-वह सात्त्विकयज्ञ है।

🕊 यह निष्काम सेवा है-जहाँ यज्ञ स्वयं साधना है, साधन नहीं। ||17:11||
अध्याय # 17
शलोक # 12
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्||17:12||

abhisaṅdhāya tu phalaṅ dambhārthamapi caiva yat.
ijyatē bharataśrēṣṭha taṅ yajñaṅ viddhi rājasam||17:12||

भावार्थ : जो यज्ञ फल की अपेक्षा और दिखावे के लिए किया जाता है-वह राजसिकयज्ञ कहलाता है।

🎭 यहाँ उद्देश्य त्याग नहीं, प्रतिष्ठा और प्राप्यता होती है। ||17:12||
अध्याय # 17
शलोक # 13
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते||17:13||

vidhihīnamasṛṣṭānnaṅ mantrahīnamadakṣiṇam.
śraddhāvirahitaṅ yajñaṅ tāmasaṅ paricakṣatē||17:13||

भावार्थ : जो यज्ञ शास्त्रविहीन, अशुद्ध अन्न से, बिना मंत्र और दक्षिणा के तथा बिना श्रद्धा के किया जाता है-वह तामसिकयज्ञ है।

🌑 ऐसा यज्ञ रूप है, पर आत्मा रहित है-केवल एक क्रिया। ||17:13||
अध्याय # 17
शलोक # 14
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते||17:14||

dēvadvijaguruprājñapūjanaṅ śaucamārjavam.
brahmacaryamahiṅsā ca śārīraṅ tapa ucyatē||17:14||

भावार्थ : देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानी का सम्मान, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा-ये सब शारीरिक तपहैं।

🌿 सच्चे तप का प्रारंभ देह से नहीं, देह की विनम्रता से होता है। ||17:14||
अध्याय # 17
शलोक # 15
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते||17:15||

anudvēgakaraṅ vākyaṅ satyaṅ priyahitaṅ ca yat.
svādhyāyābhyasanaṅ caiva vāṅmayaṅ tapa ucyatē||17:15||

भावार्थ : जो वाणी सत्य, प्रिय, हितकारी और किसी को उद्विग्न न करने वाली हो-और साथ में स्वाध्याय हो-वह वाणी का तपकहलाता है।

🎙 शब्दों में भी साधना होती है-जहाँ मौन से अधिक प्रभावशाली मधुर वाणी हो। ||17:15||
अध्याय # 17
शलोक # 16
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते||17:16||

manaḥprasādaḥ saumyatvaṅ maunamātmavinigrahaḥ.
bhāvasaṅśuddhirityētattapō mānasamucyatē||17:16||

भावार्थ : मन की प्रसन्नता, कोमलता, मौन, आत्मसंयम और शुद्ध भावना-ये मानसिक तपकहे जाते हैं।

🪷 जहाँ मन शांत हो, वहीं ईश्वर का वास्तविक निवास होता है। ||17:16||
अध्याय # 17
शलोक # 17
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते||17:17||

śraddhayā parayā taptaṅ tapastatitravidhaṅ naraiḥ.
aphalākāṅkṣibhiryuktaiḥ sāttvikaṅ paricakṣatē||17:17||

भावार्थ : जो तीनों प्रकार का तप श्रद्धा से, फल की इच्छा बिना किया जाता है-वह सात्त्विक तपकहलाता है।

🕊 यह तप आत्मा को उच्च बनाता है-बिना दिखावे के भीतर ही भीतर प्रकाशित। ||17:17||
अध्याय # 17
शलोक # 18
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्||17:18||

satkāramānapūjārthaṅ tapō dambhēna caiva yat.
kriyatē tadiha prōktaṅ rājasaṅ calamadhruvam||17:18||

भावार्थ : जो तप केवल प्रतिष्ठा, आदर और दिखावे के लिए किया जाता है-वह राजसिक तपकहलाता है।

🎭 ऐसा तप औरों की आँखों के लिए होता है-अपने भीतर के सुधार के लिए नहीं। ||17:18||
अध्याय # 17
शलोक # 19
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्||17:19||

mūḍhagrāhēṇātmanō yatpīḍayā kriyatē tapaḥ.
parasyōtsādanārthaṅ vā tattāmasamudāhṛtam||17:19||

भावार्थ : जो तप मूढ़ता से आत्मपीड़ा देकर या दूसरों के विनाश की भावना से किया जाता है-वह तामसिक तपहै।

🔥 यह तप नहीं, अंधकार की पुकार है-जो आत्मा को और बाँधता है। ||17:19||
अध्याय # 17
शलोक # 20
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्||17:20||

dātavyamiti yaddānaṅ dīyatē.nupakāriṇē.
dēśē kālē ca pātrē ca taddānaṅ sāttvikaṅ smṛtam||17:20||

भावार्थ : जो दान "यह देना ही चाहिए" इस भावना से, बिना किसी प्रत्युपकार की आशा के, योग्य समय, स्थान और पात्र को दिया जाए-वह सात्त्विक दानकहलाता है।

🌸 दान जब बिना अपेक्षा के हो, तब वह आत्मा को मुक्त करता है। ||17:20||

🌼 श्लोक 17.11 से 17.20 तक श्रीकृष्ण यज्ञ, तप और दान की "गुणानुसार शुद्धता" को उजागर करते हैं। यह केवल क्या किया गया, इस पर नहीं-कैसे और किस भाव से किया गया, इसका महत्त्व सिखाते हैं।
अध्याय # 17
शलोक # 21
श्लोक 17.21 से 17.28 तक - जहाँ श्रीकृष्ण दान के शुद्ध और अशुद्ध स्वरूप, साथ ही श्रद्धा और "ॐ तत् सत्" के गूढ़ रहस्य को प्रकट करते हैं 📿✨ श्लोक 17.21 से 17.28 तक के रहस्यमय मार्ग में प्रवेश करें, जहाँ श्रीकृष्ण दान, श्रद्धा और "ॐ तत् सत्" के गूढ़ संदेश को उजागर करते हैं।

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्||17:21||

yattu pratyupakārārthaṅ phalamuddiśya vā punaḥ.
dīyatē ca parikliṣṭaṅ taddānaṅ rājasaṅ smṛtam||17:21||

भावार्थ : जो दान किसी प्रत्युपकार या फल की आशा से किया जाता है-या अनिच्छा से, कष्टपूर्वक दिया जाता है-वह राजसिक दानहै।

🎁 यह दान लेन-देन की मुद्रा है-उदारता नहीं, सौदा बन जाता है। ||17:21||
अध्याय # 17
शलोक # 22
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्||17:22||

adēśakālē yaddānamapātrēbhyaśca dīyatē.
asatkṛtamavajñātaṅ tattāmasamudāhṛtam||17:22||

भावार्थ : जो दान गलत समय, स्थान या अयोग्य व्यक्ति को किया जाता है, अपमानपूर्वक या अवमानना के साथ-वह तामसिक दानकहलाता है।

⚠️ दान जो अपवित्र कर दे-वह दान नहीं, मोह की छाया है। ||17:22||
अध्याय # 17
शलोक # 23
ॐ तत्सत् के प्रयोग की व्याख्या
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा||17:23||

tatsaditi nirdēśō brahmaṇastrividhaḥ smṛtaḥ.
brāhmaṇāstēna vēdāśca yajñāśca vihitāḥ purā||17:23||

भावार्थ : "ॐ तत् सत्"-ये तीन शब्द ब्रह्म की पहचान हैं। प्राचीन काल से ब्राह्मण, वेद और यज्ञ इनसे आरंभ किए जाते थे।

🔱 यह मंत्र त्रिविध शुद्धता का प्रतीक है-"ॐ" आत्मा की चेतना, "तत्" त्याग की भावना, और "सत्" शाश्वत सत्य। ||17:23||
अध्याय # 17
शलोक # 24
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम्||17:24||

tasmādōmityudāhṛtya yajñadānatapaḥkriyāḥ.
pravartantē vidhānōktāḥ satataṅ brahmavādinām||17:24||

भावार्थ : इसलिए वेदविहित यज्ञ, दान और तप में "ॐ" का उच्चारण करते हुए आरंभ किया जाता है।

🌿 "ॐ" से प्रारंभ हो हर कर्म, ईश्वरीय स्वरूप को साक्षी मानकर किया जाए-तभी उसका प्रभाव दिव्य होता है। ||17:24||
अध्याय # 17
शलोक # 25
तदित्यनभिसन्दाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्चविविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः||17:25||

tadityanabhisandhāya phalaṅ yajñatapaḥkriyāḥ.
dānakriyāśca vividhāḥ kriyantē mōkṣakāṅkṣi||17:25||

भावार्थ : "तत्" शब्द के साथ बिना फल की इच्छा के यज्ञ, तप और दान-मुक्ति की इच्छा रखने वाले लोग करते हैं।

🕊 जब हम "तत्" (वह परम) की भावना से कर्म करें, तो हमारे कर्म हमें बाँधते नहीं-वे हमें मुक्त करते हैं। ||17:25||
अध्याय # 17
शलोक # 26
सद्भावे साधुभावे च सदित्यतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते||17:26||

sadbhāvē sādhubhāvē ca sadityētatprayujyatē.
praśastē karmaṇi tathā sacchabdaḥ pārtha yujyatē||17:26||
अध्याय # 17
शलोक # 27
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्यवाभिधीयते||17:27||

yajñē tapasi dānē ca sthitiḥ saditi cōcyatē.
karma caiva tadarthīyaṅ sadityēvābhidhīyatē||17:27||

भावार्थ : "सत्" शब्द शुभ अस्तित्व, पवित्रता और श्रेष्ठ कर्मों के लिए प्रयोग किया जाता है। यज्ञ, तप और दान में यह शुद्धता का प्रतीक है।

✨ "सत्" वह ज्योति है-जो हर शुभ कर्म को अर्थपूर्ण बनाती है। ||17:26 - 17:27||
अध्याय # 17
शलोक # 28
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह||17:28||

aśraddhayā hutaṅ dattaṅ tapastaptaṅ kṛtaṅ ca yat.
asadityucyatē pārtha na ca tatprētya nō iha||17:28||

भावार्थ : जो यज्ञ, दान या तप श्रद्धा के बिना किया गया-वह "असत्" है। उसका न इस लोक में और न परलोक में कोई फल होता है।

🚫 बिना श्रद्धा के कर्म केवल अभिनय बन जाते हैं-आत्मा को न तो तृप्ति देते हैं, न उन्नति। ||17:28||

🌼 इस प्रकार अध्याय 17 के अंत में श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि केवल कर्म नहीं, उसमें निहित भाव, श्रद्धा और शुद्धताही उसे फलदायक बनाते हैं। ॐ तत् सत् केवल शब्द नहीं-यह जीने का एक उच्चतर मार्ग है।


🧘 Conclusion (निष्कर्ष)

श्रद्धा ही किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास का मूल है। सात्विक श्रद्धा व्यक्ति को शुद्ध, विनम्र और ईश्वर-निष्ठ बनाती है, जबकि राजसिक और तामसिक श्रद्धा भ्रम और अहंकार की ओर ले जाती है। यदि आपने दैवासुर सम्पद विभाग योग और गुणत्रय विभाग योग पढ़ा है, तो यह अध्याय उन्हें व्यवहारिक दृष्टि से स्पष्ट करता है।


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❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

श्रद्धात्रय विभाग योग का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - श्रद्धा के तीन विभाग: सात्विक, राजसिक और तामसिक। यह अध्याय बताता है कि श्रद्धा व्यक्ति की प्रवृत्ति के अनुसार बदलती है।

तीन प्रकार की श्रद्धा क्या होती हैं?

सात्विक श्रद्धा ईश्वर और धर्म में होती है, राजसिक फल की इच्छा से प्रेरित होती है, और तामसिक श्रद्धा अंधविश्वास और हानि करने वाले कार्यों में होती है।

श्रद्धा का जीवन पर क्या प्रभाव होता है?

श्रद्धा से व्यक्ति का व्यवहार, भोजन, दान, तपस्या और सोच प्रभावित होते हैं। सात्विक श्रद्धा आध्यात्मिक उन्नति देती है, जबकि अन्य दो भ्रम फैलाते हैं।

क्या श्रद्धा बदली जा सकती है?

हाँ, सत्संग, ध्यान और ज्ञान प्राप्ति द्वारा श्रद्धा को सात्विक बनाया जा सकता है। यह आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।

इस अध्याय में कुल कितने श्लोक हैं?

श्रद्धात्रय विभाग योग (अध्याय 17) में कुल 28 श्लोक हैं।


लेखक: शाइनकैप टीम | प्रकाशित: | संशोधित: